Rajnatni Quotes
Rajnatni
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Geetashree17 ratings, 4.00 average rating, 1 review
Rajnatni Quotes
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“पहली बार उसे लगा कि प्रेम एक अलग धर्म और कुल है जिसके आगे सारी सत्ता असफल। इस प्रेमिल संसार में केवल दो लोग नागरिक होते हैं। बाकी सब लोप होते हैं। उनका एक ही धर्म होता है—प्रेम। इन दिनों वह उसी लोक का नागरिक बन बैठा था। वह भीतर से बदल रहा था, अपने धार्मिक पूर्वाग्रहों और जातीय कट्टरता को लेकर।”
― Rajnatni
― Rajnatni
“कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो, चौंसठ योगिनियों में से कोई एक योगिनी प्रकट हो गई हो, कोई भटकी हुई यक्षिणी, यक्ष को खोजती हुई ठिठक गई हो, कोई गंधर्व-कन्या रास्ता भटक गई हो, जिसे वशीकरण मंत्र आता हो और जो सभी कलाओं में निपुण हो।”
― Rajnatni
― Rajnatni
“घर पछुआरे धनी, लवंग केर गछिया लवंग तुबइ सारी राति हे ताही अवसर अएला, सामी हमर सामी होतहिं भोर भिनुसार हे… कहवां से अएलौं सामी भोर भिनुसरबा हे… कहमाँ गमएलौं सारी राति हे तोहरो सं सुन्नरि धनी मालिन बेटिया उहमे गमैलौं सारी राति हे आबथु मालिन बेटी बैसथु पलंग चढ़ि कइसे लोभएल सामी (स्वामी) मोर हे राजा बेटा हँसलइ हमे मुसकेलियै मोने मोन जोड़ल पिरीत हे…”
― Rajnatni
― Rajnatni
“वह स्वर्ग की उस नदी में उतरा, जिसका किनारा उसे नहीं चाहिए था। चाहे उस वक्त स्वर्ग छूट जाए।”
― Rajnatni
― Rajnatni
“मधुमालती की झाड़ हूँ, ज़्यादा काँट-छाँट पसंद नहीं करती, खुल कर बढऩा और फैलना पसंद है हमें, महल में कैसे रह पाऊँगी…”
― Rajnatni
― Rajnatni
“आप युद्ध की तैयारी कर सकते हैं, आक्रमण कर सकते हैं, लूटपाट करवा सकते हैं, मैं स्वयं से युद्ध करती हुई हारती रही…”
― Rajnatni
― Rajnatni
“मैं आपको साथ लेकर जाऊँगा…या मैं मिथिला को छोड़ कर कभी नहीं जाऊँगा। मैं शैव धारा में जीता हूँ, बड़े हठी होते हैं”
― Rajnatni
― Rajnatni
“क्या स्त्री अलग माटी की बनी होती है जो अभिसार से ठीक पहले वार्ता का प्रस्ताव रख दे। ठीक कहते हैं पंडित ज्ञानी…नारी का मन अबूझ है, दैव भी न पहुँच सकते वहाँ।”
― Rajnatni
― Rajnatni
“सुख अधिकाय हो तो सबसे पहले आँखें मुँदती हैं और फिर ज़ुबान चिपक जाती है। केवल देह थरथराती रह जाती है, जैसे तेज़ हवा में नदी का पानी काँपता रहता है। जैसे घटाओं के बीच कोई बिजली काँप कर रह जाए। एक पल को सुधि लौटी तो मीना को लगा—वह कुसुम खेत हो गई है जिसमें कलियाँ चटकने लगी हैं। सुगंध हवा लेकर उड़ चली है। दिशाएँ महक गई हैं। माटी नरम हो गई है। नहीं…नहीं…नरम नहीं होना है उसे।”
― Rajnatni
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“रात में खिलने वाले फूलों में कितनी गंध, कितनी मादकता होती है। सारे सफ़ेद फूल रात में ही खिलते हैं, जाने क्यों। सोन चंपा बचा लिया, बल्लाल”
― Rajnatni
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“प्रेम एक पल में पराया कर देता है। उनसे दूर कर देता है जो अपने होते हैं। प्रेम का अपना मनोलोक होता है।”
― Rajnatni
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“मैं आपसे प्रेम नहीं करती हूँ सौमित्र…आपसे मैत्री संबंध स्थापित किया था, आपने उसके गलत अर्थ लगाए। मुझे क्षमा कर दें, मैं आपके उपकारों के बदले अपने मन का सौदा नहीं कर सकती। मैं उस पुरुष को नहीं वरूँगी जिसे मैं प्रेम नहीं करती।”
― Rajnatni
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“क्षणिक आनंद, स्वर्ग से वंचित कर देगा। उसकी चेतना ने उसे चेताया। वह उन्माद को झटक कर दूर जा गिरी।”
― Rajnatni
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“आत्मस्थ और वीतरागी लगता है। कम उम्र में अधिक अध्ययन से ऐसा होता है। ज़्यादा अध्ययन भी मनुष्य को ऐसा बना देता है। वह सत्य का साक्षात्कार करा देता है और कुछ वस्तुओं की व्यर्थता का बोध करा देता है।”
