“धर्म बिना अर्थ और काम की उत्पत्ति नहीं होती। धर्म वास्तव में अर्थ और काम की अपेक्षा ही कहाँ करता है। धर्म निवृत्ति सुख की उत्पत्ति का मूल कारण है। यह तो चित्त की एकाग्रता से सिद्ध होता है, यह अर्थ काम की तरह बाहर के साधनों पर निर्भर करता, न उनसे बाधा ही पाता है। और बाधा हो भी तो ज़रा प्रयास करके वह उस दोष को मिटाकर फिर अनेकान्त श्रेय को प्राप्त कर लेता है। देखिए! ब्रह्मा तिलोत्तमा पर मोहित हो गए थे। भवानी-पति शिव ने सहस्रों मुनिपत्नियों को दूषित किया। पद्मनाभ विष्णु ने कृष्णरूप से अन्तःपुर में 16000 रानियाँ रखीं। ब्रह्मा ने अपनी ही कन्या सरस्वती से प्रेम किया। इन्द्र ने अहल्या से व्यभिचार किया। चन्द्रमा ने गुरुपत्नी से ही। सूर्य ने घोड़ी से, वायु ने केसरी वानर की पत्नी, बृहस्पति जो देवताओं के गुरु हैं उन्होंने अपने भाई उतथ्य की स्त्री ममता से, पराशर ने धीवर कन्या मत्स्यगन्धा से और पराशर के पुत्र व्यास ने भाइयों की पत्नियों—अम्बिका-अम्बालिका—से सहवास कर डाला था। अत्रि ने तो मृगी तक से किया। किन्तु देवताओं के ऐसे-ऐसे काम भी उनके ज्ञानबल को नहीं घटाते। वे धर्म से पवित्र मन वाले थे। रजोगुण उनमें नहीं घुसा, जैसे विशाल आकाश में धूलि नहीं रुक पाती। मेरा तो यही विचार है कि अर्थ और काम तो धर्म की सौवीं कला को भी नहीं छू पाते।”
―
Dashkumarcharit
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