What Ten Young Men Did Quotes
What Ten Young Men Did
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What Ten Young Men Did Quotes
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“मन्दमलयानिल से कंपित तरंगमाला की भाँति कामपीड़िता”
― Dashkumarcharit
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“वसन्तकाल आ गया। कामदेव ही इसका सेनापति था। मलय पर्वत के सर्पों से श्वास भर-भरकर आपीत चन्दनगंधिता वायु मन्थर गति से चल पड़ी। वियोगियों के हृदय सुलग उठे। मन्मथ ने आम्रबौरों के मधु का स्वाद ले-लेकर लाल कण्ठ हो गए कोकिल की मधुर ध्वनि और भ्रमर-गुञ्जार ने दसों दिशाएँ प्रतिध्वनि कर दीं। मानिनी युवतियाँ भी चपल हो उठीं। आम्र, निर्गुण्डी, रक्ताशोक, पलाश और तिलक में नई कोंपलें फूट आईं और रसिकों के हृदय में मदनमहोत्सव मनाने का उल्लास भर गया।”
― Dashkumarcharit
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“कमर में बड़ी पैनी तलवार बाँधी और सेंध मारने की शबरी, कैंची, सण्डासी, लकड़ी का बना आदमी का सिर, योग की बत्ती2, योग का चूरन, नापने का फीता, रस्सी, दीपपात्र, भ्रमरकरण्डक3 आदि कई चीज़ें ले लीं और मैंने एक लोभी धनी के घर सेंध लगाई।”
― Dashkumarcharit
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“नरक फल मिला है मुझे, फिर मैंने व्यर्थ, अफल, असार मार्ग को धर्म समझकर पकड़ रखा है।”
― Dashkumarcharit
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“आँसू उसके गालों की मैल से गन्दे हो रहे थे।”
― Dashkumarcharit
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“उसी समय सूर्य अस्त हो गया, जैसे वह तपस्वी के मन से निकलते अज्ञान के अन्धकार को छू जाने से डरकर भाग गया हो।”
― Dashkumarcharit
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“उसने जो अनुराग दूर किया है तो मुझे घोर वैराग्य दे गई है।”
― Dashkumarcharit
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“राग दशा से ऋषि कटकर रह गया; बोलाः प्रिये! यह क्या? यह उदासीनता क्यों? मुझपर तो तुम्हारा असाधारण प्रेम था। वह कहाँ गया? “काममंजरी ने मुस्कराकर कहा : भगवन्! जिस स्त्री ने राजकुल में आज मुझसे हार मानी है, उससे मेरा एक बार झगड़ा हो गया था। उसने मुझे ताना मारकर कहा : अरी! तू तो ऐसी हेकड़ी जताती है जैसे तूने मारीचि को ही जीत लिया हो! तब दासी होने की शर्त रखी गई और मैंने इस काम का बीड़ा उठाया। आपकी दया से काम सिद्ध हो गया। “इस अपमान से मूर्ख मारीचि बहुत दुःखी हुआ।”
― Dashkumarcharit
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“एक सुन्दर स्त्री उठी, उसने हाथ जोड़े और बोली : देव! मैं हार गई। आज से मैं इसकी दासी हो गई।”
― Dashkumarcharit
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“यह सुनकर दैवबल से, उस वेश्या का कौशल चला गया या मुनि की बुद्धि भ्रष्ट हो गई कि मुनि ने अपने नियम त्याग दिए और उसी में आसक्त हो गया।”
― Dashkumarcharit
