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Manisha Kulshreshtha

“ये तो पुरुष हैं। उस पर व्यसनी। इनका तो कुछ नहीं बिगड़ता, दस कालिख लगी है एक और सही। तुम कुलीन परिवार की बाल-विधवा हो, तुम पर कलंक लगेगा अगर आए दिन ये तुम्हारा जीना चढ़ेंगे तो। मैं तो रोक नहीं सकी इन्हें। झूठ-सच कर बाहर बने रहते हैं। विमाता के सताए हैं, उनसे मुक्त होते ही खूँटा तुड़ाए बछड़े बन गए। मोहल्ला भर कहता है, हरिचंद ज्यू तो आजकल बंगालन के जादू में हैं। मुझे इनका बुरा नहीं लगता, वह तो मैं सुनती आई हूँ। बुरा लगता है, लोग बिना जाने-बूझे तुम्हें कलंकित करते हैं। अभी तुम्हारा बहुत जीवन है, एक बार नाम खराब हुआ तो देखादेखी और पुरुष साँकल खटकाएँगे। जब तुम्हें देखा लगा एक अनब्याही कन्या हो। तुम्हारा सूना भाल देख चित्त डूब गया। ‘सुनो, तुम ही मना कर दिया करो। तुम अपने आप न कह सको, कजरी से कहलवा दो कि ‘सो रही हैं, कहीं भजन को गई हैं।’ मल्लिका”

Manisha Kulshreshtha, Mallika
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Mallika (Hindi Edition) Mallika by Manisha Kulshreshtha
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