“हिरण्यकशिपु के प्रपौत्र, प्रहलाद के पौत्र और विलोचन के पुत्र बलि का पुत्र बाणासुर था। बाणासुर भी अपने पिता और दादा की तरह शिवजी का भक्त था और अत्यंत दानी तथा उदार था। उसने भगवान शंकर से परिवार सहित अपने नगर में निवास करने का वरदान ले लिया। एक दिन शिवजी ने उस शोणित नगरी के बाहर नदी के किनारे नृत्य-गीत आदि का आयोजन किया। शिवजी की इच्छा हुई कि वे जल-विहार करें किंतु अभी तक पार्वती नहीं आई थीं। वहां पर जो अन्य स्त्रियां जल-विहार कर रही थीं उन्होंने सोचा, जो भी स्त्री शिवजी के साथ विहार करने में सफल हो जाएगी वह बड़ी भाग्यशालिनी होगी। यह सोचकर बाणासुर की पुत्री उषा ने पार्वती का वेष धारण किया और शिवजी के साथ विहार करने का लिए आई। किंतु जैसे ही वह शिवजी के पास पहुंची वैसे ही पार्वती जी आ गईं। उन्होंने क्रुद्ध होकर उषा को शाप दे दिया कि वह बैशाख सुदी द्वादशी की आधी रात को जब सो रही होगी तब कोई अज्ञात पुरुष उसका भोग कर लेगा। इस ओर बाणासुर शंकरजी की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने यह कहा कि हे भगवान! मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है और इसलिए मेरी भुजाओं की शक्ति व्यर्थ होती जा रही है। मैं क्या करूं? शिवजी ने बाणासुर की गर्व से भरी हुई यह बात सुनी और उसे आश्वासन दिया की जल्दी ही उसका कोई प्रतिद्वंद्वी आ जाएगा और उसे शक्ति प्रदर्शन का अवसर मिलेगा। बैशाख मास की द्वादशी को विष्णुजी की पूजा करने के बाद उषा सो रही थी तो श्रीकृष्ण का पौत्र अनिरुद्ध अंत:पुर में आया और उसने उषा के साथ बलात्कार किया। इस घटना से दु:खी होकर उषा आत्महत्या करने जा रही थी कि रास्ते में उसकी सखी चित्रलेखा उसे मिली और उसने उसे समझाया कि वह उसे गुप्त पति उपलब्ध करा देगी। जब चित्रलेखा ने अनेक देवों, गंधर्वों, महावीरों के चित्र उषा को दिखाए तो उसने अनिरुद्ध का चित्र देखकर लज्जा से सिर झुका लिया। चित्रलेखा ने अनिरुद्ध की खोज की और वह द्वारका गई तथा अपने तामसी योग से शय्या पर सोते हुए अनिरुद्ध को शय्या सहित उषा के अंत:पुर में ले आई। अपने प्रियतम को प्राप्त कर उषा आनंदमग्न हो गई और रति-विलास करने लगी। जब द्वारपालों को इस बात का पता चला तो उन्होंने सब कुछ बाणासुर को बता दिया। क्रोधित बाणासुर अंत:पुर से आया और अनिरुद्ध को युद्ध के लिए ललकारा। अनिरुद्ध ने वीरता का ऐसा प्रदर्शन किया जिसके फलस्वरूप बाणासुर ने उसे नागपाश से बांध दिया। उसने अपने अनेक सैनिकों को अनिरुद्ध के प्राणों को समाप्त करने का आदेश दिया। किंतु महामात्य कृष्मांड ने बाणासुर को समझाया कि वह अनिरुद्ध को न मारे। उधर अनिरुद्ध ने अपनी शक्ति के बल पर पिंजड़े को तोड़ दिया और फिर अपनी प्रियतमा के पास जाकर, रति-विलास करने लगा। भगवान कृष्ण के अंत:पुर में स्त्रियों के द्वारा रोने की ध्वनि सुनकर कृष्ण को अनिरूद्ध के विषय में पता चला।”
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Shiv Puran
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