“मनीषी इसी होटल के ऊपरी हिस्से में न जाने कब से रह रहे हैं और इस इमारत के गिरने तक शायद यहाँ रहेंगे। उनका धंधा कुछ भी नहीं है। भोजन आने का क्या जरिया है, किसी को नहीं मालूम। कपड़े कहाँ से मिल जाते हैं, और हमेशा इतने उजले कैसे रहते हैं, यह भी एक रहस्य है, परन्तु इस व्यक्ति के मुख पर मैंने कभी चिन्तारेखा नहीं देखी। कभी परेशानी की छाया नहीं देखी, कभी दुख की मलिनता नहीं देखी। जिसके खाने का ठिकाना नहीं है, जो दो दिन भूखा पड़ा रहता है, एक फटा टाट जिसकी शैया है, वर्षों पहले का ईंट का चूल्हा, जिस पर अभी तक मिट्टी नहीं चढ़ पाई, एक मिट्टी का घड़ा, एक टिन का गिलास, एक तवा और डेगची जिसकी समस्त सम्पत्ति है, शरीर पर पहने हुए कपड़ों के सिवा जिसके पास एक अँगोछा और एक फटा कंबल मात्र है—वह चिर यौवन से कैसे लदा है? वार्धक्य इससे क्यों डरता है? केश किस भय से श्वेत नहीं होते? झुर्रियाँ चेहरे को क्यों नहीं छूतीं? चिन्ताओं के दैत्य इससे क्यों दूर रहते हैं? दुख इसके पास क्यों नहीं फटकता? यह किस स्रोत से जीवन-रस खींचता है कि सदा हरा-भरा रहता है? किस अमृत-घट से इसने घूँट पी लिया है कि संसार का ज़हर इस पर चढ़ता ही नहीं?”
―
Hum Ek Umra Se Wakif Hain
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