“मफ”तलाल की साड़ियाँ, टाटा के साबुन, गोडरेज की आलमारियाँ, उषा के पंखे, दिग्जाम के कपड़े, एटलस की साइकिलें, बजाज के स्कूटर, लैक्मे की क्रीमें, पार्ले के बिस्कुट, विल्स की सिगरेटें और ग्वालियर की सूटिंग अब उत्पादन के उस स्तर तक पहुँच चुके हैं और बिक्री की उस रेखा को छू चुके हैं–जहाँ नव-धनाढ्य तबका उन्हें ख़रीद-ख़रीदकर सामाजिक सवर्ण बन चुका है और अब बाजारवादी संस्कृति के बाद भारतीय उत्पादों को छोड़कर विदेशी माल की तरफ झुक चुका है। आर्थिक शोषण का जो निर्बाध दुष्चक्र चलता रहा, उसने गरीब को ‘अमीर’ नहीं होने दिया, क्योंकि उनकी ग़रीबी पर ही अमीरी को टिकाया गया। अब नव-धनाढ्य वर्ग अपनी ज़रूरतों के लिए कमो-बेश सन्तुष्ट हो चुका है। उसके घरों में शानदार परदे लग चुके हैं, पार्लर में शराब की बोतलें सज चुकी हैं, बच्चों के नाम शेयर खरीदे जा चुके हैं, बीवियाँ कीमती हीरे और सिल्क की साड़ियाँ पहने, विदेशी नेल पालिश और लिपस्टिक लगाए सामाजिक कुलीनता का शो-केस बन चुकी हैं। सन्तानें अमरीका पढ़ने पहुँच चुकी हैं।”
―
Jalti Hui Nadi
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