Kadambari Quotes

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Kadambari (Hindi Edition) Kadambari by Radhavallabh Tripathi
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“पता नहीं कब नवयौवन ने मेरे देह की देहरी पर पग रख दिए। वह ऐसे आ गया था जैसे वसंत में मधुमास आता है, मधुमास में कोंपल आती हैं, कोंपलों पर फूल आते हैं, फूलों पर भौंरे आते हैं और भौंरों में जैसे मद आता है। मधुमास का ही तो समय था। कोमल मलयमारुत के मीठे झकोरों में अनंग के सुकुमार ध्वजांशुक फहरा–फहरा उठते। भौंरों के झुंड–के–झुंड नवमालिका की बेलों पर झूम रहे थे, जिससे नवमालिका के श्वेत पुष्पगुच्छ काले–काले लगने लगे थे। विरहिणियों के प्राण ले–लेकर कामदेव विजय के दर्प से कुसुम शरासन पर टंकार दे रहा था। उस टंकार को सुन–सुनकर प्रवासी पथिकों के तो हृदय ही विदीर्ण हो रहे होंगे। वनभूमि पर वासंती हवा के झौंकों में टपक–टपककर गिरे टेसू के फूलों के गुच्छे उन्हीं के हृदयों के रक्त से दिए छींटों जैसे दिखते थे। इसी सरोवर पर माँ के साथ स्नान के लिए आई थी मैं उस दिन। उधर वे चट्टानें देख रहे हैं, राजकुमार! उन पर भगवती पार्वती ने स्वयं अपने हाथों से भगवान् शिव की मूर्तियाँ उकेरी हैं। उन शिवमूर्तियों को प्रणाम कर मैं अपनी सखी तरलिका के साथ टहल रही थी उधर–कभी मधु की धार चुआते आम के उस पेड़ के तले टिक जाती, कभी उस चंदन वीथी में अटक जाती, कभी वनदेवियों के हिंडोले–सी उस लता दोला में डोलने लगती। मैं इस सारे दृश्य की रमणीयता में रमी हुई थी, अपने सुख से अभिभूत थी, अपने भाग्य पर इठला रही थी और अपनी आयति से अनजान थी। यों ही टहलते–टहलते मैं एक स्थान पर ठिठक गई। सुगंध का एक अलौकिक झौंका नासिका से टकराया था। ऐसी दिव्य सुगंध इसके पहले कभी नहीं जानती थी। उस एक अकेली सुगंध ने सारे वनप्रांत के असंख्य फूलों के सुरभि–समुदाय को दबा दिया था। मैं मधुकरी–सी उस अमानुष अद्भुत सुगंधि से खिंची चली गई उस दिशा में जिधर से वह आ रही थी। सामने से एक मुनिकुमार आ रहे थे। तेज से दिपदिपाता मुख, जैसे विद्युत्पुंज को पिंजरे में बंद कर दिया गया हो, जैसे ग्रीष्म के मध्याह्न की सूर्यकिरणों को किसी वलय में बाँध दिया गया हो। उनके देह की आभा इस सारे कानन को सोने के रस से पोत रही थी। पुण्य की पताका–सी भस्म की रेखा उनके ललाट पर लगी थी, लगता था जैसे सरस्वती से समागम करने को उत्कंठित गंगा का प्रवाह आ गया हो अपनी हिलोरों से सैकत की रेखाएँ बनाता हुआ। हाथ में स्फटिक की अक्षमाला झूल रही थी। माला क्या थी, मदनदाह से शोकातुर रति के आँसुओं की बूँदों से जैसे उसे बनाया गया था। उन्हीं मुनिकुमार के कान में झूल रही थी वह सुरतरु की कुसुममंजरी, उसी से फूट रही थी वह दिव्य गंध, जिससे खिंचकर मैं उनके सामने आ गई थी। उनके कान की मंजरी भी कैसी–जैसे पुष्पलक्ष्मी की यौवनशीला हो, या कामदेव से समागम के समय रति के मुख पर छितराई स्वेदजल की जालिका हो। आज भी समझ नहीं पाती हूँ मैं कि कैसे और कितनी देर में निर्निमेष उन मुनिकुमार को देखती रही थी। उस समय तो लगा जैसे वे कोई मुनि नहीं, माया हैं,”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“आँवले के बराबर रुद्राक्ष की मालाओं के वलय उसने पहन रखे