Shiv Puran Quotes

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Shiv Puran (Hindi) Shiv Puran by Vinay Bhojraj Dwivedi
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Shiv Puran Quotes Showing 1-30 of 71
“शिवजी का तेज भयानक था और यादव रूक नहीं पा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने लास्य ज्वर प्रसारक बाणों का प्रयोग किया। दोनों बाणों के टकराने पर कृष्ण का बाण निरस्त हो गया।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“हिरण्यकशिपु के प्रपौत्र, प्रहलाद के पौत्र और विलोचन के पुत्र बलि का पुत्र बाणासुर था। बाणासुर भी अपने पिता और दादा की तरह शिवजी का भक्‍त था और अत्यंत दानी तथा उदार था। उसने भगवान शंकर से परिवार सहित अपने नगर में निवास करने का वरदान ले लिया। एक दिन शिवजी ने उस शोणित नगरी के बाहर नदी के किनारे नृत्य-गीत आदि का आयोजन किया। शिवजी की इच्छा हुई कि वे जल-विहार करें किंतु अभी तक पार्वती नहीं आई थीं। वहां पर जो अन्य स्त्रियां जल-विहार कर रही थीं उन्होंने सोचा, जो भी स्त्री शिवजी के साथ विहार करने में सफल हो जाएगी वह बड़ी भाग्यशालिनी होगी। यह सोचकर बाणासुर की पुत्री उषा ने पार्वती का वेष धारण किया और शिवजी के साथ विहार करने का लिए आई। किंतु जैसे ही वह शिवजी के पास पहुंची वैसे ही पार्वती जी आ गईं। उन्होंने क्रुद्ध होकर उषा को शाप दे दिया कि वह बैशाख सुदी द्वादशी की आधी रात को जब सो रही होगी तब कोई अज्ञात पुरुष उसका भोग कर लेगा। इस ओर बाणासुर शंकरजी की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने यह कहा कि हे भगवान! मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है और इसलिए मेरी भुजाओं की शक्‍ति व्यर्थ होती जा रही है। मैं क्या करूं? शिवजी ने बाणासुर की गर्व से भरी हुई यह बात सुनी और उसे आश्वासन दिया की जल्दी ही उसका कोई प्रतिद्वंद्वी आ जाएगा और उसे शक्‍ति प्रदर्शन का अवसर मिलेगा। बैशाख मास की द्वादशी को विष्णुजी की पूजा करने के बाद उषा सो रही थी तो श्रीकृष्ण का पौत्र अनिरुद्ध अंत:पुर में आया और उसने उषा के साथ बलात्कार किया। इस घटना से दु:खी होकर उषा आत्महत्या करने जा रही थी कि रास्ते में उसकी सखी चित्रलेखा उसे मिली और उसने उसे समझाया कि वह उसे गुप्त पति उपलब्ध करा देगी। जब चित्रलेखा ने अनेक देवों, गंधर्वों, महावीरों के चित्र उषा को दिखाए तो उसने अनिरुद्ध का चित्र देखकर लज्जा से सिर झुका लिया। चित्रलेखा ने अनिरुद्ध की खोज की और वह द्वारका गई तथा अपने तामसी योग से शय्या पर सोते हुए अनिरुद्ध को शय्या सहित उषा के अंत:पुर में ले आई। अपने प्रियतम को प्राप्त कर उषा आनंदमग्न हो गई और रति-विलास करने लगी। जब द्वारपालों को इस बात का पता चला तो उन्होंने सब कुछ बाणासुर को बता दिया। क्रोधित बाणासुर अंत:पुर से आया और अनिरुद्ध को युद्ध के लिए ललकारा। अनिरुद्ध ने वीरता का ऐसा प्रदर्शन किया जिसके फलस्वरूप बाणासुर ने उसे नागपाश से बांध दिया। उसने अपने अनेक सैनिकों को अनिरुद्ध के प्राणों को समाप्त करने का आदेश दिया। किंतु महामात्य कृष्मांड ने बाणासुर को समझाया कि वह अनिरुद्ध को न मारे। उधर अनिरुद्ध ने अपनी शक्‍ति के बल पर पिंजड़े को तोड़ दिया और फिर अपनी प्रियतमा के पास जाकर, रति-विलास करने लगा। भगवान कृष्ण के अंत:पुर में स्त्रियों के द्वारा रोने की ध्वनि सुनकर कृष्ण को अनिरूद्ध के विषय में पता चला।