Hum Ek Umra Se Wakif Hain Quotes

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Hum Ek Umra Se Wakif Hain (Hindi Edition) Hum Ek Umra Se Wakif Hain by Harishankar Parsai
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“अधिक दुख भोगने मात्र से कोई बड़ा लेखक नहीं होता। अधिक दुख भोगनेवाला चोर भी हो जाता है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“व्यर्थ ग़ुस्सा आत्म-क्षय करता है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“हम लोग—इस युग के अधिकतर लेखक, बुद्धिजीवी—इस व्यवस्था की जारज सन्तानें हैं। हम मानसिक रूप से ‘दोगले’ नहीं, ‘तिगले’ हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूँजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“अकबर थे। उन्होंने सन्त कवि कुम्भनदास को दरबार में बुलाया। बहुत घेराघेरी के बाद सन्त सीकरी गए। लौटकर पछताए। कहा : सन्तन कहा सीकरी सों काम आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम; जिनके देखे दुख उपजत है, तिनकों करबो पडै़ सलाम॥”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“विचार-गोष्ठी में विचार होता है, निष्कर्ष नहीं निकलता। चिन्तन गतिशील है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“कवि-सम्मेलन में कवि की श्रोताओं से, श्रोताओं की कवि से और कवि की कवि से रक्षा करनी पड़ती है। कवि-सम्मेलनों को जमाए रखना आसान काम नहीं”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“मैं कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, स्कूलों और संस्थाओं में पैसे लेकर भाषण दे चुका हूँ। मैं पैसे लेकर कवि-सम्मेलनों की अध्यक्षता भी कर चुका हूँ। पैसे लेकर उद्घाटन कर चुका हूँ। वह मेरे धंधे में शुमार रहा है। मैं लिखा हुआ और बोला हुआ शब्द बेचता रहा हूँ।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“कि आप हमें जेल में डाल सकते हैं। कलेक्टर हँसा। बोला, Look here, I am not English, I am Irish, but I am an employee of these bastards, Englishmen. I will have to take some action to show them. So be cautious.”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“माखनलाल : काबिले-एतराज़ बातें छापने के लिए ही हमने अख़बार निकाला है। कलेक्टर : आप सरकार की आलोचना करते हैं। माखनलाल : सरकार की आलोचना करने के लिए ही हमने अख़बार निकाला है। कलेक्टर : मैं आपका अख़बार बन्द करवा सकता हूँ। माखनलाल : हमने यह मानकर ही अख़बार निकाला है कि आप इसे बन्द करवा सकते हैं। कलेक्टर : मैं आपको जेल में डाल सकता हूँ। माखनलाल : हम यही मानकर यह सब करते हैं”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“कर्मवीर’ जबलपुर से निकलता था। गोरे कलेक्टर ने उन्हें एक दिन बुलाया। तब जो बातचीत हुई वह कुछ इस तरह थी : कलेक्टर : आपके अख़बार में काबिले-एतराज़ बातें छपती हैं।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“बातचीत में कविता बोलते थे वे। ऐसी प्रतिभा का दूसरा लेखक नहीं हुआ। वे जैसा लिखते थे, वैसा ही बोलते। उनमें समर्पण और विद्रोह, लालित्य और कठोरता, प्रेम और क्रोध, मनुहार और फटकार एक साथ”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“नदियों के जय स्तंभ नहीं बनते। दीपक की लौ को सोने से नहीं मढ़ा जाता।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“मैं सोचता हूँ, क्या यह हँसी विक्षिप्त की हँसी है? क्या यह निरपेक्ष जीवन का हास्य है? क्या यह उस चरम विफलता की हँसी है, जब आदमी सोच लेता है कि हमसे अब कुछ नहीं बनेगा? क्या यह उस उदासीन वृत्ति का हास्य है कि हमारे बनने या बिगडऩे में कोई मतलब नहीं अथवा दर्द को कलेजे की भट्ठी में गलाकर इसने हँसी के रूप में प्रवाहित कर दिया है?”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“मनीषी इसी होटल के ऊपरी हिस्से में न जाने कब से रह रहे हैं और इस इमारत के गिरने तक शायद यहाँ रहेंगे। उनका धंधा कुछ भी नहीं है। भोजन आने का क्या जरिया है, किसी को नहीं मालूम। कपड़े कहाँ से मिल जाते हैं, और हमेशा इतने उजले कैसे रहते हैं, यह भी एक रहस्य है, परन्तु इस व्यक्ति के मुख पर मैंने कभी चिन्तारेखा नहीं देखी। कभी परेशानी की छाया नहीं देखी, कभी दुख की मलिनता नहीं देखी। जिसके खाने का ठिकाना नहीं है, जो दो दिन भूखा पड़ा रहता है, एक फटा टाट जिसकी शैया है, वर्षों पहले का ईंट का चूल्हा, जिस पर अभी तक मिट्टी नहीं चढ़ पाई, एक मिट्टी का घड़ा, एक टिन का गिलास, एक तवा और डेगची जिसकी समस्त सम्पत्ति है, शरीर पर पहने हुए कपड़ों के सिवा जिसके पास एक अँगोछा और एक फटा कंबल मात्र है—वह चिर यौवन से कैसे लदा है? वार्धक्य इससे क्यों डरता है? केश किस भय से श्वेत नहीं होते? झुर्रियाँ चेहरे को क्यों नहीं छूतीं? चिन्ताओं के दैत्य इससे क्यों दूर रहते हैं? दुख इसके पास क्यों नहीं फटकता? यह किस स्रोत से जीवन-रस खींचता है कि सदा हरा-भरा रहता है? किस अमृत-घट से इसने घूँट पी लिया है कि संसार का ज़हर इस पर चढ़ता ही नहीं?”