खंजन नयन Quotes

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खंजन नयन खंजन नयन by Amritlal Nagar
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खंजन नयन Quotes Showing 1-20 of 20
“सत्य ही कहा गया है कि राधेरानी के बिना न श्याम सुखद है न श्याम बिना राधा ही सुखदा हैं और न इन दोनों के बिना गोपांगनाएँ भी सरस नहीं लगतीं।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“परम प्रेमी रसिक नट नागर लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण और उनकी हृदय स्वामिनी राधा रासेश्वरी रसेश्वरी की प्रिय लीलाभूमि है। युगल छवि की अमिट स्मृतियों से यहाँ के कदम्ब-महक भरे मादक पवन से लेकर धूलि के कण-कण तक स्वत: मुखरित हो उठते हैं।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“जिस दिन तुम लोग बहिर्मुख हो जाओगे, उसी दिन काल का प्रवाह तुम्हें बहा ले जाएगा। श्री कृष्ण लौकिक नहीं हैं, केवल लौकिक भाव को मान्यता भर देते हैं। वह तुम्हारी एकमात्र लौकिक और पारलौकिक सम्पति है। मन-प्राण और देह से उन्हीं गोपीश्वर को भजो, उनकी सेवा करो। वे चिरमंगलमय हैं।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“मिलन के आनन्द में विरह की छिपी टीस क्या अपनी इच्छा से उठती है।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“जन्म और मृत्यु जुड़वाँ भाई-बहन हैं। भाई जीवन के विकास के हेतु संघर्ष करता है, सृजन करता है। बहन, मृत्यु, वह विमल शान्ति है जिसमें सूर्य नहीं, ऊर्जा नहीं, निबिड़ अंधकार और नीरस अकेलापन है। लेकिन इस ऊर्जाहीन कँपकँपी भरे ठिठुरते अँधेरे और निपट एकान्त में भी जीव का साथ देती है उसकी चेतना, उसके संस्कारों का बीज।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“पण्डित राधाचरण चौबे ने ब्रह्म मुहूर्त में पहले तो कागावासी छानी फिर निबट नहाकर झटपट जैसे-तैसे संध्यापूजादि का कर्जा पाटा और दोपहर के लिए सिलगट्टे पर शिवप्रिया सिद्ध करने बैठ गए।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“चकई री चलि चरन सरोवर जहाँ न प्रेम वियोग...” “जहाँ भ्रम उत्पन्न करने वाली मिथ्या ज्ञान रूपी रात कभी नहीं आती वही प्रेम पयोदधि का तट सुख के योग्य स्थान है, जहाँ शिव रूपी हंस, मुनि रूपी मीन और भगवान के नख रूपी सूर्य प्रभा नित्य प्रकाशित है, वहाँ सदा आनन्द कमल खिलते हैं और उनकी सुगन्ध में मतवाले वेद रूपी भ्रमर सदा गुंजन करते रहते हैं। हे चकई, चल, वहाँ चलें। उस चरण सरोवर में सुन्दर मुक्ति-रूपी मोती प्राप्त होता है। हे सूरजदास अब अपने पुण्य के अमृत रस का पान करो,”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“साधु, जगत की परिणति ब्रह्म से अभिन्न है। श्रीकृष्ण परब्रह्म से प्रीति लगाना ही श्रेष्ठ धर्म है। जिस जीवन पर भगवद् अनुग्रह हो जाता है वह पुष्ट हो जाता है। आज से तुम सूरदास हुए। ध्यान से श्रवण करो। श्रीकृष्ण देश, काल-गुण, रूप इन चारों आवरणों से रहित हैं। वह न तो स्वजातीय हैं, न विजातीय और न स्वगत। वह आत्माराम होकर भी सर्वरमण हैं। निर्गुण होकर भी सगुण हैं। शिशु होकर भी रसिक शेखर हैं। मैंने तुम्हारी इच्छा पहचान ली है। हरि को साक्षात् देखना चाहते हो ?”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“भारहीन फूल-सा सुगन्ध-भरा मन तुम्हें अर्पित है, इसे स्वीकारो!”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“तेरा मेरा आँख-खिलौना लेके पधारे हैं। मेरे श्याम सखा ।–निश्चय ही वह हैं’–भाव मन प्राण के विद्युत अश्व पर भाग चला। सूर-सूरज का प्रेमभाव इतना आग्रह-भरा उतावला था कि प्राणों को मन के पंख लगा दिए। दिव्यगंध भरा भाव अनदेखे प्रकाश के चरणों में गिरा और लीन हो गया।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समान वृक्षं परिषस्व जाते...”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“बूँद में अनन्त असीम महासागर का आभास मिलता है।...