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“शिवजी के द्वारा बताए गए एक मंत्र का जाप शुरू किया: ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुर-नमस्कृताय।         भूतंभव्य-महादेवाय हरित पिगंललोचनाय।। इस मंत्र के जाप से दैत्यगुरू शिवलिंग के मार्ग से बाहर आए और इसीलिए उनका नाम शुक्र पड़ा। यही शुक्राचार्य वाराणसी में गए और वहां जाकर उन्होंने ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“एक बार विहार करते हुए तुलसी को वास्तविकता का ज्ञान हो गया और वह उन्हें श्राप देने के लिए तैयार हो गई। श्राप के भय से विष्णु अपने प्रकृत रूप में आ गए। यह देखकर तुलसी ने उनसे कहा कि हे विष्णु! तुममें जरा भी दया नहीं है, तुम्हारा मन पत्थर की तरह है। तुमने छलपूर्वक अपने भक्‍त का वध कराया है और मेरा पतिव्रत भंग किया है। वह विलाप करने लगी। उसका विलाप सुनकर विष्णुजी ने शिव का स्मरण किया। शिवजी ने वहां पहुंचकर तुलसी को संसार की नश्वरता समझाई और कहा कि तुम तुलसी नामक वनस्पति बनोगी और दिव्य रूप धारण करके तुम हरि के साथ विहार करोगी। तुम क्षीरसागर की भी पत्नी बनोगी और तुम्हारे ही श्राप के कारण विष्णु पत्थर बनकर नदी के जल में रहेंगे और जब उस पत्थर को कीड़े काट-काटकर चक्रवत कर देंगे तो वह शालिग्राम कहलाएगा।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“जब तक शंखचूड़ के पास विष्णु का कवच और पतिव्रता स्त्री है तब तक इसकी मृत्यु नहीं। तब शिवजी की आज्ञा से विष्णु ब्राह्मण का वेश बनाकर शंखचूड़ के पास गए और उससे उनका कवच मांगा। फिर उन्होंने वह कवच पहना और उसका रूप धर कर उसकी पत्नी तुलसी के पास गए। विष्णु ने शंखचूड़ के रूप में उसकी पत्नी से विहार किया और समय पाते ही शिवजी ने एक शूल से शंखचूड़ का वध कर दिया।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“शिवजी ने शंखचूड़ के दूत से कहा कि तुम अपने स्वामी से कहो कि वह देवताओं से वैर त्यागकर उनसे संधि कर ले। उनका राज्य उन्हें दे दे। प्राणियों का इस प्रकार विरोध उचित नहीं होता। तुम कश्यप की संतान हो। तब दूत ने कहा कि हे प्रभु! आप जो कुछ भी कह रहे हैं सत्य है। पर सारे दोष असुरों के नहीं हैं। आप देवताओं के पक्षपाती हैं। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। तब शंकर ने कहा कि मैं भक्‍तों के अधीन हूं”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“शंखचूड़ का यह संदेश सुनकर शिवजी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने वीरभद्र तथा भद्रकाली आदि को बुलाकर शंखचूड़ को मारने की आज्ञा दे दी और अपने आप भी देवताओं के साथ चल दिए। उनके साथ आठों वसु, आठों भैरव, रूद्र, सूर्य, अग्नि, चंद्रमा, कुबेर, यम आदि सभी चल दिए। काली भी उनके साथ थीं और उसकी जीभ एक योजन तक लपलपा रही थी। वह हाथ में खप्पर लिए हुए थीं। उसके साथ तीन करोड़ योगिनी और तीन करोड़ डाकिनी थीं। दूसरी ओर शंखचूड़ ने अपने अंत:पुर में आकर अपनी पत्नी तुलसी से सारा वृत्तांत सुनाया और उसने प्रात:काल से प्रारंभ किए जाने वाले युद्ध के विषय में भी कहा।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“विवाह के बाद तुलसी के साथ शंखचूड़ अपने घर आया, शुक्राचार्य ने उसे बहुत सारे आशीर्वाद दिए और देवता तथा दानवों का स्वाभाविक वैर समझाकर दानव अध्यक्ष पद पर अभिषेक कर दिया।