यशोधरा जीत गई Quotes
यशोधरा जीत गई
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रांगेय राघव11 ratings, 4.36 average rating, 3 reviews
यशोधरा जीत गई Quotes
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“मुझे दुःख नहीं, परन्तु देखते हो न सब लोग! त्यागी के त्यागी बने रहे और माँ से बालक भी छीनकर अपने पास रख लिया…” यशोधरा फिर हँसी और मूर्च्छित होकर गिर गई।”
― यशोधरा जीत गई
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“भद्रा कापिलायिनी ने कहा : “तुम पराजित हो देवी! तुम यश देखकर डर गई हो। संसार तो पहले भी दुखी था, और फिर भी दुखी ही रहेगा और अब भी दुखी है। शास्ता का यह धर्म विचित्र है देवी! ब्राह्मण का धर्म पाखण्ड है, परन्तु उसमें आकाश और पृथ्वी मिल जाते हैं। आर्ये! शास्ता के इस धर्म में न आकाश का विस्तार है, न पृथ्वी का! मैं तो समझ नहीं पाती इसे।”
― यशोधरा जीत गई
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“वधू न कहो देवी!” यशोधरा ने काटा। “क्यों?” गौतमी चौंकी। “शास्ता की पत्नी कहो।” “वह कैसे हो सकता है, वत्से। शास्ता तो इन बन्धनों से परे हैं।” “तो फिर मैं भाग्यशालिनी कहाँ हूँ, देवी! उनकी वह सब उन्नति तो व्यक्तिगत है।” “व्यक्तिगत!!”
― यशोधरा जीत गई
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“वह पिता था। उसका स्वर गद्गद हो गया। अवरुद्ध आनन्दातिरेक से उस विह्वल की ममता छिपी नहीं रही। उसने इतने दिन तक शासन किया था। वह राजनीति के कुचक्रों को जानता था। किन्तु उसके पुत्र ने दिगंतव्यापी यश धारण किया था। उसका नाम आर्यावर्त्त में व्याप्त होता जा रहा था। वह क्या इसे समझ नहीं रहा था।”
― यशोधरा जीत गई
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“देखा कि राजा शुद्धोदन आ रहा था। उसके हाथ में भिक्षा-पात्र था। पीछे-पीछे धीर-गम्भीर चरण धरते शास्ता चले आ रहे थे। वह तेजस्वी मुख देखकर उसने श्रद्धा से प्रणाम किया। कितना भव्य था वह! क्या सुख नहीं था उसे! इतना देवभाव उसमें कैसे आ गया! देखकर ही कितना पवित्र लगता था!”
― यशोधरा जीत गई
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“धरती पर बीज गिरता है। फूटता है। वृक्ष बनता है। विशाल बनता है। पत्ते निकलते हैं, फल आते हैं। लोग खाते हैं, छाया में बैठते हैं। और कोई कहे कि बीज धरती में गिरा यह दुख है। फूटा यह भी दुःख है। वृक्ष बना यह भी दुःख है। और फिर वृक्ष कहे मैं अपने एक-एक पत्ते को सुखाकर गिरा दूँगा क्योंकि यह चंचल है, यह ममता का संघट्ट है, इसीकी छाया में संसार बैठता है, और वह पत्ते गिरा दे, वह फल नहीं दे, बीज नहीं दे, क्योंकि वह तो असंग रहना चाहता है...तो यह क्या है? धरती से विद्रोह करके वृक्ष की सत्ता ही क्या है? और धरती से विद्रोह करने की अपनी असामर्थ्य में वृक्ष कहता है कि न जन्मेगा, न मरेगा? पुरुष!! वह स्त्री से घृणा करता है और इसलिए अब जन्म ही नहीं लेगा।”
― यशोधरा जीत गई
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“सब ही यदि इस पूर्णत्व को प्राप्त कर लें तो यह सृष्टि चले ही क्यों? अपनी इच्छा से पैदा न होने वाले मनुष्य क्या जीवन को ऐसे नष्ट कर सकते हैं? नहीं। निर्वाण से भी ऊपर जीवन है। जीवन से भी ऊपर उसका विकास है,”
― यशोधरा जीत गई
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“मनुष्य के ज्ञान से मनुष्य श्रेष्ठ सत्य है और मनुष्य से भी श्रेष्ठ सत्य मनुष्य का स्नेह है। अन्यथा यह मनुष्य क्या हैं। यह”
― यशोधरा जीत गई
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“यह जो अतीत के ज्ञानी थे क्या उनका भी ऐसा ही दावा नहीं था? फिर आज वे क्यों अभावों से भरे हुए-से दिखाई देते हैं?”
― यशोधरा जीत गई
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“शाश्वत युगों तक आलोक फैलाने के लिए अपने ही स्नेह को जलाकर चमक उठने में समर्थ हो गया है। और इस दीप में अनवरत दूसरे दीप प्रकाशित होते चले जाएँगे। क्या यशोधरा इस दीप के नीचे का अन्धकार बनकर ही युग-युग तक इसी दीपक के नीचे नहीं पड़ी रह जाएगी?”
