“भगवान शंकर की प्रार्थना करने लगे कि वे इन्द्र के अपराध को क्षमा कर दें। भगवान शिवजी बृहस्पति की स्तुति से प्रसन्न होकर इन्द्र को क्षमा करते हुए उठ गए। लेकिन उन्होंने अपने मस्तक के नेत्र से निकले हुए तेज को अपने हाथ में लेकर क्षीर समुद्र में फेंक दिया। एक क्षण के बाद ही यह तेज एक बालक का रूप धारण कर लिया और गंगासागर के संगम पर ऊंचे स्वर में रोने लगा। उसके रोने को सुनकर लोकपाल बहुत चिंतित हुए और उनके निवेदन करने पर ब्रह्माजी उस बालक के पास गए। उस बालक ने उनके गले में बाहें डाल दीं और उसने उनका गला इतनी जोर से दबाया कि ब्रह्माजी की आंखों से आंसू निकलने लगे। उसकी इस शक्ति को देखकर ब्रह्माजी ने उसका नाम जलंधर रख दिया। ब्रह्माजी ने उसके भविष्य-फल को देखा तो अनुमान लगाया कि यह बालक दैत्यों का अधिपति, प्रबल पराक्रमी, सबको जीतने वाला और शिवजी के अतिरिक्त किसी के द्वारा भी अवध्य होगा।”
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Shiv Puran
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