थे। श्वेत गंगा में नहाते हंसों की जोड़ी से उसके स्तनयुगल कल्पवृक्ष की छाल से बने उत्तरीय की ग्रंथि में आबद्ध थे। कंधे पर झूलता ब्रह्मसूत्र चंद्रकिरणों को गूँथकर बनाया हुआ लगता था। यौवन उस कन्या की पावनता और निर्विकारता के आगे शिष्य–सा, विनीत–सा रहकर भी उसके देह की लावण्यमय आभा में से झाँक रहा था। उस तपस्विनी ने अपने यौवन और सौंदर्य को पुण्यों की सलिलधारा में धो–धोकर और भी रमणीय और उज्ज्वल बना दिया था। अंक में रखी वीणा को उसके दाहिने हाथ की अंगुलियाँ छेड़ रही थीं, पर स्वरों की झंकार वीणा के तारों से फूट रही थी या उसकी कलाई में बँधे शंख वलयों से–कहना कठिन था।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“चंद्रापीड चकित होकर कुछ देर उस अपार सौंदर्यराशि के आगे ठिठका खड़ा रह गया। ‘मैं कैलास के नीचे अच्छोद सरोवर तक आ पहुँचा?’ फिर वह बड़बड़ा उठा–‘धन्य हुआ मेरा वह सारा व्यर्थ का अनुधावन, जो यह अनुपम दृश्य देखकर नेत्रों ने निर्वाण पा लिया। कहते हैं, यहाँ तो ब्रह्मा स्वयं कमंडल में जल भरने आते हैं, स्वयं भगवती सावित्री यहाँ अवगाहन करती हैं। तो मैं आज दर्शनीयता की अवसान भूमि पर आ गया। आह्लाद की थैया मिल गई। मनोहारिता का सीमांत सामने आ गया।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“अंतिम पड़ाव था सुवर्णपुर, धुर उत्तर में कैलास के निकट। किरातों की निवासस्थली। उसके आगे धरती समाप्त हो जाती है, स्वर्ग की सीमा आरंभ होती है। हिमालय के रजतमय गगन चूमते शिखरों का अनंत विस्तार और उच्छाय नेत्रों को प्रतिहत कर रहा था। असीम का उल्लास पूरी उजास के साथ फैला था। चंद्रापीड अपनी सीमाएँ भूल गया। तय किया–अद्भुत पुष्पों, दुर्लभ वनस्पतियों और विचित्र जीव–जंतुओं से भरे इस प्रदेश में कुछ दिन विश्राम करेगा। हिमालय”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“सत्य है कि राजकुल में पतन के बीज हैं। यह भी सत्य है कि यह अनाचार का केंद्र भी है। पर यह व्यवस्था की धुरी भी है।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“कोई केवल सागर की तरंगों का क्षोभ देखता रह जाए, तो पारावार की अपार गहराई को नहीं समझ पाएगा।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“तुम्हें कुछ भी शिक्षा देना पुनरुक्तिमात्र है। फिर भी यौवन का अँधियारा बड़ा सघन होता है, इसे किसी भी दीप की प्रभा दूर नहीं कर सकती, कोई सूरज इसे नहीं मिटा पाता। आत्मविवेक के द्वारा ही इस अच्छेद्य अभेद्य अंध तमस में डूबने से अपने–आप को कोई पुरुष बचा पाता है। विवेक से तनिक–सा च्युत हुआ व्यक्ति, कि पतन के किस गर्त में गिरेगा, क्या कहा जा सकता है।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“बहुत गहरा, मंद्र, मेघस्तनित–सा स्वर, अथाह सागर के भीतर से उठा–सा, चित्त में सहसा आलोडन–विलोडन और उत्कंपन उत्पन्न करता हुआ–सा। पत्रलेखा देवी विलासवती के आगे शीश नवाए खड़ी थी। एक वेणी–अधसँवरी, अधखुली–कंधे से झूलकर वक्ष पर सर्पिणी–सी सरककर त्रिवली–तरंगविषम मध्यभाग से नीचे झूल रही थी। माथे पर इंद्रगोपिका जैसा रक्तांशुक नीचे आकर उसके कपोलों को ढके हुए था, जैसे सूर्य की किरणों ने चंद्रमा को लपेट रखा हो। चंद्रापीड को लगा पूर्वदिशा से उषा इस असमय में यहाँ चली आई है।