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“उन बीजों को लेकर देवताओं ने वृंदा की चिता में डाल दिया। उससे धात्री, मालती और तुलसी का आविर्भाव हुआ। धात्री और तुलसी आदि वनस्पतियों को प्रतिष्ठित कर विष्णुजी बैकुंठ को चले गए।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“आकाशवाणी के द्वारा उन्हें पता चला कि उमा ही तीन गुणों में विभक्त होकर सब जगह स्थित है। वह सत्य गुण से गौरा, रजो गुण से लक्ष्मी, और तमो गुण से ज्योति रूपा है।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“देवताओं से सुना कि विष्णुजी लक्ष्मी सहित जलंधर के यहां निवास कर रहे हैं। इसके बाद देवता भी वहीं रह रहे हैं। इसके उपरांत शिवजी ने विष्णुजी को बुलाकर जलंधर को न मारने का कारण पूछा और उसके यहां निवास करने के विषय में भी पूछा। इस पर विष्णुजी ने उत्तर दिया कि जलंधर आपके अंश से उत्पन्न हुआ है और लक्ष्मी का भाई है इस कारण मैंने उसे नहीं मारा, वह अजेय भी है।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“जलंधर की इस युद्ध-क्रिया से उसके युद्ध विद्या, साहस, पराक्रम से प्रसन्न होकर उसे वर मांगने के लिए कहा। विष्णुजी की प्रसन्नता अनुभव कर जलंधर ने कहा कि आप मेरी बहन लक्ष्मी और अपने अन्य कुटुंबियों सहित मेरे घर में निवास करने के लिए आएं। भगवान विष्णु ने जलंधर को प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान दे दिया और कुछ समय बाद लक्ष्मी सहित विष्णुजी जलंधर के निवास पर आतिथ्य ग्रहण करने के लिए आए। जलंधर कृतकृत्य हो गया और इसके बाद उसका यश चारों तरफ फैला तथा वह गंधर्वों, देवों और यक्षों को अपना अनुगामी बनाकर धर्मपूर्वक शासन करने लगा।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“उन्हें चेतावनी दी कि विष्णुजी समुद्र-मंथन के परिणामस्वरूप निकले सारे रत्नों को लौटा दें अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“शुक्राचार्य ने उसे समुद्र-मंथन की कथा सुनाई और बताया कि किस प्रकार अमृत को पीने के लिए तत्पर हुए राहु का सिर इन्द्र के पक्षपाती विष्णुजी ने काट गिराया।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“उसका विवाह कालनेमि की लड़की वृंदा से करा दिया। शुक्राचार्य ने जब जलंधर की शक्‍ति और साहस को देखा तो उन्होंने इसे दैत्यों का अधिपति बना दिया।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“भगवान शंकर की प्रार्थना करने लगे कि वे इन्द्र के अपराध को क्षमा कर दें। भगवान शिवजी बृहस्पति की स्तुति से प्रसन्न होकर इन्द्र को क्षमा करते हुए उठ गए। लेकिन उन्होंने अपने मस्तक के नेत्र से निकले हुए तेज को अपने हाथ में लेकर क्षीर समुद्र में फेंक दिया। एक क्षण के बाद ही यह तेज एक बालक का रूप धारण कर लिया और गंगासागर के संगम पर ऊंचे स्वर में रोने लगा। उसके रोने को सुनकर लोकपाल बहुत चिंतित हुए और उनके निवेदन करने पर ब्रह्माजी उस बालक के पास गए। उस बालक ने उनके गले में बाहें डाल दीं और उसने उनका गला इतनी जोर से दबाया कि ब्रह्माजी की आंखों से आंसू निकलने लगे। उसकी इस शक्‍ति को देखकर ब्रह्माजी ने उसका नाम जलंधर रख दिया। ब्रह्माजी ने उसके भविष्य-फल को देखा तो अनुमान लगाया कि यह बालक दैत्यों का अधिपति, प्रबल पराक्रमी, सबको जीतने वाला और शिवजी के अतिरिक्त किसी के द्वारा भी अवध्य होगा।