“खानखाना प्रसिद्ध दानी थे, महाकवि थे। अनेक भाषाएं जानते थे। इनके यहां बड़े-बड़े विद्वान पड़े रहते थे। इतिहास लेखक अब्दुलशकी, मल्ला नज़ीरी नैशापुरी, ख्याजा सैयद ‘उर्फी’, अनीसी शायल्द, मीर मगीस याहवी हमदानी, अमीर रफीउद्दीन हैदर ‘राफेई’ काशनी, काशी सब्जवारी, फाहिमी उर्मिज़ी, मुल्ला महम्मद रज़ा ‘नबी’, तबरेजी, सामरी, दाखिली इस्फहानी इत्यादि अनेक फारसी-अरबी के विद्वानों को खानखाना ने भूरि-भूरि दान दिया। गंग को इन्होंने एक छप्पय पर 36 लाख रुपया दिया था, यह कौन नहीं जानता था। भारतीय कवियों में आसकरन जाडा, केशवदास, हरनाथ, मंडन प्रसिद्ध अलाकुली, तारा, मकुन्द इत्यादि उनके प्रशंसक थे। स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने उनकी मित्रता थी। वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे और कृष्ण के प्रति कविता लिखते थे। हंसोड़ इतने थे कि एक दिन राजा टोडरमल से यह शर्त लगाकर शतरंज खेलने बैठे कि जो हारे सो जानवर की बोली बोले। हुआ यह कि स्वयं हार गए। खानखाना टालमटोल करके उठने लगे, मगर राजा साहब कहां छोड़नेवाले थे। झट वस्त्र पकड़कर खींचकर बोले, “पहले आप बिल्ली की बोली बोल जाइए, तब ही जाइए।” खानखाना ने फारसी में कहा, ‘मीआयम् मीआयम् मीआयम् अर्थात् आता हूं, आता हूं, आता हूं।’ राजा साहब भी यह सुनकर हंस पड़े। यह किस्सा सब जगह प्रचलित था।”
―
मेरी भव बाधा हरो
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