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“बहुत गहरा, मंद्र, मेघस्तनित–सा स्वर, अथाह सागर के भीतर से उठा–सा, चित्त में सहसा आलोडन–विलोडन और उत्कंपन उत्पन्न करता हुआ–सा। पत्रलेखा”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“जैसे प्रदोष को चंद्रोदय, वर्षा को इंद्रधनुष तथा कल्पवृक्ष को पुष्पोद्गम रमणीय बना देते हैं, वैसे ही यौवनारंभ ने चंद्रापीड को और मनोहर बना दिया था। अवसर की ताक में रहने वाले नए सेवक– सा मदन उसके साथ चलने लगा। यौवन–लक्ष्मी की स्फीति के साथ उसका वक्ष चैड़ा होता गया, उरुदंडयुगल भर गए, मध्य भाग छँट गया। स्वर में मृदंगमांसल गांभीर्य ने और हृदय में स्निग्धता ने घर कर लिया।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“प्रिया कुलशैलों से भरी पूर्व की धरती–सी, ऐरावत के डुबकी लगाए जाते समय की मंदाकिनी–सी और जलधरपटल से सूरज को अपने भीतर समो लेने वाली वर्षा के समय की दिवसलक्ष्मी–सी लगी।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“कुलशैलों से भरी पूर्व की धरती–सी, ऐरावत के डुबकी लगाए जाते समय की मंदाकिनी–सी और जलधरपटल से सूरज को अपने भीतर समो लेने वाली वर्षा के समय की दिवसलक्ष्मी–सी लगी।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“रानी उन्हें खिलते पारिजात से सुवासित नंदनवन की भूमि–सी, कौस्तुम मणि से विभूषित विष्णु की वक्ष:स्थली–सी भली लगने लगीं। जल से भरी मेघमाला–सी वह मंथर गति से चलने लगी थी। वर्षा की तरह उसके पयोधराग्र श्यामल होते जा रहे थे। तारापीड उसकी ओर उत्सुकता और कौतुक से देखते, स्मित की छटा रानी के ओठों के बीच थिरकती हुई उनके चित्त को गुदगुदा जाती, तारापीड कुछ पूछते–पूछते रह जाते, रानी कुछ कहते–कहते। बड़ा शुभ दिन था वह।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“धूप की गुनगुनाहट का सुख ले रही थीं रात–भर ओस में भीगती अट्टालिकाएँ। सिप्रा तरंगों के हाथ उठा–उठाकर राजा का स्वागत कर रही थी। यौवन से मदमाती मालव युवतियों के कुच–कलश उसके जल में अगणित ऊर्मियाँ उठा रहे थे, जैसे महाकाल के मस्तक पर भागीरथी को देखकर उसने भौंहें टेढ़ी की हों। महाकाल के देवालय का गगनचुंबी शिखर और उस पर लगा विशाल स्वर्णकलश आतप में तपता हुआ दूसरा सूर्यपिंड प्रतीत हो रहा था।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“उसी की छाया में मुनिजनों से घिरे बैठे थे भगवान् जाबालि। जरा से आलिंगित था उनका धवल देह। त्रिपुंड से अलंकृत भाल हिमालय के शिलाखंड–सा चमक रहा था, त्रिपथगा मानो उससे झर रही थी। राजहंस के जैसा शुभ्र स्फटिक कमंडलु उनके पार्श्व में रखा था। उनका शांत विग्रह कुंदन–सा दमक रहा था, आँखें उसे देखकर चैंधिया जाती थीं। उन्हें देखकर मुझे लगा कि धन्य है यह धरा, जिस पर ऐसे महर्षि विराजते हैं। ये सारे मुनिजन भी धन्य हो गए हैं, जिन्होंने उनका सान्निध्य पाया है, और धन्य है सारा–का–सारा यह पावन प्रदेश जो ऐसे तप:पूत महामुनि की उपस्थिति से मंडित है। कुमार हारीत ने मुझे अशोक की छाया में रखा और पिता को प्रणाम किया। “यह शुकशावक कहाँ से उठा लाए, भैया?” किशोरियों के कंठ से फूटे कोकिल कलरव–से स्वर मुझे सुन पड़े, तो मैंने आँखें खोलीं। पावन सौंदर्य से नयन अघा गए। वन की अकृत्रिम अभिराम लताओं ने नगर के उद्यानों की लताओं को फीका बना दिया था। “देखो तो, देखो तो, इसके तो पंख भी उगने लगे हैं! कितने कोमल दूर्वा के अंकुर जैसे!”