Mallika Quotes
Mallika
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Manisha Kulshreshtha61 ratings, 4.43 average rating, 4 reviews
Mallika Quotes
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“फूल की पंखुड़ियाँ झड़ती हैं—दूसरी ओर मांसल फल सर निकालते हैं। इधर पतझड़ होती है—उधर नई-नई कोपलों से पौधे सजने लगते हैं। इधर रात की अंधियाली दूर होती है—उधर दिन का उँजियाला फैलने लगता है। जग का यही नियम है, बेटी।’ ‘मन्नो!”
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“भारतेन्दु हरिश्चन्द्र उस सुगंध से अवचेतन से चेतन की ओर अग्रसर हुए। इस गंध का क्या नाम है। यह इतनी मीठी है। यह इतनी जानी-पहचानी लगती है। मगर वह पुरानी स्मृतियों को क्यों पुनर्जाग्रत कर रही है उस क्षण बाबू भारतेन्दु को अंतस में दो सुगठित पिंडलियाँ दिखीं…जो केसर से रची हुई थीं। सुंदर, स्वर्णिम, सुगठित पेट और स्पंदित नाभि…। यह कौन है? दूसरे क्षण अपने दिमाग से उन्होंने मूर्ति को झटक देने का प्रयत्न किया। वह मल्लिका थी। सचमुच मृत्यु के पवित्र द्वार पर ठिठक कर न केलि क्षणों के बारे सोचते हैं कि राधा-माधव के गीत गोविंदम् को याद करते हैं? इस असमंजस भरे पछतावे की भावना ने उन्हें हल्के से मुस्कुराने को बाध्य किया।”
― Mallika
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“एक शिक्षा आँचल में गाँठ बाँध कर रख लेना—कितना भी दुःख हो उसे सुख मानना। जगत से व्यतिक्रम रचा है तुमने। मेरी पुस्तकों के लिए अपनी सम्पत्ति छापेखाने में गँवाकर तुमने प्रेम की टकसाल लगा ली है। क्या हुआ खल लोग तुझे मेरी आश्रिता कहते रहे…तुझे इससे क्या, तेरा प्रेमी और तू जिसकी सरबस है…उसने तो तुझे धर्म-गृहीता माना है। देखना…आगे ऐसे लोग भी उत्पन्न होंगे जो तेरा नाम आदर से लेंगे। मेरी और तेरी जीवन पद्धति समझेंगे। इस प्रेम के दर्शन को मान देंगे।”
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“हरिचंद ज्यू खाँसी और ज्वर का कष्ट उठाकर भी लिख रहे थे। उनका मन चिड़चिड़ा होता गया। नींद घट गई। सर दर्द रहने लगा और इस तरह वे सचमुच बीमार पड़ गए हैं। महीनों हुए हालत में सुधार नहीं।”
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“बीते मेरे सुंदर दिन शीघ्र समाप्त हो जाएँगे। उसके बाद पृथ्वी पर मैं तुम्हें ढूँढे न मिलूँगा।”
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“मल्लिका के संग सुख और भोग में बिताए दिनों की स्मृतियाँ मधुर सपनों की तरह उन्हें दुखी और विचलित कर रही थीं।”
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“पूनो का आकाश निर्मल शंख-सा चमकता था। प्रभात की धूमिल रेखाएँ क्षितिज पर खिंची थीं। एक महाराज प्रभाती गा रहा था कि नींद खुल गई,”
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“मेरे क्वीन्स कॉलेज के सहपाठी ठाकुर जगन्मोहन सिंह, जिन्हें तुमने भोजन पर बुलाया था, उन्हीं का पत्र आया है, वे भी जबलपुर पहुँचेंगे। वे भी अपनी प्रेमिका श्यामा देवी को साथ ला रहे हैं, तुम्हें साथ हो जाएगा।’ मल्लिका का चेहरा पीला पड़ गया। मैं अपने पथ से विचलित होकर कुलीनता से कहाँ जा गिरी हूँ? एक ठाकुर साहब की रक्षिता!! श्यामा!! ‘आप कितना सहज ही वारवनिताओं के समकक्ष मुझे खड़ा कर लेते हैं ना!! पहले माधवी और अब…आप भी मुझे रक्षिता समझते हैं?’ गला भर गया मल्लिका का। वह छिटक कर अलग हो गई।”
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“वह नर्मदा का शहर है, भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानों से टकरा वह रेवा बन बहुत सुंदर मालूम होती है।”
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“देखना दरिद्र मरोगे न तो कोई पतुरिया रोने आएगी न काशी के कवि-रसिक। मन्नो ही रोती होगी तुम्हारे सीने पर।’ मन्नो ने कलप कर कहा। मन्नो का प्रलाप पूर्ण होने से पहले हरिचंद ज्यू मल्लिका की चौखट पर थे।”
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“आप बहुत अलग हैं औरों से। एक ही आप हैं मगर आपके आस-पास हरेक के मन में आपको लेकर अलग-अलग छवियाँ, विरोधी भाव कैसे जागते हैं? कुछ लोग आपको हाथो-हाथ लेते हैं, कुछ भीषण डाह करते हैं। कुछ लोग आपको यूँ ही सहस्र मुद्रा दे देते हैं, कुछ गिद्ध बन हरदम आपसे लूटते हैं। कुछ आप पर आँख मूँद भरोसा करते हैं कुछ…जबकि वही आप हैं।”
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“धर्मगृहिता!! क्या अर्थ है इसका? मैं तुमसे बँधी हूँ कि निर्बाध?’ इस प्रश्न की क्षीण रेखा बारम्बार मल्लिका की भावुकता के अँधेरे क्षितिज पर बनती और मिटती रही।”
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“मैं विधवा थी, अब वधू हूँ, अब मुझे बीते जीवन से कोई आसक्ति व आक्रोश नहीं है। मेरी रात अपनी नहीं, दिन अपने नहीं। गति-कुगति अपनी नहीं। मन अपना नहीं। आज यह पराधीनता भी मोल ले ली। हैरानी देखो, कपटी मन एक बार भी चीख न सका। एक बार भी न कहा यह मुझसे न होगा।”
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“यह व्यक्ति मन पढ़ता है? यह व्यक्ति हमेशा आँखों पर पट्टी बाँध घुमा देता है। जो आज होता है, वह कल कहाँ होता है!!!”
