Jalti Hui Nadi Quotes
Jalti Hui Nadi
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Jalti Hui Nadi Quotes
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“पत्रकारिता इस क़दर भ्रष्ट हुई थी कि संजय की पत्नी मेनका गांधी ने अपने पत्र ‘सूर्या’ में जगजीवनराम के (राज) पुत्र सुरेशराम और उसकी प्रेमिका सुषमा की नंगी तस्वीरें छापी थीं, जिन्हें सूर्या सम्पादक मेनका ने, समाजवादी (‘नेता जी’) राजनारायण को भरपूर रकम दे के ख़रीदा था।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“खुले आसमान के नीचे बैठने से बहुत कुछ बदल जाता”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“बरसात का एक भीगा हुआ दिन। मलाबार हिल के गुलमोहर बारिश आने की सूचना दे चुके थे।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“तुर्शी भरी जो बातचीत हुई थी”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“अशोक जी! आप अपने घरों में चेरयमैन, एम. डी., डायरेक्टर और प्रोपराइटर पैदा कर सकते हैं–कमलेश्वर पैदा नहीं कर सकते...कमलेश्वरों के लिए आपको हमेशा बाहर ही देखना पड़ेगा!”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“अशोक जी! आप इंडस्ट्रियल परिवार में पैदा होकर टाइम्स के चेयरमैन हो सकते हैं...शब्द और समाचार से अलग आप सीमेंट फैक्ट्री के एम. डी. हो सकते हैं, शुगर मिल के डायरेक्टर हो सकते हैं, पेपर मिल के मालिक हो सकते हैं, एक्सपोर्ट कम्पनी के प्रोपराइटर हो सकते हैं...अगर इतने ‘डाइवर्जेंट’ डिसीप्लिंस को आप सँभाल सकते हैं तो मैं तो शब्द के एक से और एक-दूसरे से जुड़े हुए डिसीप्लिंस को ही सँभाल रहा हूँ...”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“मेरी दुनिया शब्द की दुनिया है...और इन तमाम अनुशासनों (डिसीप्लिंस) में मुझे शब्द की ही ज़रूरत पड़ती है...इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं होती...साहित्य का शब्द टेलिविजन में काम आता, टेलिविजन का शब्द फ़िल्म में और फ़िल्म का शब्द जनता से बात करते आंदोलनों में...उसने तल्ख़ी से कहा था–ये डिसीप्लिंस एक ही तरह के हैं। विचार, शब्द और भाषा के...”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“तो बेनेट कोलमेन एंड कम्पनी, यानी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के शिखंडी चेयर मैन अशोक जैन ने उसे बुलाया और वे आमने-सामने थे।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“अशोक जैन एक दमित व्यक्तित्व के आदमी हैं। हीनता ग्रंथि और अरबों-खरबों के साम्राज्य के मालिक।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“टाइम्स संस्थान और केन्द्रीय सरकार के बीच कुछ घृणित समझौते हुए थे। मालिकाना हक़ वापस देने के बदले में तब जनसंघी सूचना-प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी (आज सन् 1998 में भाजपा-गठबंधन सरकार के गृहमंत्री) ने कुछ पत्रकारों की गर्दनों की माँग की थी। इसमें इकोनोमिक टाइम्स के सम्पादक रांग्नेकर, नवभारत टाइम्स के सम्पादक-द्वय अक्षय कुमार जैन (प्रधान सम्पादक) और महावीर अधिकारी (बम्बई), माधुरी सम्पादक अरविंद कुमार, दिनमान के विशेष संवाददाता श्रीकांत वर्मा और सारिका सम्पादक कमलेश्वर शामिल थे।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“श्रेयांस जी नहीं पहचानते, यह इस बात का सबूत है कि कमलेश्वर इन घरानों की दरबारदारी करने नहीं आता...वह यहाँ आपके सम्मान में हाज़िर हुआ है!”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“दिनकर जी को यह स्थिति और परिचय बहुत नागवार गुज़रा था। उन्होंने आगे आकर श्रेयांस जी से कहा था–आश्चर्य है! आप कमलेश्वर को नहीं जानते! ये आपकी ‘सारिका’ के सम्पादक ही नहीं, कमलेश्वर भी हैं!”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“वह जब उषा किरण नाम की सबसे ऊँची इमारत की सबसे ऊँची मंज़िल में पहुँचा”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“मनुष्य की सम्यक् मुक्ति के संघर्ष में शामिल होने के सिवा साहित्य की अपनी कोई नियति न कभी थी, न है, न होगी।