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“काम जो है, वह है स्त्री-पुरुष का अत्यन्त वासना-भरे चित्त से एक-दूसरे को छूकर स्पर्श सुख पाना। इसका परिवार है आनन्द और सुन्दरता। इसका फल परमानन्द है। वह परस्पर रगड़ से जन्मता है, उसकी याद भी मीठी होती है, यह अभिमन को बढ़ाने में उत्तम है और सुख से बढ़कर है ही क्या? इसके लिए लोग बड़े-बड़े कष्ट सहते हैं, तप करते हैं, महान दान, दारुण युद्ध करते हैं और भीम समुद्र को लाँघ जाते हैं।”
― Dashkumarcharit
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“अर्थ में तो कमाना, धन बढ़ाना और उसकी रक्षा करना ही है। खेती, पशु पालन, व्यापार, सन्धि और विग्रह, अर्थ के परिवार हैं। और अच्छे लोगों को दान देना ही अर्थ का फल है।”
― Dashkumarcharit
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“धर्म बिना अर्थ और काम की उत्पत्ति नहीं होती। धर्म वास्तव में अर्थ और काम की अपेक्षा ही कहाँ करता है। धर्म निवृत्ति सुख की उत्पत्ति का मूल कारण है। यह तो चित्त की एकाग्रता से सिद्ध होता है, यह अर्थ काम की तरह बाहर के साधनों पर निर्भर करता, न उनसे बाधा ही पाता है। और बाधा हो भी तो ज़रा प्रयास करके वह उस दोष को मिटाकर फिर अनेकान्त श्रेय को प्राप्त कर लेता है। देखिए! ब्रह्मा तिलोत्तमा पर मोहित हो गए थे। भवानी-पति शिव ने सहस्रों मुनिपत्नियों को दूषित किया। पद्मनाभ विष्णु ने कृष्णरूप से अन्तःपुर में 16000 रानियाँ रखीं। ब्रह्मा ने अपनी ही कन्या सरस्वती से प्रेम किया। इन्द्र ने अहल्या से व्यभिचार किया। चन्द्रमा ने गुरुपत्नी से ही। सूर्य ने घोड़ी से, वायु ने केसरी वानर की पत्नी, बृहस्पति जो देवताओं के गुरु हैं उन्होंने अपने भाई उतथ्य की स्त्री ममता से, पराशर ने धीवर कन्या मत्स्यगन्धा से और पराशर के पुत्र व्यास ने भाइयों की पत्नियों—अम्बिका-अम्बालिका—से सहवास कर डाला था। अत्रि ने तो मृगी तक से किया। किन्तु देवताओं के ऐसे-ऐसे काम भी उनके ज्ञानबल को नहीं घटाते। वे धर्म से पवित्र मन वाले थे। रजोगुण उनमें नहीं घुसा, जैसे विशाल आकाश में धूलि नहीं रुक पाती। मेरा तो यही विचार है कि अर्थ और काम तो धर्म की सौवीं कला को भी नहीं छू पाते।”
― Dashkumarcharit
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“कामशासक महादेव की पूजा को गन्ध, माला, धूप, दीप, नृत्य, गीत, वाद्य आदि सबका ही प्रयोग करती। एकान्त में धर्म, अर्थ, काम के बारे में अथवा अध्यात्म के बारे में बातें करती। इस तरह उसने शीघ्र की ऋषि को प्रसन्न कर लिया। वेश्या”
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“उसने अपने को तिरस्करिणी (अदृश्य होने की) विद्या से छिपा लिया।”
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“हार के गिरते ही वे क्रुद्ध हो गए और उन्होंने कोप से मुझे शाप दे दिया—पापिनी! तू चेतनाहीन लौह जाति की हो जा। जब मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की तब उन्होंने मुझे आपके चरणकमलों का बन्धन बनाकर दो महीने के लिए मेरे शाप की अवधि बाँध दी। चाँदी की शृङ्खला बनने के बाद भी मुझे इन्द्रिय-ज्ञान रहे, मुझमें शक्ति बनी रहे, यह भी उन्होंने वर दे दिया। जब मैं ऐसी हो गई, उसी समय इक्ष्वाकु वंश के राजा वेगवान का पौत्र, मानसवेग का पुत्र वीर शेखर नामक विद्याधर कौशल पर्वत पर आया। उसने मुझे देखा तो अपने पास रख लिया। ‘कुछ”
― Dashkumarcharit
