अचानक किसी दोपहर बिस्तर में आराम से पड़े रहने का मन हो आता है। जाने कैसे मन भूल जाता है कि दुनिया के साथ भागना है।
कभी-कभी कुछ न करने पर मैं सैंकड़ों पते सोचता हूँ जहां से गुज़रा था, जहां रात गुज़री थी। फिर अचानक लगता है, मेरे पास इतना कुछ है कि और क्या सम्भाला जा सकेगा। कुछ नहीं। स्मृति में हैरत से खड़ा रहा जा सकता है जैसे कोई बच्चा एक्वेरियम में खो गया है। अनदेखे साज़ से एक धुन उठती जाती है। एक सम्मोहन बाहों में भरे लोरी सुना रहा होता है। कभी-कभी अपूर्ण इच्छाओं पर नम शांति गिरने लगती है।
Published on June 26, 2021 02:36