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“मैंने जो तुम्हें माला पहनाई है उसे अपना सम्मान मान लेना कि तुम दुनिया की श्रेष्ठतम् और एकमात्र स्त्री हो जिसे मैंने प्रेम किया है। एकनिष्ठता आत्मा की भी होती है प्रिय। जिसे आत्मा वरण कर लेती है उससे व्यतिक्रम संभव नहीं।”
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“मल्लि अगर तुम यह अनुभव करती हो कि पाने-खोने, मिलने-न मिलने से परे है यह अनन्य प्रेम, दुर्भाग्य-सौभाग्य दोनों ही तुच्छ हैं इस प्रेम के सामने।”
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“प्रशस्त भाल पर उन भीतर धँसी काली आँखों का तेज देखने की क्षमता मुझमें न थी। किंतु फिर भी अनजाने साधुता के साए में कितनी बार मैंने छिपी संकीर्णता देख ली, जो महानता के प्रकाश पुँज में संसार देख न सका।”
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“ये तो पुरुष हैं। उस पर व्यसनी। इनका तो कुछ नहीं बिगड़ता, दस कालिख लगी है एक और सही। तुम कुलीन परिवार की बाल-विधवा हो, तुम पर कलंक लगेगा अगर आए दिन ये तुम्हारा जीना चढ़ेंगे तो। मैं तो रोक नहीं सकी इन्हें। झूठ-सच कर बाहर बने रहते हैं। विमाता के सताए हैं, उनसे मुक्त होते ही खूँटा तुड़ाए बछड़े बन गए। मोहल्ला भर कहता है, हरिचंद ज्यू तो आजकल बंगालन के जादू में हैं। मुझे इनका बुरा नहीं लगता, वह तो मैं सुनती आई हूँ। बुरा लगता है, लोग बिना जाने-बूझे तुम्हें कलंकित करते हैं। अभी तुम्हारा बहुत जीवन है, एक बार नाम खराब हुआ तो देखादेखी और पुरुष साँकल खटकाएँगे। जब तुम्हें देखा लगा एक अनब्याही कन्या हो। तुम्हारा सूना भाल देख चित्त डूब गया। ‘सुनो, तुम ही मना कर दिया करो। तुम अपने आप न कह सको, कजरी से कहलवा दो कि ‘सो रही हैं, कहीं भजन को गई हैं।’ मल्लिका”
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“द्विराचार अर्थात् गौने से पहले ही? चचचचच! हाय रे विधाता! क्या जात हो?’ ‘पंडित हैं पिता, पति भी ब्राह्मण थे। स्त्रियों का तो होना वही जो स्वामी या पिता का हो।”
― Mallika
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“मल्लिका एक क्षण को मन्नो की स्थिति में स्वयं को रखकर कल्पना करने लगी कि उसका स्वामी, वेश्यागमन करता हो, चाहे वे उसे उन तहज़ीबदार तवायफ़ों का रसमय और संगीतमय सान्निध्य कहें, बिना देह-प्रसंग के। किंतु है तो वह समाज के अनुसार अनैतिक ही। उस पर उनका मानना कि समृद्ध परिवारों में यह स्वीकार्य है। ‘निस्संदेह”
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“वैसे यह यज्ञ पति-पत्नी करते हैं, लेकिन ये तो मुझसे विपरीत ही चले हैं। सो गोकुल और उसकी पत्नी बैठे हैं यज्ञ में, मैं तो सुहागिन होकर भी…। कहाँ सुहागिन हूँ?’ कहकर मन्नो आँचल से आँखें पोंछने का उपक्रम करने लगी।”
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