― Rajnatni
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“कौन-सी मछली पेड़ पर चढ़ जाती है?” “कबई मछली…काले रंग की होती है…बहुत देर तक बिना जल के ज़िंदा रहती है…”
― Rajnatni
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“आप ऐसे न छेड़ा करें, किसी दिन तालाब में कूद जाऊँगी। बहुत गहरा है पानी। तैरने में कच्ची हूँ। अभ्यास नहीं रहा।”
― Rajnatni
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“फल छीनने के बाद वृक्ष और फूल तोड़ लेने के बाद पौधे सूने ही हो जाते हैं। कोयल अचानक चुप हो जाती है। उसकी कूक कम सुनाई पड़ती है। जाने कहाँ चली जाती है। अपने को कैसे मौन कर लेती है। बरसात चली जाती है, किंतु सबको इतना गीला करके जाती है कि सबके ऊपर उसका असर काफ़ी समय तक रहता है। जैसे पत्तों पर इतना पानी छुप जाता है कि जब उसके पास से गुज़रो तो भिगो देते हैं। तेज़ हवा में वे झरझरा कर बूँदें बरसा देते हैं।”
― Rajnatni
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“शांत पड़ी हुई लड़की, एक चंचल लहर में बदल गई थी। चेहरे की सारी उदासी गायब। अब वो उछलने लगी थी। पहले कोई चंचल हिरणी थमी हुई थी।”
― Rajnatni
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“एक साँवली लड़की, जिसने देह पर एक वस्त्र किसी तरह लपेट रखा था। कमर से लेकर वक्ष तक एक ही वस्त्र में, काले घने बाल खुले थे, हवा में उड़ रहे थे। लड़की चुपचाप झुरमुट के पास बैठी थी। गुमसुम, अपने में खोयी हुई। बल्लाल ने छुपकर उसे निहारा। लड़की का मासूम सौंदर्य उसे खींच रहा था। उसका मन हुआ—सीधे उसके पास जाए और प्रणय निवेदन कर दे। मन पर नियंत्रण किया।”
― Rajnatni
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“तुम मेरे चरित में इतनी-सी बात अवश्य लिखना कि मुझे कुलीना स्त्रियाँ नहीं मोहती थीं। मुझे वनफूल पसंद हैं।”
― Rajnatni
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“राजा बनकर सिर्फ़ शासन नहीं किया जाता, उसकी चिंताएँ अनेक प्रकार की होती हैं। उसके भीतर अनेक प्रकार की दुर्द्धर्ष लालसाएँ भी पलती हैं। पूरा करो तो मरो, न करो तो मरो। दोनों में मृत्यु है। ये शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की मृत्यु हो सकती है। यह कोई राजा ही बेहतर समझ सकता है।”
― Rajnatni
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“पीड़ाएँ छुपना ही तो नहीं जानतीं, आँखें और ज़ुबान सब उजागर कर देती हैं। पीड़ा की अपनी भाषा, लिपि होती है जो मौन में भी बोलती है।”
― Rajnatni
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“ऊ माई कहती है, बस जल्दी से तेरी कोंपल फूटे, ब्याह लायक हो जाएगी…जाने कोंपल फूटना क्या होता है। माई आजकल मुझ पर नज़र गड़ाए रहती है, मानो कुछ ढूँढ रही हो, कुछ जानना चाहती हो…रिश्ता तो आया रखा है, मेरे औरत बनने का इंतज़ार हो रहा है…”
― Rajnatni
― Rajnatni
“लड़की थी या हवा। पवन वेग से हवा में उछाल भरती थी। उछलती हुई दूर तक चली जाती थी। कुलाचें भरती तो लगता जंगल में एक साथ अनेक हिरनियाँ दौड़ लगा रही हैं।”
― Rajnatni
― Rajnatni
“देह में लोच और लय ऐसी कि बिजली भी पानी भरे। मानो देह में अस्थियाँ न हों, फूलों की कोमल डालियाँ हों, जो मोड़े से भी नहीं टूटतीं। उसके कंठ में कोकिला का वास हो गया था। नाचती क्या, उड़ती फिरती थी। कुसुम-खेतों में दौड़ते-दौड़ते उसने नृत्य की भंगिमाएँ स्वयं ही अर्जित कर लीं।”
― Rajnatni
― Rajnatni
“दूध में नहाई, नीली आँखों वाली सुंदर कन्या ने जन्म लिया। आँखें क्या, मीन के आकार की आँखें थीं, मानो दो मछलियाँ आँखें बन कर चेहरे से चिपक गई हों। सुग्गे के होंठ जैसे लाल-लाल होंठ। रजनी अपनी पुत्री का रूप निहारे और न्योछावर हुई जाए।”
― Rajnatni
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