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रांगेय राघव

“द्वार पर छम्म की आवाज गूंजी। बिहारी ने आंखें उठाईं। शाहज़ादा प्रसन्न था। बिहारी ने देखी-चन्द्रकला! अनुपम सुन्दरी वेश्या। वह अपने सारे श्रृंगार किए खड़ी थी। देखता रहा। शाहज़ादा मुस्कराया। एक बार को आंख झुक गईं। “यह हम तोहता देते हैं। इसलिए कि आपकी कविता में कंचन-सा निखार आए।” बिहारी ने चन्द्रकला को देखा। उसने धीरे से कहा, “यह बोझ तो किसी राजा से ही झिलेगा हुज़ूर, मैं तो गरीब ब्राह्मण हूं।” “हम आपको हाथी देते हैं कि वह इसे झेल ले। उसकी तरफ से आप चिन्ता न करें।” खुर्रम हंसा, “बस इतनी-सी बात!” बिहारी इसका उत्तर नहीं दे सका। “चन्द्रकला,” खुर्रम ने कहा, “दक्ष है। चतुर है। प्रवीण है।” चन्द्रकला आ गई। बिहारी आ गया। साथ में आई चन्द्रकला। बावन राजा धीरे-धीरे आ इकट्ठे हुए। बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, और न जाने कितने। और होड़ करके भेंट लाए। उनको खिलअतें बंटनी थीं। उनका वैभव एक से एक बढ़कर था।”

रांगेय राघव, मेरी भव बाधा हरो
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