यशस्वी साहित्यकार अमृतलाल नागर का चर्चित उपन्यास 'खंजन नयन' महाकवि सूरदास के गोरेमामय जीवन की सार्थक प्रस्तुति है। नागर जी ने अपने उपन्यास 'मानस का हंस' में तुलसीदास की जीवन-गाथा को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत किया था-उसी क्रम में सूरदास के जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण इस कृति के माध्यम से जिया है। सूरदास के व्यक्तित्व को नागर जी ने तीनों स्तरों पर प्रस्तुत किया है-तल, अतल और सुतल। व्यक्तित्व के भीतर अनेक व्यक्तित्व होते है। नागर जी ने भी महाकवि को सूरज, सूरस्वापी, सूरश्याम, सूरदास, अनेक रूप दिए है और अन्त में जहां ये तीनों रूप समरस होते है, वहां सूरदास राधामय हो जाते है। डेढ वर्ष की साधना के पश्चात नागर जी ने महाकवि की निर्वाण-स्थली परासौत्ती में बैठकर यह उपन्यास पूरा किया था। उनकी निष्ठा, श्रध्दा, सूर के पति समर्पण के दर्शन इस उपन्यास के माध्यम से पाठकों को अवश्य होंगे।
He started off as an author and journalist, but moved on to be an active writer in the Indian film industry for 7 years. He worked as a drama producer in All India Radio between December 1953 and May 1956. At this point he realised that a regular job would always be a hindrance to his literary life, so he devoted himself to freelance writing.
Often cited as the true literary heir of Premchand, Amritlal Nagar created his own independent and unique identity as a littérateur and is counted as one of the most important and multi-faceted creative writers of Indian literature.
खंजन नयन अमृतलाल नागर द्वारा लिखित हिंदी में एक जीवनी उपन्यास है, जो पौराणिक भक्ति भारतीय कवि सूरदास के जीवन पर है, (1483-1563), विशेष रूप से कृष्ण को संबोधित उनकी कविताओं के लिए मनाया जाता है, जो ब्रजभाषा के बेहतरीन भाव माने जाते हैं।
अमृतलाल नागर ने 1981 में यह असाधारण जीवनी उपन्यास लिखा था। और इस उपन्यास का नाम दिलचस्प है क्योंकि इसका नाम खंजन नामक पक्षी के नाम पर रखा गया है क्योंकि इसे चंचल/बेचैन और नयन का अर्थ है आँखें, और इसलिए खंजन नयन का अर्थ होता है 'चंचल आँखें'| अमृतलाल नागर की यह मेरी तीसरी पुस्तक थी। मैंने उनके मानस का हंस और सुहाग का नूपुर पढ़ा है। वे बहुत अच्छे थे। जैसे मानस का हंस में, लेखक ने अवधी भाषा का प्रयोग किया है, खंजन नयन में उन्होंने ब्रज भाषा में लिखा है जो लेखक के रूप में उनकी प्रतिभा को दर्शाता है। मुझे विशेष रूप से वल्लभाचार्य, कृष्णदास, तुलसीदास और विट्ठलनाथ की झलकियाँ बहुत पसंद आयी| मैं कल्पना कर सकता हूँ कि इस पुस्तक को लिखते समय लेखक ने कितना शोध किया है।
बहुत से जीवबुद्धी बहुदा ये प्रश्न करते हैं कि यदि हमारे देश में म्लेच्छ आक्रान्ता बन कर आए और यदि उन्होंने हमारे मंदिर, हमारे भगवानों के विग्रह ध्वंस किये और हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन किया तो आज भी हिंदू धर्म का लोप क्यूँ नहीं हुआ l उन सभी के प्रश्नों का उत्तर ये पुस्तक है l ये बताती है कि जब लोगों की भगवान और धर्म में आस्था कम हो रही थी, जब मंदिर तोड़े जा रहे थे तो भगवान उन टूटे मंदिरों से बाहर आकर जनसमुदाय के मन में कैसे वास करने लगे l नागर जी ने बहुत ही सुन्दर रूप में भक्ति युग का सूर्योदय चित्रित किया है l उन्होंने सूरदास जी के जन्म से लेकर एक सौ पांच वर्ष की आयु में देश और काल में जो महत्वपूर्ण घटना घटी उस सभी को लेकर कथा को बढ़ने की स्वच्छंदता दी है l ये उस समय के जाती, वर्ग, राजनीतिक सभी की पारस्परिक ऊहापोह दर्शाती है और साथ ही भगवान को अपना सब कुछ अर्पित करने का नारा लगाने वाले बड़े बड़े साधु की मंडली का एक दूसरे से ईर्ष्या द्वेष और एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ जैसी निम्न मानसिकता भी I परंतु अंधे सुर के लिए ये सब माया सा है l उसकी माँ ने पांच वर्ष की आयु में उसको कृष्ण का सखा बना दिया जिसके बात नहीं करने से उदास सुर को माँ ने कहा हारो मत कृष्ण बात करेंगे I सुर के जीवन के हर एक मोड़ पर उसका कृष्ण से भक्ति और अनुराग में उत्थान और गहराई का वर्णन मन को मोह लेती है l उसका और कांता का अनूठा प्रेम, उनका अपने अंदर विकसित होती हुई कमाना से जुझना, सम्मान के लोभ से सन्यासी के तीर्थ तक एक सरल मानव की जीवनी जिसका आधार कृष्ण ये सब मन्त्रमुग्ध किए देती है l नागर जी ने इस कथा के माध्यम से और भी कई बड़े संतों के दर्शन कराए, जैसे मीराबाई, गोस्वामी तुलसीदास जी, वल्लभाचार्य जी, आदि l
सच है कि राधे बिना कृष्ण अधूरे,पर ये भी सच है भक्त बिन भगवन नहीं शोभते l
Laced generously with hymns in braj dialect, this quentessential Amritlal Nagar work portrays the life of Surdas. Nagar Ji's prowess, both in setting up the surrounding scene and the internal conflict, is well known. And when added with his exemplary level of research, the result is a fine blend of history and literature. In its description of protagonists strife and one of the primary place of his residence (Kashi), have to say the book does feel like reading a miniaturised Manas ka Hans, author's Magnum Opus. But that hardly qualifies as a complaint.
PS- though the set-up is medieval where religious persecution was not uncommon, one may feel a covert bias in some places.
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The more you read, the more you understand! Amritlal Nagar takes us back in time machine and let us feel and SEE the world of Soordas ji. Take a bow for writing a classic! For me, the typical language of area mentioned in book did pose a challenge but could understand the meaning based on context!
It is the first creation of Amritlal Nagar I have read. I liked the use of Mathura style Hindi. There are some places where I laughed too. Overall a good read.