त्रिकूट Quotes
त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
by
Pradyumna Kumar Tiwari3 ratings, 4.67 average rating, 3 reviews
त्रिकूट Quotes
Showing 1-23 of 23
“प्रत्येक स्त्री में पुरुष और प्रत्येक पुरुष में स्त्री उसी भाँति अव्यक्त रूप से विद्यमान रहती है जैसे कोयले की कालिमा में हीरे की छटा, कठोर पर्वतों के हृदय में कोमल सरिता, जल में प्रचंड अग्नि, पापी में पवित्र परमात्मा, नृत्य में एक शांत लय, शांति में शिव का नृत्य और शून्य में अनंत ब्रह्मांड।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“पश्चताप की अग्नि बहुत भयंकर होती है, जो व्यक्ति के जीवन के हरित उपवन को धीरे-धीरे सुखाकर निर्जन मरुस्थल में बदल देती है और मृत्यु ही उसकी अंतिम गति होती है, किन्तु यदि यही अग्नि दायित्व से जुड़ जाती है तो व्यक्ति की पवित्र शक्ति में परिणत हो जाती है। यही वास्तव में प्रायश्चित का वह मार्ग है, जिसकी मंजिल निःश्रेयष है, शांति है, आनंद है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“पश्चाताप में किया गया आत्मदाह प्रायश्चित नहीं बल्कि पाप के शृंखला की अंतिम कड़ी मात्र होता है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“अपराधी के मन में यदि अपराधबोध ही न हो तो क्षमा उसके लिए अपनी योजना की कमियाँ सुधार कर उसे और सिद्धि-प्राय बनाने का स्वर्णिम अवसर मात्र होती है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“स्वार्थ ऐसा हो, कि स्वार्थ और परमार्थ में अभेद हो जाए।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“किन्तु धर्मयज्ञ से होने वाली सुख-वृष्टि सदा आहुतियाँ माँगती है। सूर्य भी सरिताओं से जल माँगकर ही धन-धान्य की वर्षा करता है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“उन्नति, तकनीकी शक्ति और स्वतंत्रता के शिखर आकाश में अचानक नहीं उठते; वे धर्म और संस्कृति की धरती से जन्म लेते हैं, और उसी आधार के दृढ़ रहने पर ही अटल बने रहते हैं।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“जब माता या पिता में से कोई एक बालक के निर्माण में अनुपस्थित हो जाता है, तब उसके भीतर का संतुलन टूट जाता है। वही संतुलन जो अर्धनारीश्वर का तत्व है। जब यह तत्व अनुपस्थित होता है, तब पुरुष केवल एक शक्तिशाली यंत्र बन जाता है और स्त्री मात्र एक सजीली वस्तु।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“सच्ची सहिष्णुता की पराकाष्ठा कोमलता के हृदय में ही जन्म लेती है; कठोरता तो समय की पहली चोट में ही चटक जाती है। उन”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“दामिनी सी मुस्कान, व्यंग्य के समान,
सुखाकर रक्त तप्त, हरता है प्राण,
करता उपहास, कर पुष्प में निवास,
रच विष कूट, स्वयं मधुमय मिठास,
कोयल सा मधुर, झरनों का संगीत,
मृत्यु का कोलाहल बन करता भीत।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
सुखाकर रक्त तप्त, हरता है प्राण,
करता उपहास, कर पुष्प में निवास,
रच विष कूट, स्वयं मधुमय मिठास,
कोयल सा मधुर, झरनों का संगीत,
मृत्यु का कोलाहल बन करता भीत।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“देवी, पुष्पेंद्र इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि बुद्धिमत्ता जब प्रेम, करुणा और परोपकार की नींव से कट जाती है, तो वह केवल विनाशकारी हो जाती है। ज्ञान यदि हृदय की संवेदनाओं से न जुड़ा हो, तो वह केवल एक धारदार शस्त्र है जो चलाने वाले को भी नहीं छोड़ता। भावनाविहीन मनुष्य उस हिंसक पशु के समान है जिसके पास विवेक तो है, पर विवेक का उपयोग केवल संहार के लिए है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“शांति जब बहुत लंबी और गहरी होने लगे, तो वह अक्सर किसी बड़े झंझावात की पूर्व-सूचना होती है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“प्रजा की मृत्यु पर मूक दर्शक बना रहने वाला राजा भी उस गिद्ध के समान है, जो भूख से तड़पते बालक का माँस नोचने के लिए उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा करता है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“लोग कहते मैं निशा का करती हूँ मान-मर्दन,
किन्तु निशा ने स्वयं ही कर लिया मेरा वरण।
निशा मेरे संग से जगमगाती है,
कालिमा उसकी मेरी लौ को सजाती है।
निशा मेरे संग से होती है तृप्त,