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“भारतीय आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पूँजीवाद जिस तरह आज अटका हुआ है, वहाँ से न तो क़ीमतें गिरायी जा सकती हैं, न उत्पादन बढ़ाया जा सकता है (उत्पादन बढ़ाकर वे क्या करेंगे, जब ज़रूरतों का बाज़ार ही आर्थिक विपन्नता के कारण नहीं बन पाया है)। ‘दूसरी आज़ादी’ बड़ी चतुराई से चोर दरवाज़ों की चाबियाँ इन सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक कुलीनों को थमा चुकी थी और मुख्य दरवाज़ों पर राजनीतिक पहरेदारों के रूप में हिंस्त्र साम्प्रदायिक शक्तियों को तैनात कर चुकी थी! ऐसे में तीसरी आज़ादी के सिवा विकल्प क्या था?”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“मफ”तलाल की साड़ियाँ, टाटा के साबुन, गोडरेज की आलमारियाँ, उषा के पंखे, दिग्जाम के कपड़े, एटलस की साइकिलें, बजाज के स्कूटर, लैक्मे की क्रीमें, पार्ले के बिस्कुट, विल्स की सिगरेटें और ग्वालियर की सूटिंग अब उत्पादन के उस स्तर तक पहुँच चुके हैं और बिक्री की उस रेखा को छू चुके हैं–जहाँ नव-धनाढ्य तबका उन्हें ख़रीद-ख़रीदकर सामाजिक सवर्ण बन चुका है और अब बाजारवादी संस्कृति के बाद भारतीय उत्पादों को छोड़कर विदेशी माल की तरफ झुक चुका है। आर्थिक शोषण का जो निर्बाध दुष्चक्र चलता रहा, उसने गरीब को ‘अमीर’ नहीं होने दिया, क्योंकि उनकी ग़रीबी पर ही अमीरी को टिकाया गया। अब नव-धनाढ्य वर्ग अपनी ज़रूरतों के लिए कमो-बेश सन्तुष्ट हो चुका है। उसके घरों में शानदार परदे लग चुके हैं, पार्लर में शराब की बोतलें सज चुकी हैं, बच्चों के नाम शेयर खरीदे जा चुके हैं, बीवियाँ कीमती हीरे और सिल्क की साड़ियाँ पहने, विदेशी नेल पालिश और लिपस्टिक लगाए सामाजिक कुलीनता का शो-केस बन चुकी हैं। सन्तानें अमरीका पढ़ने पहुँच चुकी हैं।”
― Jalti Hui Nadi
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“मात्र आर्थिक पूँजीवाद ही अपने चरित्र-दोष के कारण अंधी गली में नहीं पहुँच चुका है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पूँजीवाद भी अंधे कुत्ते की तरह आर्थिक पूँजीवाद की सुरक्षा के लिए उसकी गली में भौंक रहा है!”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“दूसरी आज़ादी के जनक, लोकनायक, लोकतंत्र के तथाकथित संस्थापक श्री जयप्रकाश नारायण के पास जब प्रतिवाद का एक पत्र भेजा गया तो लोकतंत्र के संस्थापक-संरक्षक ने पत्र लेने से इनकार कर दिया। डाकिए ने लिखा–पत्र लेने से इनकार किया। यानी उसकी आवाज़ उस तक लौट आई! एक गहरा शून्य यहाँ भी व्याप्त था।”
― Jalti Hui Nadi
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“सवर्ण-सामन्ती आपात्काल चालू था। इस आपात्काल में जब ‘मेरा पन्ना’ के लेखक ने श्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर पूछा–‘‘कि आपके भारत में उस जैसे लेखक को साम्प्रदायिकता की गंदी राजनीति और गुलामी से आज़ाद रहकर कहने, बोलने और अपने लोगों से मानसिक सम्पर्क बनाए रखने का अधिकार है या नहीं? उसे ‘सारिका’ पत्रिका से दलितों-वंचितों-शोषितों की आवाज़ को साहित्य की केन्द्रीय आवाज़ बनाए रखने का अधिकार है या नहीं? आप इतना बता दीजिए कि इस देश में उस जैसे वामपंथी को अपने समय में घुटते, यातना सहते आम आदमी के लिए लिख सकने का हक” है या नहीं?”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“दूसरी आज़ादी’ में आज़ादी निरपेक्ष है या सापेक्ष? तय यह होना था कि आज़ादी सबकी है या मात्र साम्प्रदायिक शक्तियों और उनका साथ देने वाले अवसरवादियों और समझौता-परस्तों की है, या कि उन करोड़ों लोगों की जो प्रतिवाद का हक़” नहीं छोड़ना चाहते? एक दौर था जब क़ानूनी आपात्काल लागू था। अब दूसरा दौर था–सवर्ण-सामन्ती हिन्दू आपात्काल लागू था!”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“दूसरी आज़ादी’ में आज़ादी निरपेक्ष है या सापेक्ष? तय यह होना था कि आज़ादी सबकी है या मात्र साम्प्रदायिक शक्तियों और उनका साथ देने वाले अवसरवादियों और समझौता-परस्तों की है, या कि उन करोड़ों लोगों की जो प्रतिवाद का हक़” नहीं छोड़ना चाहते?”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“तथाकथित दूसरी आज़ादी के अलमबरदारों के राज में अभिव्यक्ति की आज़ादी पत्रकारों-सम्पादकों-लेखकों से स्थानान्तरित करके मालिकों को दे दी गई! अब पत्र-पत्रिका के चिन्तन और लेखन के स्वर का दायित्व पूँजीवादियों को दे दिया गया! और सम्पादक की हैसियत नौकरों की हो गई, जो पत्रों के लिए नियुक्त किए गए थे!!!”