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“एक बूँद जल कोई चोंच में डाल देता। मेरी मृतप्राय देह में फिर से प्राणों का संचार हो जाता। उस अर्धमूर्च्छा की स्थिति में, मन के नि:संज्ञ और निश्चेष्ट हो जाने पर भी कोई था, जो देह को उस ओर ठेल रहा था, जिधर से जल देवता के नूपुर के निनाद–सा कलहंसों का कलरव आ रहा था। बड़ी दूर से आने के कारण क्षीण होते हुए भी उस स्वर को मेरे कान सुन पा रहे थे। सारसों की अस्फुट क्रैकार भी मैं सुन रहा था। यह जानते हुए भी कि इस जीवन में इस अक्षम अधम देह से घिसट–घिसटकर मैं उतनी दूर कभी भी नहीं चल सकूँगा, कभी नहीं पहुँच सकूँगा उस सरोवर के तट तक, कोई था, जो उस झुलसती मरीचिका में मुझे आगे ठेल रहा था। पैर मेरे उठ नहीं पा रहे थे, पर न केवल पैरों को उठाने का, मैं तो अपने कच्चे पंखों को फड़फड़ाने तक का दुस्साहस कर रहा था। चींटी की गति से मैं बढ़ता बार–बार मूर्च्छित होता, गिरता– पड़ता और हाँफता असहाय प्रकंपित अपने पग उसी ओर बढ़ा रहा था, जिस ओर मेरे अनुमान से सरोवर था। आकाश के बीचोबीच विराजे सूर्यदेव अंगार बरसा रहे थे और नीचे धरती लावे–सी लग रही थी। हे विधाता, तो फिर अब मुझे मृत्यु ही दे दे–अंत में सर्वथा श्रमनिस्सह होकर अत्यंत क्षीण कंठ से मैंने यह गुहार की और फिर मूर्च्छा के घने अँधेरे में डूब गया। संज्ञा आई तो लगा कि किसी विमान में विराजमान हूँ। देवदूत जैसे मुझे चारों ओर से घेरे हुए निरभ्र व्योम में उड़ रहे थे। आँखें मिचमिचाकर देखने और उन्हें पहचानने का प्रयास करने लगा मैं। करुणा का अमृत बरसाते दो नेत्रों से मेरी आँखें टकराईं। ‘यह तपस्वी शुकशावक लगता है गिर पड़ा है उस तरु के कोटर से। हम ले चलते हैं इसको पंपा सरोवर तक।’ उन नेत्रों के नीचे दो किशोर ओठों से झरते कोकिल कलरव को तिरस्कृत करने वाले मधुर स्वर में ये शब्द मैंने सुने। वे देवदूत नहीं, तापस कुमार थे।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“सामने ही चला आ रहा था विकराल शबर सैन्य–अर्जुन की सहस्रों भुजाओं में बिखरे नर्मदा के प्रवाह–सा। कालरात्रियों के प्रहरों–से बढ़े आ रहे थे झुंड, जैसे काजल की चट्टानें भूकंप में टूटकर छिटककर चल पड़ी हों, जैसे घने अँधेरे के ढेर को सूर्य ने अपनी किरणों से फाँक करके छितरा दिया हो।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“वैशंपायन रचना चाहता था। उसे लगता था कि इतिहास और परंपरा उसके भीतर हैं, उसे इनको अभिव्यक्ति देनी है। अभिव्यक्ति के लिए शब्द चाहिए। शब्द उसे मुक्ति दिला सकते हैं, क्योंकि मुक्ति रचने में है।”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari
“आँवलों से लदे वृक्ष की डाल झुकाई। पाँच–छ: बड़े–बड़े गदराए आँवले तोड़कर उसने हथेली पिंजरे के भीतर डाल दी। “बस, एक आमलक मैं चखूँगा।” वैशंपायन ने एक पके आँवले में चोंच गड़ाई। आँवले के मधुर, कषाय, अम्ल और कटु रसों से मिश्रित स्वाद में डूबी जिह्वा से उसने कहा, “अहो, अहो, परम स्वादिष्ट है!”
Radhavallabh Tripathi, Kadambari