मैं उसकी नंदिनी कहलाती, निशिदीप्त।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
किन्तु निशा ने स्वयं ही कर लिया मेरा वरण।
निशा मेरे संग से जगमगाती है,
कालिमा उसकी मेरी लौ को सजाती है।
निशा मेरे संग से होती है तृप्त,
मैं उसकी नंदिनी कहलाती, निशिदीप्त।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“संप्रभुता का मूल्य चुकाकर प्राप्त किया गया वैभव, निर्धनता से भी अधिक कलंकित होता है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“कामना जब धर्म से विमुख हो जाती है, तो वह 'लोलुपता' बन जाती है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“इस अनिश्चित जीवन में 'विश्वास' ही आशा का वह दीप है जो समाज को जोड़े रखता है। निस्वार्थ प्रेम और पवित्र विश्वास अपराध नहीं हैं, वरन जीवन का आधार हैं।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“नीलमणि ने जब प्रवरा की आँखों में देखा, तो उसे लगा जैसे उनमें अथाह प्रेम का कोई सागर उमड़ रहा है। नीलमणि ने जब प्रवरा को उस मूक समर्पण के भाव में देखा, तो उसकी आत्मा में स्थित प्रेम अब मूर्त रूप लेने को विकल हो उठा। निराकार अब साकार होने को व्याकुल हो उठा। पुष्प की श्रद्धा उसे अपने आराध्य तक खींच लाई—वही श्रद्धा जिसे अभिव्यक्त करने में शब्द असमर्थ थे। अंततः दोनों ने माया-रूपी-शरीर को निराकार तत्व की अनुभूति का साधन मान लिया- वही माया जो दो निराकार तत्वों के विलय में बाधक भी थी और एक-मात्र माध्यम भी।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि स्त्री स्वयंवर में जीती जाने वाली कोई ‘वस्तु’ नहीं है। प्रतियोगिताएँ तो मात्र आधार हैं। यदि राजकुमारी ने पहले ही अपने मन में किसी का वरण कर लिया है, तो भी हमें उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए। विवाह एक व्यक्तिगत निर्णय है, न कि किसी कौशल अथवा शक्ति-प्रदर्शन का पुरस्कार!”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“प्रेम यदि निस्वार्थ हो, सीता तभी संग होगी,
पूर्ण निष्ठा समर्पण से ही, ये धनु भंग होगी।
संभवतः यह पवित्र प्रेम की उसी शक्ति की पराकाष्ठा थी, जिसने श्रीराम को पाँच दिवस में महासागर पर सेतु बांधने का सामर्थ्य दिया था अथवा आज फिर वही संकल्प-शक्ति प्रकट हो गयी थी, जिसने युगों पहले रघुवंशियों को अजेय बना दिया था।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
पूर्ण निष्ठा समर्पण से ही, ये धनु भंग होगी।
संभवतः यह पवित्र प्रेम की उसी शक्ति की पराकाष्ठा थी, जिसने श्रीराम को पाँच दिवस में महासागर पर सेतु बांधने का सामर्थ्य दिया था अथवा आज फिर वही संकल्प-शक्ति प्रकट हो गयी थी, जिसने युगों पहले रघुवंशियों को अजेय बना दिया था।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“स्वार्थ ही यदि होगा आधार,
होंगे बहुविवाह व व्यभिचार,
कैकेयी का होगा उद्भव,
षड़यंत्र तब लेंगे आकार,
विमाता से ममता का, उतरेगा यदि आवरण,
राम को वनवास तथा, दशरथ का होगा मरण।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
होंगे बहुविवाह व व्यभिचार,
कैकेयी का होगा उद्भव,
षड़यंत्र तब लेंगे आकार,
विमाता से ममता का, उतरेगा यदि आवरण,
राम को वनवास तथा, दशरथ का होगा मरण।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“प्रवरा रूपी शक्ति आज कल्याण रूपी शिव को ढूँढ रही थी, जिसके संग से पूर्ण अर्द्धनारीश्वर सा चमत्कार प्रकट होने वाला था। वही अर्द्धनारीश्वर तत्त्व जिसके पूर्ण अभाव से पुरुष एक शक्तिशाली यंत्र मात्र बन जाता है और स्त्री मात्र एक सजीली वस्तु, पौरुष मात्र अहंकार बन जाता है और स्त्रीत्व मात्र प्रदर्शन। एक मानवीय स्वतंत्रता का दमन करने लगता है तथा दूसरे की स्वतंत्रता स्वच्छंदता में परिवर्तित होने लगती है। इसी तत्व के अभाव में रावण और सूर्पनखा का जन्म होता है। ये दोनों असंतुलित ऊर्जाएँ उन्मुक्ततता का रूप ले लेतीं हैं तथा इसके भी चरम से चमत्कार प्रकट होता है, विनाशकारी चमत्कार- शिव का प्रलयंकारी तांडव।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
“कविता उन में विलीन हो रही है, वह कविता में और शेष है सिर्फ असीम अखंडित आनंद जो एक अखंड शून्य की भाँति अगणित भागों में खण्डित हो रहा, किन्तु प्रत्येक भाग वही पूर्ण शून्य है।”
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
― त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