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“मुंडी ने बताया कि आत्मा से लेकर स्तंभ तक सभी देह के बंधनों में आत्मा ही ईश्वर है। यहां तक कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश सब नश्वर हैं और सभी शरीर धारी समान हैं। अहिंसा परम धर्म है और जीव-हिंसा पाप है। स्वतंत्रता ही मोक्ष है और इच्छित भोजन को पा लेना ही सबसे बड़ा स्वर्ग है। इस ज्ञान की दृष्टि से उत्तम दान है—भयभीत को निर्भय करना। वर्ण-व्यवस्था बिलकुल व्यर्थ की वस्तु है। कल्पित और निराधार है। मानव-मानव के बीच भेद करना अप्राकृतिक है। अर्हन् ने इस धर्म का प्रचार किया और उसने कहा कि स्वर्ग और नरक सब कुछ इसी लोक में है। इस संसार से परे कुछ भी नहीं।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“जब देवता लोग चले गए तब विष्णुजी ने अपनी आत्मा से एक अत्यंत तेजस्वी चंवरधारी मलिन वसन, मायावी काष्ठ पात्र, कपड़े को मुख पर लपेटे हुए एक पुरुष को उत्पन्न किया। उसका नाम अर्हन् रखा। उसको आदेश दिया कि वह ऐसी प्राकृत भाषाओं में जो अपभ्रंश के शब्दों से परिपूर्ण हों एक ऐसा वर्णाश्रम धर्म का नाश करने वाला शास्त्र रचे जो अत्यंत विचित्र हो। विष्णुजी ने स्वयं अपनी माया को आदेश दिया कि वह अर्हन् का इस काम में सहयोग करे। विष्णुजी ने इस बात का आदेश भी दिया कि यह नया रचा हुआ शास्त्र असुरों के तीनों पुरों में प्रचारित हो जिससे असुर लोग पथ से विमुख हो जाएं और धर्मभ्रष्ट हों। इस प्रकार विष्णु ने त्रिपुर धारी राजा और जनता की धर्म-विमुख करने का उपाय निकाला। विष्णुजी की आज्ञा से अर्हन् ने अत्यंत पाखंड से भरे हुए शास्त्र की रचना की और साथ-ही-साथ अपने अनेक शिष्यों को पैदा करके उन्हें इस शास्त्र के प्रचार के लिए त्रिपुरों में भेज दिया। अर्हन् के चार प्रमुख शिष्य—कृषि, पति, कार्य और उपाध्याय के साथ स्वयं त्रिपुर नगर को प्रस्थान किया। प्रारंभ में शिवजी के प्रभाव से अर्हन् की माया वहां नहीं फैल सकी। उसके द्वारा निर्मित शास्त्र का प्रचार नहीं हो पाया। तब अर्हन् बहुत निराश हुआ और वह शिवजी का स्मरण करते हुए विष्णुजी का स्मरण भी करने लगा। उसके स्मरण से विष्णुजी ने शिवजी का स्मरण किया, शिवजी की आज्ञा पाकर फिर विष्णुजी ने तुम्हें याद किया। तुमने त्रिपुर पति के पास जाकर इस नये धर्म की प्रशंसा की और उससे यह भी कहा कि तुम स्वयं इस धर्म में दीक्षित हो।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“अर्हन् के चार प्रमुख शिष्य—कृषि, पति, कार्य और उपाध्याय के साथ स्वयं त्रिपुर नगर को प्रस्थान किया। प्रारंभ में शिवजी के प्रभाव से अर्हन् की माया वहां नहीं फैल सकी। उसके द्वारा निर्मित शास्त्र का प्रचार नहीं हो पाया। तब अर्हन् बहुत निराश हुआ और वह शिवजी का स्मरण करते हुए विष्णुजी का स्मरण भी करने लगा। उसके स्मरण से विष्णुजी ने शिवजी का स्मरण किया, शिवजी की आज्ञा पाकर फिर विष्णुजी ने तुम्हें याद किया। तुमने त्रिपुर पति के पास जाकर इस नये धर्म की प्रशंसा की और उससे यह भी कहा कि तुम स्वयं इस धर्म में दीक्षित हो।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“शिवजी को रस-क्रीड़ा से असंपृक्त करके संतान-उत्पत्ति के लिए प्रवृत्त होने की प्रार्थना करें। विष्णुजी ने देवताओं से कहा कि स्त्री-पुरुष के रति विहार के बीच बाधा डालना महापाप होता है। उन्होंने देवताओं को प्राचीन इतिहास का उदाहरण देकर यह बताया कि शिवजी के रति विहार में बाधा बनकर वे पाप के भागी न बनें। विष्णुजी ने बताया कि दुर्वासा ने पुराने समय में रंभा और इन्द्र के बीच बाधा बनकर उन दोनों का वियोग कराया था, जिसके फलस्वरूप उनका अपनी स्त्री से वियोग हुआ। दूसरी स्थिति में बृहस्पति ने कामदेव का घृताची से वियोग कराया था जिसके फलस्वरूप छ: महीने के भीतर ही चंद्रमा ने उनकी स्त्री का हरण कर लिया था। रति पीड़ित चंद्रमा का मोहिनी से वियोग कराने के कारण गौतम को बहुत समय तक अपनी पत्नी का वियोग सहना पड़ा था। राजा हरिश्चंद्र ने एक निर्जन वन में एक किसान का एक शूद्रा के साथ वियोग कराया तो उसे विश्वामित्र के क्रोध का पात्र बनना पड़ा और अपनी स्त्री तथा पुत्र आदि से अलग होना पड़ा।