“पता नहीं कब नवयौवन ने मेरे देह की देहरी पर पग रख दिए। वह ऐसे आ गया था जैसे वसंत में मधुमास आता है, मधुमास में कोंपल आती हैं, कोंपलों पर फूल आते हैं, फूलों पर भौंरे आते हैं और भौंरों में जैसे मद आता है। मधुमास का ही तो समय था। कोमल मलयमारुत के मीठे झकोरों में अनंग के सुकुमार ध्वजांशुक फहरा–फहरा उठते। भौंरों के झुंड–के–झुंड नवमालिका की बेलों पर झूम रहे थे, जिससे नवमालिका के श्वेत पुष्पगुच्छ काले–काले लगने लगे थे। विरहिणियों के प्राण ले–लेकर कामदेव विजय के दर्प से कुसुम शरासन पर टंकार दे रहा था। उस टंकार को सुन–सुनकर प्रवासी पथिकों के तो हृदय ही विदीर्ण हो रहे होंगे। वनभूमि पर वासंती हवा के झौंकों में टपक–टपककर गिरे टेसू के फूलों के गुच्छे उन्हीं के हृदयों के रक्त से दिए छींटों जैसे दिखते थे। इसी सरोवर पर माँ के साथ स्नान के लिए आई थी मैं उस दिन। उधर वे चट्टानें देख रहे हैं, राजकुमार! उन पर भगवती पार्वती ने स्वयं अपने हाथों से भगवान् शिव की मूर्तियाँ उकेरी हैं। उन शिवमूर्तियों को प्रणाम कर मैं अपनी सखी तरलिका के साथ टहल रही थी उधर–कभी मधु की धार चुआते आम के उस पेड़ के तले टिक जाती, कभी उस चंदन वीथी में अटक जाती, कभी वनदेवियों के हिंडोले–सी उस लता दोला में डोलने लगती। मैं इस सारे दृश्य की रमणीयता में रमी हुई थी, अपने सुख से अभिभूत थी, अपने भाग्य पर इठला रही थी और अपनी आयति से अनजान थी। यों ही टहलते–टहलते मैं एक स्थान पर ठिठक गई। सुगंध का एक अलौकिक झौंका नासिका से टकराया था। ऐसी दिव्य सुगंध इसके पहले कभी नहीं जानती थी। उस एक अकेली सुगंध ने सारे वनप्रांत के असंख्य फूलों के सुरभि–समुदाय को दबा दिया था। मैं मधुकरी–सी उस अमानुष अद्भुत सुगंधि से खिंची चली गई उस दिशा में जिधर से वह आ रही थी। सामने से एक मुनिकुमार आ रहे थे। तेज से दिपदिपाता मुख, जैसे विद्युत्पुंज को पिंजरे में बंद कर दिया गया हो, जैसे ग्रीष्म के मध्याह्न की सूर्यकिरणों को किसी वलय में बाँध दिया गया हो। उनके देह की आभा इस सारे कानन को सोने के रस से पोत रही थी। पुण्य की पताका–सी भस्म की रेखा उनके ललाट पर लगी थी, लगता था जैसे सरस्वती से समागम करने को उत्कंठित गंगा का प्रवाह आ गया हो अपनी हिलोरों से सैकत की रेखाएँ बनाता हुआ। हाथ में स्फटिक की अक्षमाला झूल रही थी। माला क्या थी, मदनदाह से शोकातुर रति के आँसुओं की बूँदों से जैसे उसे बनाया गया था। उन्हीं मुनिकुमार के कान में झूल रही थी वह सुरतरु की कुसुममंजरी, उसी से फूट रही थी वह दिव्य गंध, जिससे खिंचकर मैं उनके सामने आ गई थी। उनके कान की मंजरी भी कैसी–जैसे पुष्पलक्ष्मी की यौवनशीला हो, या कामदेव से समागम के समय रति के मुख पर छितराई स्वेदजल की जालिका हो। आज भी समझ नहीं पाती हूँ मैं कि कैसे और कितनी देर में निर्निमेष उन मुनिकुमार को देखती रही थी। उस समय तो लगा जैसे वे कोई मुनि नहीं, माया हैं,”
―
Kadambari
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