मेरी भव बाधा हरो Quotes
मेरी भव बाधा हरो
by
रांगेय राघव9 ratings, 4.00 average rating, 0 reviews
मेरी भव बाधा हरो Quotes
Showing 1-21 of 21
“बिहारी आज मस्त-सा चला रहा था पैदल। बूढ़ा कितना मुक्त था। उसे गोपाल बुला रहे थे।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“यह संसार क्या है, जानता है?” “मैं क्या जानूं मालिक।” “तभी तू सुखी है।” ‘हां, मालिक!” “यह सारा संसार कांच जैसा है। है न?” “ऐं मालिक?”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“अनंतकुंवरि चौहानी ने बुलाया था।” “महारानी ने।” बिहारी कहने लगा, “हां, वे चिंता में हैं।” “क्यों?” बिहारी ने बताया। सुशीला हंसी। “हंसी क्यों?” हंसती थी कि स्त्री का भाग्य! भिखारिन से रानी तक एक ही रोना है। और यह कविता जब से बढ़ी तब से तो बात ही क्या? “तुम्हें”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“महारानी चिंतित हैं। महाराज स्त्री के पीछे राज्य की चिंता छोड़ बैठे हैं, पतिव्रता स्त्री इस बात की चिन्ता नहीं करती कि उसका पति कितनी स्त्रियां रखता है, क्योंकि ऐसा करना तो पुरुष के लिए सनातन है। सभी मर्द सदा से ऐसा ही करते आए हैं, करते हैं और करते रहेंगे। स्त्री तो परस्त्री से मिलकर रहती है। इसीलिए महारानी कहती हैं कि विलास करें महाराज, यह अधिकार तो उनका ठीक है लेकिन राज्य का कार्य क्यों छोड़े, क्योंकि जो पुरुष स्त्री के हाथ बिक जाता है, उसका नाश भी शीघ्र हो जाता है। आमेर के राज्य में शत्रु हैं, जैसे चकत्ता के घराने में हैं। कविराइ समझ रहे हैं। क्या आमेर भी दिल्ली-आगरा बने?” ‘नहीं,”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“तब चन्द वरदाई थे, जिन्होंने पृथ्वीराज को पंगानी की मोह-निद्रा से जगा दिया था। आज के कवि वृत्ति लेते हैं परन्तु उनकी सरस्वती में वह चुभन नहीं रही। पहले राजा कवि और वारहट रखते थे। क्यों? ताकि कोई निडर होकर उनके अपराधों को बता सके, आज के कवि डरते हैं।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“तुलसीदास थे। वे किसी की चिंता नहीं करते थे। क्या था उनका जीवन! विरक्त थे वे। संसारी तो नहीं थे। और तभी बिहारी का मन अतीत में घूम आया। स्वामी नरहरिदास की याद आई। स्वयं शाहंशाह जहांगीर उनके दर्शन करने गया था तो वे कितने बड़े आदमी थे। क्या बिहारी उनके समान था? नहीं। बिहारी का मन छोटा हो गया।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“बिहारी ने तब यह अनुभव भी नहीं किया कि उसके भीतर उसके कवि-हृदय के स्वाभिमान की गली संकरी हो गई थी। और तब उसे ध्यान आया। सबको अपनी सीमा में रहना चाहिए। आंखें फाड़कर देखने ही से तो आंखें बड़ी नहीं कहला सकतीं।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“निरंजन कृष्ण के पास सुशीला सुख से सो रही थी। अब वह बहुत तृप्त थी। मातृत्व की यह कैसी भूख थी। तो यह कल तक सुखी नहीं थी। क्या इसने मातृत्व की तृप्ति के लिए इसे गोद लिया हे, या अपनी हिंसा की तृप्ति की हे?”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“राजपूत का जीवन क्या? युद्ध है श्रृंगार! आन पर मरना, भोगकर भूल जाना!”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“द्वार पर छम्म की आवाज गूंजी। बिहारी ने आंखें उठाईं। शाहज़ादा प्रसन्न था। बिहारी ने देखी-चन्द्रकला! अनुपम सुन्दरी वेश्या। वह अपने सारे श्रृंगार किए खड़ी थी। देखता रहा। शाहज़ादा मुस्कराया। एक बार को आंख झुक गईं। “यह हम तोहता देते हैं। इसलिए कि आपकी कविता में कंचन-सा निखार आए।” बिहारी ने चन्द्रकला को देखा। उसने धीरे से कहा, “यह बोझ तो किसी राजा से ही झिलेगा हुज़ूर, मैं तो गरीब ब्राह्मण हूं।” “हम आपको हाथी देते हैं कि वह इसे झेल ले। उसकी तरफ से आप चिन्ता न करें।” खुर्रम हंसा, “बस इतनी-सी बात!” बिहारी इसका उत्तर नहीं दे सका। “चन्द्रकला,” खुर्रम ने कहा, “दक्ष है। चतुर है। प्रवीण है।” चन्द्रकला आ गई। बिहारी आ गया। साथ में आई चन्द्रकला। बावन राजा धीरे-धीरे आ इकट्ठे हुए। बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, और न जाने कितने। और होड़ करके भेंट लाए। उनको खिलअतें बंटनी थीं। उनका वैभव एक से एक बढ़कर था।