“शान्ति से सुनना-तो पिछली बार जब वृन्दावन गया था, रसिक शिरोमणि हरिदास स्वामी ने मुझसे कहा कि एक बार स्त्रीभाव से अपने प्रिय को भजकर देखो। स्वामीजी ललिता सखी हैं। श्री राधाकृष्ण के अविराम विहार के चिर साक्षी। वे स्वयं अपने इस मोम के घोड़े पर सवार होकर नित्य जलते मैदानों के चक्कर लगाते हैं। मैंने सोचा सिद्ध महापुरुष की बात स्वयं प्रयोग करके देखूँ। अंधा तो हूँ ही, कल्पना का भण्डार भी भगवान ने भरपूर भरा है, सो मन में सोच लिया कि मैं गोपी हूँ अपने रूठे श्याम सखा की एक सखी।” “इस भावना में रमकर आपको क्या अनुभूति हुई?” “एक देवी मेरे पास सकाम प्रेम की इच्दा से आई थी, किन्तु मेरी दृढ़ता देखकर उसका प्रेम तो दृढ़ हुआ पर सकामता निष्काम हो गई। अपने मन प्राणों में मैं उस स्वर्गीया देवी के मन प्राण समोने लगा।...अरे बाबा, स्त्रीभाव में दावाग्नि-बड़वाग्नि संयुक्त जो प्रचण्ड कामाग्नि प्रज्वलित होती है, उसे सहन करना मेरे वश की बात न थी। हरिदास महाराज ही ऐसे अपनी कुण्डलिनी जगा सकते थे।”
―
खंजन नयन
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