केवल आभास ही है। एक बार प्रत्यक्ष होकर मिल जाए। उस निखिल सौन्दर्यपुंज नित्य बिहारी को अपनी राधारानी के साथ देख लूँ। अरूप नहीं, सरूप। दिखाएगा अंधे को अपना मुखड़ा?–दिखाएगा।–सच दिखाएगा?”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“विरक्त की कुटी में द्वार नहीं होता। वह सबके लिए सदा खुला है।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“खुलकर ही बात कहूँगा। एक बार मैं भी उस स्त्री के साथ बलात्कारी उन्माद में आ गया था। तब उसने हनुमानजी का ध्यान दिलाकर मुझे सचेत कर दिया। वृन्दावन में अपने कान्ताभाव से सोचते हुए मैंने उसका मन पाया। प्रेमी के लिए कितनी शुभचिन्तना होती है। चाहती तो मेरे क्षणिक उन्माद में मेरा तपोभंग कर देती। मेरे लिए उसका प्रेम तप फलीभूत हुआ। तब से कलेजे में उसका तपोभाव साथ लिए डोलता हूँ। कान्ता मेरे मन के नन्दनवन की अनुपम शोभा है।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“शान्ति से सुनना-तो पिछली बार जब वृन्दावन गया था, रसिक शिरोमणि हरिदास स्वामी ने मुझसे कहा कि एक बार स्त्रीभाव से अपने प्रिय को भजकर देखो। स्वामीजी ललिता सखी हैं। श्री राधाकृष्ण के अविराम विहार के चिर साक्षी। वे स्वयं अपने इस मोम के घोड़े पर सवार होकर नित्य जलते मैदानों के चक्कर लगाते हैं। मैंने सोचा सिद्ध महापुरुष की बात स्वयं प्रयोग करके देखूँ। अंधा तो हूँ ही, कल्पना का भण्डार भी भगवान ने भरपूर भरा है, सो मन में सोच लिया कि मैं गोपी हूँ अपने रूठे श्याम सखा की एक सखी।” “इस भावना में रमकर आपको क्या अनुभूति हुई?” “एक देवी मेरे पास सकाम प्रेम की इच्दा से आई थी, किन्तु मेरी दृढ़ता देखकर उसका प्रेम तो दृढ़ हुआ पर सकामता निष्काम हो गई। अपने मन प्राणों में मैं उस स्वर्गीया देवी के मन प्राण समोने लगा।...अरे बाबा, स्त्रीभाव में दावाग्नि-बड़वाग्नि संयुक्त जो प्रचण्ड कामाग्नि प्रज्वलित होती है, उसे सहन करना मेरे वश की बात न थी। हरिदास महाराज ही ऐसे अपनी कुण्डलिनी जगा सकते थे।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“इच्छा पुंसत्व की अनन्य पुजारिणी है। फूटे कमण्डलु में पानी कैसे भरेगा भैया।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“चंचल तो है परन्तु जब स्थिर होता है तो सृष्टि के सारे व्यापार मन से ही चलते हैं। सिद्ध पुरुषों की अलौकिक शक्तियों में जो दिखलाई पड़ता है वह मन की एकाग्रता का ही तो चमत्कार है। संगठित मानस ही आत्मा का योग होता है।” “मन तो तरंग है स्वामी जी। हाथ आई मछली-सा फिसल जाता है।” “मेरे लेखे तो यह सारा ब्रह्माण्ड ही तरंगमय है। जब एकाग्र मन से, संगठित तरंगशक्ति से जो चाहता हूँ, देख लेता हूँ। सुन लेता हूँ। इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है भला?”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“उगते सूर्य के प्रकाश में वह बूँद आबदार मोती की तरह चमक रही थी। “सलोनापन कैसा होता है काका ?” बालक सूरज ने जिज्ञासा की। “अब तोहे कैसे बताऊँ पूत। न्यों समझ के जैसे दाल, कढ़ी, साग, अचार, चटनी में सब मसाले तो चोखे पड़े होय और लौन डारिबो बिसरि जाए तो सवाद कैसो लगैगो, अलौनो फीको। तैसेइ सुन्दरता है जौं लौ सलौनी न होय तौ लौं फीकी।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“या युवक ने तो ठेठ माखन चोरा की बंशी के स्वर चुराय लीन्हे हैं।”
Amritlal Nagar, खंजन नयन
“परम सत्ता का कोई व्यक्तित्व, कोई रूप है अथवा वह अलख, अरूप और नितान्त व्यक्तित्वहीन ही है। इन कोटि-कोटि ब्राह्मांडों को नित्य संयोजन करने की क्षमता उसकी अपनीहै अथवा किसी अन्य शक्ति के द्वारा यह कार्य होता है। उस शक्ति का परमसत्ता से क्या नाता है? “प्राचीन मीमांसक उस निर्गुण निरंजन चैतन्य को सनातन सत्य रूप में स्वीकारते हैं। लीला करने के हेतु वह निराकार कभी-कभी व्यक्तित्व भी धारण करता है किन्तु यह उसकी माया मात्र होती है।”
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