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“महामात्र नरहरि के पुत्र हरनाथ अत्यन्त उदार थे। एक बार आगरे के स्वर्गीय महाराज मानसिंह को इन्होंने जाकर एक दोहा सुनाया: बलि बोई कीरित लता, कर्ण दियो द्वै पात, सींच्यो मान महीप ने जब देखी कुम्हलात। महाराज मानसिंह ने प्रसन्न होकर उस समय इन्हें एक लाख रुपया इनाम दिया। यह घर लौट रहे थे कि मार्ग में इन्हें एक कवि मिल गया। उसने इन्हें देखकर दोहा कहा: दान पाय दो ही बढ़े, की हरि की हरिनाथ, उन बढ़ि नीचे कर कयो, इन बढ़ि ऊंचो हाथ। हरनाथ विभोर हो उठे। उन्होंने राजा मानसिंह से पाया हुआ सारा रुपया उसी को दे डाला।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“खानखाना प्रसिद्ध दानी थे, महाकवि थे। अनेक भाषाएं जानते थे। इनके यहां बड़े-बड़े विद्वान पड़े रहते थे। इतिहास लेखक अब्दुलशकी, मल्ला नज़ीरी नैशापुरी, ख्याजा सैयद ‘उर्फी’, अनीसी शायल्द, मीर मगीस याहवी हमदानी, अमीर रफीउद्दीन हैदर ‘राफेई’ काशनी, काशी सब्जवारी, फाहिमी उर्मिज़ी, मुल्ला महम्मद रज़ा ‘नबी’, तबरेजी, सामरी, दाखिली इस्फहानी इत्यादि अनेक फारसी-अरबी के विद्वानों को खानखाना ने भूरि-भूरि दान दिया। गंग को इन्होंने एक छप्पय पर 36 लाख रुपया दिया था, यह कौन नहीं जानता था। भारतीय कवियों में आसकरन जाडा, केशवदास, हरनाथ, मंडन प्रसिद्ध अलाकुली, तारा, मकुन्द इत्यादि उनके प्रशंसक थे। स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने उनकी मित्रता थी। वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे और कृष्ण के प्रति कविता लिखते थे। हंसोड़ इतने थे कि एक दिन राजा टोडरमल से यह शर्त लगाकर शतरंज खेलने बैठे कि जो हारे सो जानवर की बोली बोले। हुआ यह कि स्वयं हार गए। खानखाना टालमटोल करके उठने लगे, मगर राजा साहब कहां छोड़नेवाले थे। झट वस्त्र पकड़कर खींचकर बोले, “पहले आप बिल्ली की बोली बोल जाइए, तब ही जाइए।” खानखाना ने फारसी में कहा, ‘मीआयम् मीआयम् मीआयम् अर्थात् आता हूं, आता हूं, आता हूं।’ राजा साहब भी यह सुनकर हंस पड़े। यह किस्सा सब जगह प्रचलित था।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“एक दिन बिहारी ने कहा था, ‘मेरे पास यही है सुशीला। इसे अक्षर कहते हैं। अक्षर वह है जो कभी नष्ट नहीं होता। मैं दुनिया के किसी व्यवसाय में नहीं हूं, मेरे पास कोई भी अधिकार नहीं है। किसी का भी काम मेरे बिना रुका नहीं रहता। किन्तु मेरे पास जो है, वह कोई सीखकर नहीं कर सकता। यह दैवी धन है। मैं लिखता हूं, मुझे सुख होता है। क्या मैं इसे छोड़ दूं? सचमुच, इस दरिद्रता से तो सब कुछ छोड़ देना ही अच्छा है। मैं तुम्हारा दर्द नहीं देख सकता।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“अपना विवाह लड़की को मायके में पराया नहीं बनाती, बनाता है भाई का विवाह-भाभी!”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“अयोग्य की सेवा में सरस्वती को मत झुकाना। वीरता, सौन्दर्य, धर्म तथा ज्ञान यही चार सरस्वती की वंदना के योग्य हैं।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“राधा ही तेरी रक्षा करेंगी। काव्य ओर संगीत सबको नहीं मिलते।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“विरक्ति निराशा का नाम नहीं, त्याग के आनन्द की सक्षम अनुभूति है। वे उसे नहीं पा सके। अब तू जा रहा है। साधना मत छोड़ना।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“जीवन का लक्ष्य क्या है, जानता है?” “गुरु-सेवा!” “नहीं!” “परिवार-पालन!” “यह सब बीच के माध्यम हैं। अंत्य क्या है?” “नहीं जानता, गुरुदेव!” “भगवान के चरणों में जाना।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“संगीत और काव्य लोक के लिए नहीं, मर्मज्ञों के लिए होते हैं। लोक गाता है, अपने गीत स्वयं रचता है। किन्तु उनका सूक्ष्म सोन्दर्य केवल रसज्ञ ही जान सकते हैं।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“केशव ने राम के लिए ‘चितवन उलूक ज्यों’ लिखकर अन्याय किया है। काव्य का सोन्दर्य समझते हैं वे लोग? मेंने संस्कृत साहित्य की महान् काव्य-परम्परा को मथकर भाषा को एक महान ग्रन्ध दिया है, परन्तु उसे देखता कोन है? आचार्यत्व समझनेवाले हैं ही कितने? सूर ओर तुलसी—हां, भावपक्ष ठीक है, परन्तु ग्राम्यत्य कितना है इनके काव्य में।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो
“मनुष्य का जीवन बहुत अल्प होता है। उसका स्वार्थ और लोभ बहुत बड़ा होता है।”
― मेरी भव बाधा हरो
― मेरी भव बाधा हरो