― यशोधरा जीत गई
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“क्या लेने आते हैं लोग उनके पास? शान्ति! मन की शान्ति। कल्याण! दया! करुणा! अहिंसा! जीवित रहने के कारण की खोज 1 शाश्वत सत्य। भटकन का अन्त। उठे हुए खड्ग उनके सामने झुक जाते हैं।”
― यशोधरा जीत गई
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“अपने लिए संसार को छोड़कर चला गया था वह। सुख अपने लिए खोजने गया, और सुख खोजा तो दुःख ही दुःख दिखाई दिया। उससे मुक्ति के लिए उसने कहा : मैं ही नहीं हूँ। मैं अनात्म हूँ। और जब दोनों बातें तय हो गईं, तो फिर वह अनात्म का अस्वीकृत—‘मैं’ बुद्ध हो गया और फिर वह संसार का कल्याण करने के नाम पर लौट आया। यह सब कैसा विचित्र है!”
― यशोधरा जीत गई
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“यशोधरा सोचने लगी। किन्तु आज उसके सामने वही प्रशान्त भव्य रूप आ रहा था। बुद्ध का वह चेतन स्वरूप, गम्भीर और करुणा से आप्लावित नयन, अधरों पर स्थित होकर रुक गई-सी क्षमा-भरी मुस्कान।”
― यशोधरा जीत गई
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“यशोधरा आनन्द से रोने लगी। आज उसे लग रहा था कि इतने दिन जो वह अपने को घृणित समझ रही थी शायद वह भूल थी। आर्यपुत्र उससे नहीं, अपने-आपसे डरकर चले गए थे और उसी भूल का निवारण करने के लिए उन्हें लौटकर आना पड़ा...क्योंकि यशोधरा नहीं गई...”
― यशोधरा जीत गई
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“सारिपुत्र!” “भन्ते!” उसने पूछा। “राजकन्या को यथारुचि वन्दना करने देना, कुछ न बोलना।” बुद्ध ने उसी धैर्य से कहा, किन्तु शुद्धोदन को लगा वह स्वर वही नहीं था। राजकन्या के लिए यह पक्षपात क्यों? सचमुच भद्रा कापिलायिनी नहीं आई थी न? श्रीगर्भ में आसन बिछा। श्रमण गौतम जाकर बैठ गए। उस समय द्वार पर मुस्कराती हुई, विजयिनी, उन्नत मन, पर नमित भाल, गम्भीर गौरवमयी, मन्थर पग धरती, परन्तु आतुर अधरा भद्रा कापिलायिनी दिखाई दी। बुद्ध ने देखा। वह प्रसन्न लगती थी। वह अपराजिता थी। भद्रा कापिलायिनी ने बुद्ध का गुल्फ पकड़कर सिर पाँवों पर रखकर यथा-रुचि वन्दना की। न उसमें व्यंग्य की लघुता थी, न मान रह जाने का अहंकार था। न वह विरह के अन्त का उल्लास था, न अतीत के खो जाने का विषाद ही था। वह एक ऐसी अव्यक्त पूर्णता थी जो अपनी जगह उतनी ही शान्त, गहन और उन्नत थी, जितना दूसरी जगह श्रमण गौतमी का बुद्धत्व था।”
― यशोधरा जीत गई
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“कोई भी कैसा ही ज्ञानी हो किन्तु जननी की तो वन्दना सभी करते हैं,”
― यशोधरा जीत गई
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“कहाँ हैं निगण्ठ नातपुत्त के अनुभव! कहता है कोई वैसा? जटिल हैं, योगी हैं, परन्तु बहुजनहिताय किसने कहा? किसने कहा कि आत्मा के नाम पर अनर्गलता व्याप्त है। किसने कहा कि मनुष्य का तर्क सबसे ऊपर है।”
― यशोधरा जीत गई
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“पाँचों उपादान स्कन्ध रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान, यह सब दुख है। तृष्णा, हिंसा, लोभ के विरुद्ध कौन वज्र निनाद कर रहा है।”
― यशोधरा जीत गई
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“आर्य श्रमण गौतम चार आर्य-सत्यों को बताता है। दुःख है, दुःख का हेतु है, दुःख का निरोध है और दुःख-निरोध का मार्ग है। जो धर्म हैं वे हेतू से उत्पन्न होते हैं। बुद्ध ने उनके हेतु बताए हैं। उनका निरोध बताने वाला वह महाश्रमण असाधारण पुरुष है!” शुद्धोदन”
― यशोधरा जीत गई
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“मैं पूछती हूँ कि ऐसा क्यों हुआ?” “देवी! वे वहाँ जाकर अपने को भुल जाते हैं। श्रमण गौतम शाक्यसिंह है। वह भिक्षुसंघ में सिंह के समान गर्जन करता है। उसका अप्रतिम देवरूप, उसका वह अथाह सौन्दर्य...” “ठहर, देवर!” यशोधरा ने हठात् काटकर कहा : “तू स्त्री है कि पुरुष है!” “क्यों भाभी!” वह चौंक उठा। “तू पुरुष रूप की ऐसी सतृष्ण प्रशंसा करता है जैसे आर्यपुत्र को देखकर एक दिन खत्तिया कृशागौतमी ने की थी।” यशोधरा हँसी, फिर कहा : “अरे उदायी! तू समझता है जम्बूद्वीप में सब मूर्ख रहते हैं। मेरे पति ने ज्ञान के बल पर लोगों को प्रभावित किया है, देवर! उसने अमृत दुन्दुभि बजाई है। उसने दुःख में पड़े हुए लोक को शरण दी है।”
― यशोधरा जीत गई
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“शुद्धोदन बार-बार कहते हैं कि मेरा पुत्र नहीं आया, मेरा पुत्र नहीं आया। श्रमण गौतम तो वे भी नहीं कहते? फिर मैं तो स्त्री हूँ। तुम लोगों की भाँति विचक्षण भी नहीं हूँ।”
― यशोधरा जीत गई
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“शास्ता कहते हैं, यह सब कर्म संघट्ट है। समूह का ही सब रूप है, जैसे फल आलोक है, परन्तु आलोक दीपशिखा, तैल, दीप आदि के समूह का मिलन है!”
