(?)
Quotes are added by the Goodreads community and are not verified by Goodreads. (Learn more)

“उसी की छाया में मुनिजनों से घिरे बैठे थे भगवान् जाबालि। जरा से आलिंगित था उनका धवल देह। त्रिपुंड से अलंकृत भाल हिमालय के शिलाखंड–सा चमक रहा था, त्रिपथगा मानो उससे झर रही थी। राजहंस के जैसा शुभ्र स्फटिक कमंडलु उनके पार्श्व में रखा था। उनका शांत विग्रह कुंदन–सा दमक रहा था, आँखें उसे देखकर चैंधिया जाती थीं। उन्हें देखकर मुझे लगा कि धन्य है यह धरा, जिस पर ऐसे महर्षि विराजते हैं। ये सारे मुनिजन भी धन्य हो गए हैं, जिन्होंने उनका सान्निध्य पाया है, और धन्य है सारा–का–सारा यह पावन प्रदेश जो ऐसे तप:पूत महामुनि की उपस्थिति से मंडित है। कुमार हारीत ने मुझे अशोक की छाया में रखा और पिता को प्रणाम किया। “यह शुकशावक कहाँ से उठा लाए, भैया?” किशोरियों के कंठ से फूटे कोकिल कलरव–से स्वर मुझे सुन पड़े, तो मैंने आँखें खोलीं। पावन सौंदर्य से नयन अघा गए। वन की अकृत्रिम अभिराम लताओं ने नगर के उद्यानों की लताओं को फीका बना दिया था। “देखो तो, देखो तो, इसके तो पंख भी उगने लगे हैं! कितने कोमल दूर्वा के अंकुर जैसे!”

Radhavallabh Tripathi, Kadambari
Read more quotes from Radhavallabh Tripathi


Share this quote:
Share on Twitter

Friends Who Liked This Quote

To see what your friends thought of this quote, please sign up!

0 likes
All Members Who Liked This Quote

None yet!


This Quote Is From

Kadambari (Hindi Edition) Kadambari by Radhavallabh Tripathi
23 ratings, average rating, 6 reviews

Browse By Tag