हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा’ Quotes

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हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा’ हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा’ by सुरेन्द्र मोहन पाठक
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हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा’ Quotes Showing 1-10 of 10
“जो काम वक्त पर न किया जाए, बाद में करने पर उसकी नाकद्री का पूरा अन्देशा होता”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“आइकानिक लेखक जिक्र के काबिल होते हैं, पढ़ने के काबिल नहीं होते इसलिए ट्रेड से बाहर हो जाते हैं। बस, ‘जिक्र मेरा मुझसे बेहतर है’ रह जाता है।”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“प्रकाशक साफ कहता था कि कोरे कागज की कोई कीमत थी, छपे हुए की नहीं थी। सैंकड़े के भाव कबाड़ी को कबाड़ की तरह बेचने के लिए किताब छापने का क्या फायदा था!”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“मिजाज मौसम की तरह होता है जिसका बदलते रहना कोई हैरत की बात नहीं।”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“दो लाख रुपए हों तो एक लाख साथी कामरेडों के हवाले कर दोगे?” “हाँ। बेहिचक।” “दो बैल हों तो एक बैल किसी साथी कामरेड को दे दोगे?” “नहीं।” नेता हड़बड़ाया, उसने समझा उसने ठीक से नहीं सुना था। “क्या बोला?” “नहीं दूँगा।” “तुम्हारा मतलब है कि अगर तुम्हारे पास दो बैल हों तो एक बैल तुम अपने किसी साथी कामरेड को नहीं दोगे?” “हरगिज नहीं दूँगा।” “ऐसा क्यों? जब तुम हर चीज देने को तैयार हो तो बैल क्यों नहीं?” “क्योंकि दो बैल मेरे पास हैं।” यही हकीकत है। कामरेड तभी तक कामरेड है, जब तक गरीब है, साधनहीन है, भूखा-नंगा है। साधनसम्पन्न बनते ही उसके खयालात बदल जाते हैं।”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“कहानी छपी नहीं, हमेशा के लिए गायब हो गई, उजरत मिली नहीं। न खुदा ही मिला, न विसालेसनम। इस वाकये के बाद आइन्दा ताजिन्दगी किसी फिल्म मैगजीन के लिए मैंने कुछ न लिखा।”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“वो तुम लिखते हो?” “जी हाँ।” “यकीन नहीं आता।” “यकीन न आने की कोई वजह?” “अरे, वो इतना हाई ग्रेड, इतना इन्टैलीजेंट, बल्कि इतना इंटेलैक्चुअल मैटीरियल होता है, अक्यूट सेंस आफ ह्यूमर से लबरेज उसमें फ्रीवोलस अनैक्डोट्स होते हैं, तुम...तुम तो एक...एक...अब क्या कहूँ!...तुम कैसे इतना हाई-फाई लिख सकते हो!” मैं”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“दस्तूर जो था सृष्टि का! दुख आखिर दो सुखों के बीच का वक्फा ही तो है!”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“आइकानिक लेखक जिक्र के काबिल होते हैं, पढ़ने के काबिल नहीं होते इसलिए ट्रेड से बाहर हो जाते हैं।”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है? अगर आप किसी को भड़काने, आन्दोलित करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरर्थक है। —सलमान रुश्दी”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा