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“कोई और शिवजी की निंदा करने का संकट नहीं उठा सकता। इन्द्र ने शिवजी का द्वार खटखटाया और उनसे अपनी निंदा करने के लिए कहा। शिवजी ने इंद्र का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वे ज्योतिषी के वेष में हिमालय के घर गए। उन्होंने शिव को कुरूप, अगुण, विकट, जटाधारी, श्मशानवासी आदि बताकर शिवजी की निंदा की और पर्वतराज हिमालय से कहा कि वे ऐसे शिव को अपनी लडकी न दें। ज्योतिषी की बातों में आकर मैना ने पर्वतराज हिमालय से कहा कि वे उसकी पुत्री को चाहे आजीवन अविवाहित रखें, लेकिन उसका विवाह शंकर से न करें। मैना ने यहां तक कहा कि यदि उसकी बात नहीं मानी गई तो वह विष खाकर, पर्वत से कूदकर या समुद्र में डूबकर अपने प्राण दे देगी। इधर शंकरजी ने सप्त ऋषियों का स्मरण किया और स्मरण करते ही वसिष्ठ आदि सप्त ऋषि अरुंधती के साथ वहां उपस्थित हो गए और शिवजी को प्रणाम करके उनसे सेवा की मांग की। शंकरजी ने सप्तर्षियों को बताया कि किस तरह से पार्वती ने कठोर तप किया और कैसे शिवजी ने स्वयं अपनी निंदा की और किस तरह तारकासुर के वध से देवताओं के उद्धार के लिए संतान उत्पत्ति की आवश्यकता है और किस तरह मैना पार्वती का उनसे विवाह न करने का प्रण कर चुकी है। शिवजी ने सप्तर्षियों को मैना और हिमालय को समझाने के लिए भेजा। उन्होंने कहा कि सप्तर्षि हिमालय के पास जाएं और उन्हें पार्वती तथा शंकर का विवाह करने का आदेश दें।”

Vinay Bhojraj Dwivedi, Shiv Puran
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Shiv Puran (Hindi) Shiv Puran by Vinay Bhojraj Dwivedi
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