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“कुल-गोत्र के बंधन को छोड़कर हिमालय ने कन्यादान किया और शिवजी को अनेक वस्तुएं तथा अतुल धनराशि के साथ संतुष्ट किया।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“यह शिव नहीं हैं यह तो गंधर्व हैं, किन्नर हैं, यम हैं, अग्नि हैं, ब्रह्मा हैं, या और कोई देवता है। तुमने उनको बताया कि यह सब शिवजी के बंधु जन हैं और शिवजी इन सबसे अधिक सुंदर, तेजमय, और कांति वाले हैं तो मैना बहुत प्रसन्न हो गई, लेकिन शिवजी को देखते ही उनकी सारी प्रसन्नता तिरोहित हो गई और वह शोकाकुल हो उठीं। उसने शिवजी को बैल पर चढ़े हुए देखा जिनके पांच मुख थे, तीन नेत्र थे और उनके शरीर पर भभूत मली हुई थी। यह देखकर मैना मूर्च्छित हो गईं और उनकी सखियां उन्हें चेतना में लौटाने की कोशिश करने लगीं। जब मैना को होश आया तो वह विलाप करने लगीं और तिरस्कारपूर्ण बातें कहने लगीं। उसने इस तरह के पति को पाने के लिए तप करने वाली पार्वती को बहुत बुरा-भला कहा और इस विवाह को संपन्न कराने के लिए जिन लोगों ने भी प्रयास किया था, उन सबको अपशब्द कहे। वह विवाह के लिए जो सामान खरीदने आई थीं उसे भूल गईं, उन्हें लगा कि पार्वती की साधना बिलकुल ऐसी ही है जैसे सोना देकर कांच खरीदना या चंदन को छोड़कर धूल लपेटना, या गंगाजल को छोड़कर गंदला पानी पीना। उसने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैंने तो पहले ही समझाया था लेकिन वह नहीं मानी। इसपर मैंने मैना को समझाने की कोशिश की, तब उसने मुझे भी दुष्ट और अधम शिरोमणि कहकर दूर हो जाने के लिए कहा। मैना को अनेक देवताओं ने भी समझाया लेकिन वह नहीं मानीं, और उसने घोषणा कीं कि शंकर से उसका विवाह नहीं होगा। यह सुनकर सब लोगों में बेचैनी फैल गई। हाहाकार मच गया। स्थिति को नाजुक देखकर पर्वतराज हिमालय ने मैना को समझाना चाहा। उन्होंने कहा कि सत्य को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है। लेकिन मैना ने अपने पति की बात भी नहीं मानी। इसके बाद स्वयं पार्वती ने माता को समझाने का प्रयास किया। लेकिन पार्वती की बात सुनकर मैना और भी क्रोधित हो गईं और उसे अपशब्द कहने के साथ-साथ मारने-पीटने भी लगीं। उसकी यह हालत देखकर मैं फिर मैना के पास गया और उसे शिव के महत्त्व को समझाने की कोशिश की, शिवत्व का सार बताने का प्रयास किया लेकिन वह अपनी मान्यता से विचलित नहीं हुई। जब विष्णुजी ने मैना को कई तरह से समझाया तो उन्होंने आग्रह किया कि मैं तभी मान सकती हूं जब शंकर सुंदर वेश में आना स्वीकार करें। उसके बाद शिवजी को अत्यंत सुंदर और सुसज्जित वेष में मैना के सामने उपस्थित किया गया। उन्हें देखकर वह अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार हो गईं। इस सारी घटना के बाद अपने गणों को साथ लेकर शिवजी हिमाचल के दरवाजे पर आए। अपनी संपूर्ण निष्ठा और भक्‍ति के साथ मैना ने शिवजी की आरती उतारी, वह बार-बार मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देखती जाती थी और अपनी कन्या के भाग्य की सराहना भी करती जाती थी। वह शिवजी की रूप सुषमा पर मुग्ध हो गई।