“यह शिव नहीं हैं यह तो गंधर्व हैं, किन्नर हैं, यम हैं, अग्नि हैं, ब्रह्मा हैं, या और कोई देवता है। तुमने उनको बताया कि यह सब शिवजी के बंधु जन हैं और शिवजी इन सबसे अधिक सुंदर, तेजमय, और कांति वाले हैं तो मैना बहुत प्रसन्न हो गई, लेकिन शिवजी को देखते ही उनकी सारी प्रसन्नता तिरोहित हो गई और वह शोकाकुल हो उठीं। उसने शिवजी को बैल पर चढ़े हुए देखा जिनके पांच मुख थे, तीन नेत्र थे और उनके शरीर पर भभूत मली हुई थी। यह देखकर मैना मूर्च्छित हो गईं और उनकी सखियां उन्हें चेतना में लौटाने की कोशिश करने लगीं। जब मैना को होश आया तो वह विलाप करने लगीं और तिरस्कारपूर्ण बातें कहने लगीं। उसने इस तरह के पति को पाने के लिए तप करने वाली पार्वती को बहुत बुरा-भला कहा और इस विवाह को संपन्न कराने के लिए जिन लोगों ने भी प्रयास किया था, उन सबको अपशब्द कहे। वह विवाह के लिए जो सामान खरीदने आई थीं उसे भूल गईं, उन्हें लगा कि पार्वती की साधना बिलकुल ऐसी ही है जैसे सोना देकर कांच खरीदना या चंदन को छोड़कर धूल लपेटना, या गंगाजल को छोड़कर गंदला पानी पीना। उसने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैंने तो पहले ही समझाया था लेकिन वह नहीं मानी। इसपर मैंने मैना को समझाने की कोशिश की, तब उसने मुझे भी दुष्ट और अधम शिरोमणि कहकर दूर हो जाने के लिए कहा। मैना को अनेक देवताओं ने भी समझाया लेकिन वह नहीं मानीं, और उसने घोषणा कीं कि शंकर से उसका विवाह नहीं होगा। यह सुनकर सब लोगों में बेचैनी फैल गई। हाहाकार मच गया। स्थिति को नाजुक देखकर पर्वतराज हिमालय ने मैना को समझाना चाहा। उन्होंने कहा कि सत्य को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है। लेकिन मैना ने अपने पति की बात भी नहीं मानी। इसके बाद स्वयं पार्वती ने माता को समझाने का प्रयास किया। लेकिन पार्वती की बात सुनकर मैना और भी क्रोधित हो गईं और उसे अपशब्द कहने के साथ-साथ मारने-पीटने भी लगीं। उसकी यह हालत देखकर मैं फिर मैना के पास गया और उसे शिव के महत्त्व को समझाने की कोशिश की, शिवत्व का सार बताने का प्रयास किया लेकिन वह अपनी मान्यता से विचलित नहीं हुई। जब विष्णुजी ने मैना को कई तरह से समझाया तो उन्होंने आग्रह किया कि मैं तभी मान सकती हूं जब शंकर सुंदर वेश में आना स्वीकार करें। उसके बाद शिवजी को अत्यंत सुंदर और सुसज्जित वेष में मैना के सामने उपस्थित किया गया। उन्हें देखकर वह अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार हो गईं। इस सारी घटना के बाद अपने गणों को साथ लेकर शिवजी हिमाचल के दरवाजे पर आए। अपनी संपूर्ण निष्ठा और भक्ति के साथ मैना ने शिवजी की आरती उतारी, वह बार-बार मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देखती जाती थी और अपनी कन्या के भाग्य की सराहना भी करती जाती थी। वह शिवजी की रूप सुषमा पर मुग्ध हो गई।”
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Shiv Puran
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