― यशोधरा जीत गई
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“बुद्ध ने अष्टाङ्गिक मार्ग बताया है जैसे सम्यक् दृष्टि, संकल्प, कर्म, जीविका, व्यायाम, स्मृति, समाधि, यह सब भी सम्यक् ही होनी चाहिए। दुःख आर्य सत्य है। जन्म भी दुःख है, जरा भी दुःख है, व्याधि भी दुःख है, मरण भी दुःख है, अप्रियों का संयोग दुःख है, प्रियों का वियोग भी दुःख है, इच्छा करने पर किसी का नहीं मिलना भी दुःख है, प्रियों का वियोग भी दुःख है, इच्छा करने पर किसी का नहीं मिलना भी दुःख है। उपादान स्कन्ध ही दुःख है। दुःख समुदाय आर्य सत्य है।” “सब ही दुःख है आर्य!”
― यशोधरा जीत गई
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“शुद्धोदन ने कहा, “सब मनुष्य समान हैं, यह क्या ब्राह्मणों ने नहीं माना? वे भी सबकी आत्मा को ही बराबर मानते हैं, व्यवहार में तो नहीं मानते न?”
― यशोधरा जीत गई
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“मुझे तो कोई कष्ट नहीं लगा। दरिद्रों के पास यह सब नहीं होता तो क्या इन बाह्य अभावों के कारण वे जीवित नहीं रहते?”
― यशोधरा जीत गई
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“आर्ये! हमने ही समर्पण कर-करके इस पुरुष को इतना दंभी और मूर्ख बना लिया है। प्राचीन काल के यक्षों में अप्सराएँ तो बच्चों को जन्म देकर छोड़ जाती थीं, यह पुरुष अपने-आप बच्चे खिलाया करता था। नाडपित देश में मेनका शकुन्तला को छोड़ गई थी न? बताओ, हम हैं तभी न इन पुरुषों को संन्यास सूझता है।”
― यशोधरा जीत गई
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“उन्तीस वर्ष का था वह सिद्धार्थ, जब वह इस वैभव को छोड़कर चला गया था। दास,”
― यशोधरा जीत गई
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“आर्य्ये! वन का वृक्ष जिस प्रकार पुष्पित होने पर फलों से बोझिल होकर सुन्दर दिखता है, उसी प्रकार पुष्पवती होने पर स्त्री सन्तानवती होकर ही अपरिमेय श्री धारण करती है।”
― यशोधरा जीत गई
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“वत्से! सब लोग जो नहीं कर पाते, उसी को कर दिखाना तो महान कार्य है।” “होगा देवी!” यशोधरा ने कहा, “आलवक यक्ष के राज्य में लोग स्त्री के बिना अपनी साधना ही नहीं कर पाते। देश-देश की बात है। कहते है पन्जाल और कुरु के ब्राह्मण यज्ञ में स्त्री के बिना यज्ञ को ही सफल नहीं मानते।”
― यशोधरा जीत गई
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“महावीर के पास चला गया।” “कौन निग़ंठ नातपुत्त के पास?” “हाँ!” “वह तो नंगा रहता है न?” “हाँ, वत्से। कहते हैं सब राग-द्वेष नष्ट हो चुका है उसका।” “होगा देवी! पर मैं इस सबको श्रेष्ठ नहीं मानती। एक चषक में शुद्ध करके जल को रखा भी जाए तो क्या उससे जल की महागति रुक जाएगी? यह व्यक्ति रूप में जो संसार छोड़ने का नाम लेकर रहते हैं वे संसार कहाँ छोड़ते हैं। माना कि वे स्त्री से दूर रहते हैं, उनमें स्त्री को देखकर वासना भी नहीं जागती, परन्तु पानी और अन्न”
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