“पर्वतराज ने ऋषियों से अरण्यराज का वृत्तांत विस्तार से जानना चाहा। वसिष्ठजी ने कहा कि पुराने समय की बात है। तेजस्वी अरण्यराज के अनेक पुत्र और एक रूपवती कन्या थी। कन्या का नाम पद्मा था। राजा अपनी पुत्री से बहुत प्रेम करता था। पुत्री के युवती होने पर राजा ने उसके लिए सुंदर और सुयोग्य वर की खोज की। एक दिन रूपवती पद्मा जल में विहार कर रही थी कि दूसरी तरफ से पिप्पलाद मुनि आए और वह पद्मा को देखकर उस पर मुग्ध हो गए। उन्होंने अरण्यराज के पास आकर उनकी कन्या की याचना की। राजा ने उनके बुढ़ापे को देखकर बहुत चिंता अनुभव की, परंतु पुरोहित के समझाने पर ऋषि के श्राप से कुल की रक्षा करने के लिए उन्होंने कन्या पिप्पलाद को दे दी। पिप्पलाद उसे लेकर अपने आश्रम में आ गए। पद्मा ने इस जीवन को ईश्वर का विधान मानकर स्वीकार किया और अपने पति की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया। एक दिन धर्म ने एक सुंदर युवक के रूप में विचरण करते हुए पद्मा को अपनी काम-भावना का शिकार बनाने की चेष्टा की। पतिव्रता सती ने युवक की भर्त्सना करते हुए उसे नष्ट हो जाने का श्राप दे दिया, तब धर्म ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया और बताया कि वह कामुकतापूर्ण व्यवहार ब्रह्माजी की आज्ञा से कर रहा था जो पद्मा की परीक्षा लेना चाहते थे। यह सुनकर पद्मा विचलित हो उठी। उसे दो बातों ने व्यग्र कर दिया। एक तो उसका श्राप अन्यथा नहीं हो सकता दूसरे कि धर्म के बिना लोकयात्रा का प्रवर्तन कैसे हो सकता है। अंत में पद्मा ने इस प्रकार व्यवस्था की कि धर्म को द्वापर में एक चरण और त्रेता में दो चरण और कलियुग में तीन चरण होकर रहना पड़ेगा। और वह सतयुग में पुनः चारों चरणों से युक्त हो सकता है। इस ओर धर्म ने पिप्पलाद को यौवन का वरदान दिया, जिसके कारण उसने पद्मा के साथ सुख-विलासपूर्वक रहते हुए अपना जीवन आनंददायक बनाया। वसिष्ठजी”
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Shiv Puran
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