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“उसी समय राजवाहन के पाँवों की चाँदी की बेड़ी खुल गई और चन्द्रलेखा की छवि जैसी अप्सरा बनकर वह बेड़ी प्रदक्षिणा करके राजवाहन से हाथ जोड़कर बोली : ‘देव! मुझपर दया करें। मैं चन्द्रकिरण से उत्पन्न सुरतमंजरी नामक सुरसुन्दरी हूँ। एक बार मैं आकाश में उड़ रही थी कि एक कलहंस ने मेरे मुख को कमल के भ्रम में आकर ढंक लिया। जिससे मैं घबरा गई और उसे हटाते समय अनजाने ही मेरे गले का हार गिर गया, जो हिमवान् पर्वत के एक सरोवर में डुबकी लगा-लगाकर स्नान करते महर्षि मार्कण्डेय के सिर पर जा गिरा। उनके सफेद बाल मणि-किरणों से और भी श्वेत दीख पड़ने लगे।”
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“मेरे पास ऐसा क्या है जो तुम्हारा नहीं है। फिर भी कुछ है जिसपर मेरा ही स्वामित्व है। तुम्हारा यह जो सरस्वती से जूठा किया होंठ है वह मेरी इच्छा के अतिरिक्त और कोई स्त्री नहीं चूम सकती। लक्ष्मी के वक्षस्थल से छुए हुए तुम्हारे वक्ष का भी आलिंगन मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकती।’ यह कहकर उसने पावस ऋतु के मेघों जैसे अपने पीन कुच उसके वक्ष से सटा दिए और कन्दली कुसुम की ललाई वाले लोचनों से उसे प्यार से आँखें मिलाकर देखने लगी। उसके काले केश में गुंथे फूल मारेपँख के चमकीले चन्दे-से ऐसे लगते थे जैसे भौंरे उनपर गूँजते हुए मण्डरा रहे थे। वासना के आवेग में अवन्तिसुन्दरी ने अपने प्राणप्रिय के कदम्ब की कोंपल जैसे गुलाबी होंठों को चूम लिया।”
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“प्रातःकाल रस-भाव-रीति-चतुर विद्येश्वर अपने अनेक साथियों के साथ राजद्वार पर पहुँचा।”
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“सिरस फूल-से कोमल अंगों वाली वह”
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“सखियों की आड़ में बैठ गई और उसे तिरछी भौंहों से कटाक्ष करती हुई-सी ऐसे देखने लगी जैसे मृग पर कोई जाल फेंका जा रहा था।”
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“जैसे कामदेव ने रति का मन बहलाने को स्त्री जाति की एक शालभञ्जिका (पुतली) बना दी हो। क्रीड़ा सरोवर के शरद ऋतु के कमलों की शोभा से मानो मदन से उसके चरण बनाए थे। उद्यान की बावड़ी में मस्ती से घूमने वाली हंसिनी की गति लेकर ही इस अलसगमना की चाल बनाई गई थी। अपने तरकश की शोभा से दोनों जाँघें, अपने लीलामन्दिर के द्वार पर लगे कदली की शोभा से घुटने, जैत्ररथ की शोभा से सघन जघन, पीली कमल कलियों से कर्णाभूषण तथा गंगा के भंवर जैसी नाभि बनाई थी। प्रासाद के सोपानों-सी त्रिवली थी। धनुष के आगे लगे फूलों पर मँडराते भौंरों की भाँति उसकी रोमावलि थी। पूर्ण स्वर्ण कुम्भ-से स्तन थे। लतामण्डप की कोमलता से उसके हाथ, जयशंख की सुन्दरता से कण्ठ, कर्णफूल की जगह लटकी आम्रमंजरी की ललाई से वर्ण, बिंबाफल से रक्त वर्ण होंठ, बाणाकार कुसुमों से मन्द मुस्कान, प्रथम कामदूती और कोकिला की वाणी से उसकी बोली, अपनी समस्त सेना के सेनापति मलयपवन की सुगंधि से उसका श्वास, जयध्वज की मछलियों से नयन, धनुषयष्टि से भ्रूलताएँ, अपने प्रथम मित्र चन्द्रमा की कलंकहीन छवि से उसका मुख और लीला मयूर के पँखों से केश बनाए थे। ऐसा लगता था जैसे कामदेव ने ही उसको सकल गन्ध-सामग्रियों, कस्तूरी, चन्दन आदि के जल से नहलाया था और शरीर-भर में कर्पूर का चूर्ण मलकर उपस्थित कर दिया था। वह मूर्तिमती लक्ष्मी-सी सुन्दरी थीं जब उस मालवकन्या ने कामदेव की पूजा कर ली तब देखा कि उसके ही पूजा किए हुए देवता का सा सुन्दर राजवाहन सामने था। वह काम के बस में हो गई। मन्द-मन्द बहती वायु में काँपती लता की भाँति वह हिल उठी।”
