“सारिपुत्र!” “भन्ते!” उसने पूछा। “राजकन्या को यथारुचि वन्दना करने देना, कुछ न बोलना।” बुद्ध ने उसी धैर्य से कहा, किन्तु शुद्धोदन को लगा वह स्वर वही नहीं था। राजकन्या के लिए यह पक्षपात क्यों? सचमुच भद्रा कापिलायिनी नहीं आई थी न? श्रीगर्भ में आसन बिछा। श्रमण गौतम जाकर बैठ गए। उस समय द्वार पर मुस्कराती हुई, विजयिनी, उन्नत मन, पर नमित भाल, गम्भीर गौरवमयी, मन्थर पग धरती, परन्तु आतुर अधरा भद्रा कापिलायिनी दिखाई दी। बुद्ध ने देखा। वह प्रसन्न लगती थी। वह अपराजिता थी। भद्रा कापिलायिनी ने बुद्ध का गुल्फ पकड़कर सिर पाँवों पर रखकर यथा-रुचि वन्दना की। न उसमें व्यंग्य की लघुता थी, न मान रह जाने का अहंकार था। न वह विरह के अन्त का उल्लास था, न अतीत के खो जाने का विषाद ही था। वह एक ऐसी अव्यक्त पूर्णता थी जो अपनी जगह उतनी ही शान्त, गहन और उन्नत थी, जितना दूसरी जगह श्रमण गौतमी का बुद्धत्व था।”
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यशोधरा जीत गई
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