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“कभी कोई चायप्रेमी घुसते ही कहता, ‘एक ‘स्पेशल’ चाय।’ मिस्त्री चिड़ जाते।’ कहते, ‘उठो और सामनेवाले उस होटल में ‘स्पेशल’ चाय पीओ। इधर ‘आर्डनरी’ ही मिलेगी। इस देश में कोई ‘स्पेशल’ नहीं। एक थे मिस्त्री के सहायक नेता जी नारायण वर्मा। वे कहते, ‘भैया, इधर आदमी स्पेशल मिलते हैं, चाय नहीं।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“पंडित जी में अद्भुत गुण थे। वे द्वेष-ईर्ष्या से परे थे। अपना नुकसान करनेवालों से भी स्नेह करते थे। किसी की निन्दा नहीं करते थे और न सुनते थे। कोई किसी की निन्दा करे तो वे कहते, ‘अरे छोड़ो भाई, मनुष्य ऐसा ही होता है।’ वे शालीनता नहीं छोड़ते थे। बर्नार्ड शा ने कहा है—‘Courage is grace under pressure.’ यह तिवारी जी पर लागू होता था।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“अरे परसाई, ये ज़िन्दा मुर्दे हैं। मारे जाओ कोड़े। कभी जाग जाएँगे।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“पिता जी बार-बार कहते, ‘बच्चों का क्या होगा?’ बुआ समझाती, ‘तेरा यह बेटा है। हम सब हैं। भगवान हैं। बच्चे सँभल जाएँगे।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“अमेरिकी और अंग्रेज़ में फ़र्क़ होता है। अंग्रेज़ कम बोलनेवाला, कम हँसनेवाला, कंजूस और बन्द दिल का होता है। अमेरिकी मस्त, खुले दिल का, हँसनेवाला, ख़र्च करनेवाला और मौज़ करनेवाला होता है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“तीसरी चीज़ सीखी बेफ़िक्री। जो होना होगा होगा, क्या होगा? ठीक ही होगा। मेरी एक बुआ थी। ग़रीब, ज़िन्दगी गर्दिश भरी, मगर अपार जीवन-शक्ति थी उसमें। खाना बनने लगता तो उनकी बहू कहती, ‘बाई, न दाल ही है न तरकारी।’ बुआ कहती, ‘चल चिन्ता नहीं।’ राह-मोहल्ले में निकलती और जहाँ उसे छप्पर पर सब्जी दिख जाती, वहीं अपनी हमउम्र मालकिन से कहती, ‘ए कौशल्या, तेरी तोरई अच्छी आ गई है। ज़रा दो मुझे तोड़ के दे।’ और ख़ुद तोड़ लेती। बहू से कहती, ‘ले बना डाल, ज़रा पानी ज़्यादा डाल देना। मैं यहाँ-वहाँ से मारा हुआ उनके पास जाता तो वह कहती, ‘चल, कोई चिन्ता नहीं। कुछ खा ले। नौकरी तो लग ही जाएगी।”
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“तसव्वुर खींच वो तस्वीर आँखें हों रसाई हो, उधर शमशीर खींची हो इधर गर्दन झुकाई हो।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“गांधी के नेतृत्ववाला आन्दोलन कांग्रेसी ही चलाते थे और वह केवल राजनीतिक था, वे ग़लत हैं। गांधी का आन्दोलन रसोईघर और पाखाने में भी था, दाम्पत्य सम्बन्धों में भी था, परिवार की व्यवस्था में भी था। यह जीवनव्यापी आन्दोलन था। इसमें बहुत बड़ा योगदान उन असंख्य पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का था, जिनका नाम अख़बार में कभी नहीं छपा।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“मैं सुनता था अंग्रेज़-भक्त अफवाहें भी फैलाते थे। कहते थे, ‘यह गांधी बड़ा धूर्त है। हरिजनों के नाम से चन्दा इकट्ठा करता है, और उस पैसे से अहमदाबाद में लडक़ों के नाम से कपड़ा मिलें खोलता है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“मेरे चरित्र में एक बात है, जो मेरी बड़ी ताक़त है। कोई भी चिन्ता हो, मुसीबत हो, आसन्न संकट हो, गर्दिश हो, मैं सब भुलाकर ग़ैर-ज़िम्मेदार होकर वह सब नियमित रूप से कर लेता हूँ जिसमें मेरी दिलचस्पी है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“यह प्रावधान संविधान में होना चाहिए। बालिग होने के पहले बच्चे को कोई धर्म दे देना दंडनीय अपराध होना चाहिए। बच्चा समझता नहीं है और आपने उसे ज़िन्दगी-भर के लिए मुसलमान या हिन्दू बना दिया। क्या धाँधली है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“हैं। दुख किसी की संवेदना को व्यापक और गहरा बनाता है। उसे पर-दुख कातर बनाता है। पर-दुख मनुष्य को गिराता भी है। उसे नीच और क्षुद्र बनाता है। दुख मनुष्य को अधिक क्रूर भी बनाता है।”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain
“कलेक्टर हँसा। बोला, Look here, I am not English, I am Irish, but I am an employee of these bastards, Englishmen. I will have to take some action to show them. So be cautious.”
Harishankar Parsai, Hum Ek Umra Se Wakif Hain