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“इसमें विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र आदि के साथ अनेक सिद्ध, भूत-प्रेत, बैताल, ब्रह्म राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और अपसराएं अकेले और अपने परिवार सहित”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“किन्नरों, गन्धर्वों, अपसराओं को निमंत्रण”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“देवता, नाग, गंधर्वो के द्वारा सजी बारात”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“पर्वतराज ने ऋषियों से अरण्यराज का वृत्तांत विस्तार से जानना चाहा। वसिष्ठजी ने कहा कि पुराने समय की बात है। तेजस्वी अरण्यराज के अनेक पुत्र और एक रूपवती कन्या थी। कन्या का नाम पद‍्मा था। राजा अपनी पुत्री से बहुत प्रेम करता था। पुत्री के युवती होने पर राजा ने उसके लिए सुंदर और सुयोग्य वर की खोज की। एक दिन रूपवती पद‍्मा जल में विहार कर रही थी कि दूसरी तरफ से पिप्पलाद मुनि आए और वह पद‍्मा को देखकर उस पर मुग्ध हो गए। उन्होंने अरण्यराज के पास आकर उनकी कन्या की याचना की। राजा ने उनके बुढ़ापे को देखकर बहुत चिंता अनुभव की, परंतु पुरोहित के समझाने पर ऋषि के श्राप से कुल की रक्षा करने के लिए उन्होंने कन्या पिप्पलाद को दे दी। पिप्पलाद उसे लेकर अपने आश्रम में आ गए। पद‍्मा ने इस जीवन को ईश्वर का विधान मानकर स्वीकार किया और अपने पति की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया। एक दिन धर्म ने एक सुंदर युवक के रूप में विचरण करते हुए पद‍्मा को अपनी काम-भावना का शिकार बनाने की चेष्टा की। पतिव्रता सती ने युवक की भर्त्सना करते हुए उसे नष्ट हो जाने का श्राप दे दिया, तब धर्म ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया और बताया कि वह कामुकतापूर्ण व्यवहार ब्रह्माजी की आज्ञा से कर रहा था जो पद‍्मा की परीक्षा लेना चाहते थे। यह सुनकर पद‍्मा विचलित हो उठी। उसे दो बातों ने व्यग्र कर दिया। एक तो उसका श्राप अन्यथा नहीं हो सकता दूसरे कि धर्म के बिना लोकयात्रा का प्रवर्तन कैसे हो सकता है। अंत में पद‍्मा ने इस प्रकार व्यवस्था की कि धर्म को द्वापर में एक चरण और त्रेता में दो चरण और कलियुग में तीन चरण होकर रहना पड़ेगा। और वह सतयुग में पुनः चारों चरणों से युक्त हो सकता है। इस ओर धर्म ने पिप्पलाद को यौवन का वरदान दिया, जिसके कारण उसने पद‍्मा के साथ सुख-विलासपूर्वक रहते हुए अपना जीवन आनंददायक बनाया। वसिष्ठजी”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“भगवान शंकर रजोगुण से रहित होने पर ही पूर्ण त‍त्त्व के ज्ञाता हैं। जिन शंकर का सेवक कुबेर जैसा देवता हो, उसे दरिद्र कहने का साहस कौन कर सकता है! भगवान शंकर ही मूल रूप से सृष्टि के सृजन और संहार में समर्थ हैं। शिवजी से स्थापित किया गया संबंध किसी भी देवता को गौरव देता है। वसिष्ठजी ने पर्वतराज को सचेत करते हुए कहा कि आप हठ मत कीजिए।