एक ओंकार सतनाम – Ek Omkar Satnam Quotes

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एक ओंकार सतनाम – Ek Omkar Satnam (Hindi Edition) एक ओंकार सतनाम – Ek Omkar Satnam by Osho
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एक ओंकार सतनाम – Ek Omkar Satnam Quotes Showing 1-2 of 2
“नानक कहते हैं, हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि। जो लिखा है वह होगा। जो उसने लिख रखा है वही होगा। अपनी तरफ से कुछ भी करने का उपाय नहीं है। कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। फिर चिंता किसको? फिर बोझ किसको? जब तुम बदलना ही नहीं चाहते कुछ, जब तुम उससे राजी हो, उसकी मर्जी में राजी हो, जब तुम्हारी अपनी कोई मर्जी नहीं, तब कैसी बेचैनी! तब कैसा विचार! तब सब हलका हो जाता है। पंख लग जाते हैं। तुम उड़ सकते हो उस आकाश में, जिस आकाश का नाम है--इक ओंकार सतनाम। नानक की एक ही विधि है। और वह विधि है, परमात्मा की मर्जी। वह जैसा करवाए। वह जैसा रखे।”
Osho, एक ओंकार सतनाम – Ek Omkar Satnam
“नानक कहते हैं, ‘योगी, संतोष की मुद्रा बनाओ।’ यह हाथ-पैर की मुद्राएं साधते-साधते बहुत समय हो गया। इनसे कुछ हो नहीं रहा है। छोड़ो इन्हें। भीतर की मुद्रा साधो। और सबसे बड़ी मुद्रा है संतोष। क्यों? क्योंकि जो संतुष्ट हुआ उसकी सब चिंताएं गिर गयीं। सब चिंताएं असंतोष से पैदा होती हैं। सभी चिंताएं इस बात से पैदा होती हैं कि जो मुझे मिलना चाहिए, वह नहीं मिला है। अभाव से पैदा होती हैं। जिस दिन तुम संतुष्ट हुए, उस दिन तुम घोड़े बेच कर सो जाओगे। फिर कोई चिंता नहीं है। फिर रात कोई सपना भी न आएगा, क्योंकि सभी सपने असंतोष से पैदा होते हैं। दिन भर जो असंतोष तुम पालते हो, वह रात सपना बन जाता है। असंतोष का अर्थ है, भिखारीपन। संतोष का अर्थ है, मालिक हो गए, स्वामी हो गए। वही संन्यासी का लक्षण है। वह संतुष्ट है हर हाल। तुम ऐसी कोई स्थिति पैदा नहीं कर सकते, जहां तुम उसे असंतुष्ट कर दो। क्योंकि हर स्थिति में वह शुभ को देखेगा। और हर स्थिति में उसके हाथ को पहचान लेगा। दुख की गहरी से गहरी अवस्था में भी, तुम उसकी सुख की किरण न छीन सकोगे। क्योंकि अंधेरे से अंधेरे में भी वह जानता है कि सुबह आ रही है, सुबह करीब है। गहन से गहन अंधेरा जब होता है, तब वह हंसता है, प्रसन्न होता है, कि यह सुबह के करीब आने का लक्षण है। तुम उसे अंधेरे में नहीं डाल सकते। उसे हर अंधेरे बादल में भी चमकती हुई बिजली की शुभ्रता दिखाई पड़ती है। गहरी से गहरी दुख की अवस्था में भी, तुम उसका सूत्र नहीं छीन सकते। उसके संतोष का धागा उसके हाथ में है। वह सभी को स्वीकार करता है। उसने परम स्वीकार धारण किया है।”
Osho, एक ओंकार सतनाम – Ek Omkar Satnam