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सुरेन्द्र मोहन पाठक

“दो लाख रुपए हों तो एक लाख साथी कामरेडों के हवाले कर दोगे?” “हाँ। बेहिचक।” “दो बैल हों तो एक बैल किसी साथी कामरेड को दे दोगे?” “नहीं।” नेता हड़बड़ाया, उसने समझा उसने ठीक से नहीं सुना था। “क्या बोला?” “नहीं दूँगा।” “तुम्हारा मतलब है कि अगर तुम्हारे पास दो बैल हों तो एक बैल तुम अपने किसी साथी कामरेड को नहीं दोगे?” “हरगिज नहीं दूँगा।” “ऐसा क्यों? जब तुम हर चीज देने को तैयार हो तो बैल क्यों नहीं?” “क्योंकि दो बैल मेरे पास हैं।” यही हकीकत है। कामरेड तभी तक कामरेड है, जब तक गरीब है, साधनहीन है, भूखा-नंगा है। साधनसम्पन्न बनते ही उसके खयालात बदल जाते हैं।”

सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा |’ [Hum Nahi Change... Bura Na koy]
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