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“कोई और शिवजी की निंदा करने का संकट नहीं उठा सकता। इन्द्र ने शिवजी का द्वार खटखटाया और उनसे अपनी निंदा करने के लिए कहा। शिवजी ने इंद्र का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वे ज्योतिषी के वेष में हिमालय के घर गए। उन्होंने शिव को कुरूप, अगुण, विकट, जटाधारी, श्मशानवासी आदि बताकर शिवजी की निंदा की और पर्वतराज हिमालय से कहा कि वे ऐसे शिव को अपनी लडकी न दें। ज्योतिषी की बातों में आकर मैना ने पर्वतराज हिमालय से कहा कि वे उसकी पुत्री को चाहे आजीवन अविवाहित रखें, लेकिन उसका विवाह शंकर से न करें। मैना ने यहां तक कहा कि यदि उसकी बात नहीं मानी गई तो वह विष खाकर, पर्वत से कूदकर या समुद्र में डूबकर अपने प्राण दे देगी। इधर शंकरजी ने सप्त ऋषियों का स्मरण किया और स्मरण करते ही वसिष्ठ आदि सप्त ऋषि अरुंधती के साथ वहां उपस्थित हो गए और शिवजी को प्रणाम करके उनसे सेवा की मांग की। शंकरजी ने सप्तर्षियों को बताया कि किस तरह से पार्वती ने कठोर तप किया और कैसे शिवजी ने स्वयं अपनी निंदा की और किस तरह तारकासुर के वध से देवताओं के उद्धार के लिए संतान उत्पत्ति की आवश्यकता है और किस तरह मैना पार्वती का उनसे विवाह न करने का प्रण कर चुकी है। शिवजी ने सप्तर्षियों को मैना और हिमालय को समझाने के लिए भेजा। उन्होंने कहा कि सप्तर्षि हिमालय के पास जाएं और उन्हें पार्वती तथा शंकर का विवाह करने का आदेश दें।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“विष्णुजी की यह बात सुनकर शिवजी ने उनसे कहा कि स्त्री का संग कुसंग है, वह निगूढ़ बंधन है और मुझे विहार और रमण कि कोई इच्छा नहीं है। फिर भी आपके कहने से तारकासुर के अत्याचारों से आपको मुक्त कराने के लिए मैं पार्वती से विवाह करूंगा।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
“गहन तपस्या के बाद भी शिवजी जब प्रकट नहीं हुए, तब पार्वती के माता-पिता ने और अनेक बंधुओं ने उन्हें समझाया और कहा कि जो शिव कामदेव के वश में नहीं आ सकते, जिन्होंने उसे भी भस्म कर दिया, उनकी प्राप्ति के लिए तुम्हारा उपाय व्यर्थ जाएगा। लेकिन पार्वती ने अपने निश्चय को दोहराया और कहा कि मैं भक्‍तों को प्रसन्न करने वाले शिवजी को अवश्य प्रसन्न करूंगी। पार्वती अपने तप पर दृढ़ रहीं और उन्होंने इतना कठोर तप किया कि उससे दु:खी होकर इन्द्र आदि देवता मेरी शरण में आए और मैं उनको साथ में लेकर विष्णुजी के पास गया। विष्णुजी ने परामर्श दिया कि हम सब साथ चलकर शिवजी से प्रार्थना करें। पहले हमने पार्वती के दर्शन किए और उन्हें साक्षात् सिद्धि स्वरुप देखा। हमने उनकी बहुत प्रशंसा की और शिवलोक में आकर शिवजी का वेदमंत्रों से स्तवन किया। हमारी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने हमारे आने का कारण पूछा। हमने तारकासुर के उपद्रवों और देवताओं के हित के लिए शिवजी से पार्वतीजी के साथ विवाह करने का अनुरोध किया। शिवजी ने कहा कि गिरिजा से विवाह करके मैं कामदेव को पुनः जीवित तो कर दूंगा लेकिन तुम सब देवता लोग अपने ही तप और अपने ही साधनों से अपने कष्टों का निवारण करने पर बल दो। यह कहकर शिवजी फिर आत्मलीन हो गए। हमने अत्यंत श्रद्धापूर्वक दीनहीन भाव से शिवजी की पूजा की। उनका स्तवन किया और इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने ध्यान भंग किया और देवताओं से उनकी इच्छा जाननी चाही। विष्णुजी ने सब कुछ जानने वाले शंकर से प्रार्थना की कि वह पार्वती से विवाह करें और उनके गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो, तब वही पुत्र तारकासुर का वध कर सकता है।”
Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran

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