मन भागते हुए थक जाता था। दृष्टि एक सीमा पर ठहर जाती थी। सोचना घड़ी भर में गुंजलक हो जाता था। इतना सामान्य ही रहा सबकुछ मगर कभी सांसें आलोड़न के रास्ते में क्षण भर को अटकती तो सब कुछ अपरिमेय हो जाता।
जैसे अचानक कोई बहुत पुराना धागा सूटकेस के किसी हिस्से में मिलता। बचा रहता धागे का मद्धम पड़ चुका रंग और एक डर कि कहीं टूट न जाए। कोई चिट्ठी जिससे अंगुलियों की सुगंध उड़ चुकी होती। केवल लिफ़ाफ़ा बन्द करने के स्पर्श की छवि मस्तिष्क बुनता। थोड़ा सा बचा होना अत्यधिक सघन होता है। मन डर जाता है कि अगर सब कुछ छीजता न जाता तो क्या होता। हम हमारे उतने सब का क्या करते।
Published on June 26, 2021 02:39