― Jalti Hui Nadi
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“टाइम्स ऑफ़ इंडिया के कामगारों-पत्रकारों की उस यूनियन को तोड़ा गया, जो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता श्री कोलहटकर के नेतृत्व में बरसों से सक्रिय थी। इसी समय “मेरा पन्ना” में बोहराओं का सवाल उठाया गया और जयप्रकाश नारायणजी की साहसहीनता को उन्हीं के अन्तर्विरोधी पत्रों के द्वारा स्पष्ट किया गया।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
“टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे इज़ारेदार घराने की मुश्किल यह है कि उसे हमेशा अपने अख़बारी संस्थान के स्वर को सत्ता में आसीन राजनीतिक पार्टी के हित में बदलना ही होता है। पूँजीवाद इस “सह-अस्तित्व” को मंजूर करता है, क्योंकि इसी से उसकी इजारेदारी की शक्ति और क्षमता बढ़ती है।”
― Jalti Hui Nadi
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“सरकारी नौकरशाही जब कोई सख़्त आदेश देती है तो बड़े-से-बड़ा नौकरशाह भी अपनी लाचारी ज़ाहिर कर देता है, पर पूँजीवादी नौकरशाह के आदेश शालीन ठंडापन और आदमी को तोड़ डालने की चतुराई-भरी क्रूरता से भरे होते है। पूँजीवादी नौकरशाह एक ज़ालिम डॉक्टर की तरह होता है जिसे इलाज के लिए नहीं, हत्या के लिए रखा जाता है। वह अपने काम में बहुत तेज़ होता हे। जानता है कि जिसका “इलाज” किया जाना है उसे दोस्ती और सम्मान का कितना डोज़ देना है, औपचारिकता की कितनी गोलियाँ देनी हैं और उसके बाद दिमाग़ के किस हिस्से को शून्य करके, कहाँ पर, किस वक्त, कितना नश्तर लगाना है! जिस”
― Jalti Hui Nadi
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“मालिकों ने पहचानना बंद कर दिया। वे कमलेश्वर को अब नहीं जानते थे–वे “सारिका” के सम्पादक कमलेश्वर को पहचानने लगे। संस्थान में काम करने वाला लेखक कमलेश्वर एकाएक संस्थान का नौकर कमलेश्वर हो गया!”
― Jalti Hui Nadi
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“पन्ना” का लेखक आपात्काल का “सताया” हुआ व्यक्ति है, इसलिए वो आपात्काल के संरक्षकों की खाल उधेड़ेगा! उनकी नीयत एक लेखक को बोलने की आज़ादी देने की नहीं थी, बल्कि एक लेखक की आज़ादी को अपने लिए इस्तेमाल करने की थी!”
― Jalti Hui Nadi
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“आल इंडिया राइटर्स फ़ोरम” का घोषित उद्देश्य प्रगतिशील मार्क्सवादी विचारधारा को उखाड़ फेंकना था। इस मुहिम में कांग्रेसी शक्तियों के साथ वे शक्तियाँ भी शामिल थीं जो राजनीति के स्तर पर कांग्रेस-विरोधी थीं, पर सांस्कृतिक स्तर पर कांग्रेस के इसलिए साथ थीं कि वे वामपंथी विकल्प को दबाना चाहती थीं। इस मुहिम में जनसंघ, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की इच्छाओं में कुछ भेद नहीं था।”
― Jalti Hui Nadi
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“यही सारी सृष्टि का अन्तर्विरोध है, द्वंद्व है कि बर्फ की तरह जो ठण्डक देता है, वह जलाता भी है।”
― Jalti Hui Nadi
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“ज़िन्दगी का एहसास तो देगी! उस सन्नाटे को तो तोड़ेगी ...खुद उससे लड़ेगी पर दुनिया से उसके लिए लड़ेगी... और गायत्री ने अपने अपार धीरज के साथ शादी के बाद यही किया भी।”
― Jalti Hui Nadi
― Jalti Hui Nadi