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“राजवाहन कृशोदरी अवन्तिसुन्दरी के पास पहुँच गया।”
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“मलयानिल की मन्द झकोरों में नई कोंपलों, कुसुम और बौरों से झुके आम के पेड़ पर कोयल बोल रही थी। तोतों के झुण्ड और भौंरे मीठी तान छेड़ रहे थे। नीले और श्वेत कमल कुछ-कुछ खिल गए थे। कुमुदिनी और लाल कमलों की भीड़ पर चंचल कलहंस, सारस और चक्रवाकों के झुण्ड कलरव क्रेंकार कर रहे थे। निर्मल शीतल जल से सरोवर भरे हुए”
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“अवन्तिसुन्दरी ने वहाँ जाकर एक छोटे-से आम के पेड़ के नीचे बैठकर चन्दन, पुष्प, हल्दी, अक्षत, चीन देश के बने रेशमी कपड़ों और अनेक सामग्रियों से कामदेव की पूजा की। कामपत्नी रति की सी सुन्दरी अवन्तिसुन्दरी”
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“वसन्तकाल आ गया। कामदेव ही इसका सेनापति था। मलय पर्वत के सर्पों से श्वास भर-भरकर आपीत चन्दनगंधिता वायु मन्थर गति से चल पड़ी। वियोगियों के हृदय सुलग उठे। मन्मथ ने आम्रबौरों के मधु का स्वाद ले-लेकर लाल कण्ठ हो गए कोकिल की मधुर ध्वनि और भ्रमर-गुञ्जार ने दसों दिशाएँ प्रतिध्वनि कर दीं। मानिनी युवतियाँ भी चपल हो उठीं। आम्र, निर्गुण्डी, रक्ताशोक, पलाश और तिलक में नई कोंपलें फूट आईं और रसिकों के हृदय में मदनमहोत्सव मनाने का उल्लास भर गया।”
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“हँस पँखों से भरे मुलायम गद्ददों वाले रत्न जड़े सोने के पलंग पर उसने बालचन्द्रिका तथा मुझे बिठाया और हमें अनेक रत्नजटित आभूषण, सूक्ष्म वस्त्र, कस्तूरी-मिला चन्दन, कपूर-डाले पान और सुगन्धित फूल जैसी वस्तुएँ भेंट कीं। मैं सुन्दर स्त्री के वेश में था।”
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“मैंने भी मणिजटित नूपुर, मेखला, कङ्कण, कटक, ताटङ्क, हार, रेशमी कपड़े धारण करके स्त्रियों की भाँति आँखों में काजल लगाया और तब वल्लभा बालचन्द्रिका के साथ उस रतिमन्दिर के द्वार तक गया।”
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“फैला दो कि बालचन्द्रिका के ऊपर यक्ष रहता है। जो भी साहसिक रतिमन्दिर में उस यक्ष को जीतेगा और सखी के साथ बैठी सुन्दरी बालचन्द्रिका से बातें करके सकुशल लौट आएगा, उसी का बालचन्द्रिका से विवाह होगा।”
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“वह सुन्दरी संभ्रम, प्रेम और लज्जा से बहुत ही सुन्दर दिखने लगी। मैं उसका रूप देखकर आनन्द लेता रहा। किन्तु उसके मुख पर विषाद की छाया थी। मैंने समझा यह कामवासना से व्याकुलता बढ़ जाने के कारण था। मैंने उसके पास जाकर पूछा : हे सुन्दरी! तुम्हारे मुख पर यह दीन अवसाद क्यों”
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