धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ Quotes
धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ Quotes
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“पुरुष को एक नया साथी मिला। वह हँसती थी तो फूल झरते थे। पुरुष फूलों को भूल गया। उसकी आँखों में चाँदनी छिटकती थी। वह चाँद को भूल गया। नारी की गति में ईश्वरत्व की शान थी और पुरुष ईश्वर को भूल गया। और ईश्वर फिर हार गया।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“प्यार का ही दूसरा नाम अस्तित्व है और अस्तित्व रखने के सामर्थ्य का नाम शक्ति है। अतः”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
“मनुष्यत्व को सीमित कर दो। धरा की कारा में मनुष्यत्व को बंदी बना दो। उसने दो मुट्ठी धूल उठाई और असीम भाव को सीमित देह में आबद्ध कर दिया। मनुष्यत्व अब मनुष्य बन गया।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“मनुष्यत्व में अनंग की चंचलता थी, रति की मादकता थी, धूप की गरमी थी, दूब की नमी थी, शबनम की चमक थी, तितली का निखार था। ईश्वर”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“ईश्वर ने एक अभाव का अनुभव किया। आसमान की सतह पर स्वर्ग था। स्वर्ग में अप्सराएँ थीं। अप्सराओं के साथ देवता थे। केसर के तीर चलानेवाला अनंग था। मादकता बिखेर देनेवाली रति थी। वैभव था, रूप था, रंग था, मादकता थी, विस्मृति थी। किंतु इन वैभवों से आकर्षित होकर स्वर्ग पाने की साधना करनेवाला कोई भी न था।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“जीवन ही स्वप्न है, देवि! पर उस स्वप्न ही में तो सत्य है।’’ बुद्ध बोले। ‘‘मैं भी उस स्वप्न में सत्य का आभास ढूँढ़ रही हूँ, तथागत! मेरा तात्पर्य है—अंत में निर्वाण को नारी के सामने झुकना पड़ा न, आर्य।’’ ‘‘नारी! हाँ, कह सकती हो! पर निर्वाण प्रणयिनी गोपा के सामने नहीं झुका। वह झुका है राहुल की माता के सामने। निर्वाण नारी के सामने झुका अवश्य, पर तब, जब मातृत्व की साधना ने नारी को निर्वाण से भी ऊँचा बना दिया।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“यशोधरा, मैं तुमसे एक भीख माँगने आया हूँ।’’ बुद्ध ने कहा। यशोधरा मुसकराई। ‘‘अंत में स्वर्ग को भी जीतकर झूले को पृथ्वी पर आना पड़ा न?’’ उसने पूछा।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“सामने देखा, बुद्ध। वह चकित रह गई। जल्दी से गले में आँचल डालकर उसने चरण-स्पर्श किया। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और स्तब्ध रह गए। सहसा बुद्ध ने अनुभव किया कि जैसे उनके हृदय में कोई कुछ बोला, ‘कौन निर्वाण?’ ‘‘हाँ, तथागत! मैं तुम्हारी साधना की तीव्रता सहने में असमर्थ हूँ। मैं जाना चाहता हूँ नारी के स्नेह की कोमल छाया में।’’ ‘‘जाओ।’’ बुद्ध ने उत्तर दिया। जिस समय यशोधरा ने अपना शीश बुद्ध के चरणों पर रखा, उसने अनुभव किया अपने हृदय में झिलमिलाती हुई ज्योति का। ‘‘मैं निर्वाण हूँ—यशोधरा को बुद्ध की एकमात्र भेंट।’’ ज्योति बोली।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“सिद्धार्थ उठ खड़े हुए। सहसा उनके सामने चमक उठा एक असीम ज्योति-पुंज। ‘‘मैं हूँ निर्वाण।’’ आकाशवाणी हुई। ‘‘मुझे निर्वाण नहीं चाहिए।’’ बुद्ध ने उत्तर दिया। ‘‘मैं तुम्हारे आश्रय में हूँ, बुद्ध!’’ ‘‘मुझे निर्वाण नहीं चाहिए।’’ और बुद्ध चल पड़े। ‘‘बुद्ध! जो मनुष्य संसार को आश्रय देने जा रहा हो, वह मुझे आश्रय नहीं दे सकता?’’ बुद्ध रुक गए। शांत स्वर में बोले, ‘‘तो निर्वाण, मेरे चरणों में शक्ति दे कि मैं द्वार-द्वार पर जाकर बजा सकूँ करुणा की वंशी—सुना सकूँ करुणा का संदेश!’’ और वह ज्योति-पुंज समा गया उनकी नख-ज्योति में। पर बुद्ध निर्वाण पाकर भी आकाश की ओर जाने के स्थान पर चल पड़े पृथ्वी को ओर।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“नारी, तुम नारी बनकर इस संसार में बहा देती हो प्रेम की धारा और प्यारे शिशु उसमें जल-क्रीड़ा करते हैं। जीवन दुःखमय है; पर प्रेम की यह छाया उसमें भर देती है सुख की ज्योति। मुझे निर्वाण नहीं चाहिए। मैं मनुष्य को सुनाऊँगा यह प्रेम का संदेश—मैं बताऊँगा प्रेम का, करुणा का वह देश, जहाँ के कण-कण में निर्वाण बसेगा, मुझे निर्वाण नहीं चाहिए।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“यशोधरा के भाल से फूट रही थीं अगणित रजत-किरणें और उसके कोमल अंचल के नीचे कोलाहल कर रहे थे अनेक शिशु। वह अपनी दृष्टि से बरसा रही थी ममता की मृदुल बूँदें। ‘‘नारी! माँ! शक्ति! तुम्हारा यह स्वरूप देवोपम है, यशोधरा! मैंने तुम्हें पहचाना न था,”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“नारी के प्रणयपाश को तोड़ा जा सकता है, पर स्नेह की इस अक्षय वात्सल्य-धारा में मनुष्य को तिनके-सा बहना ही पड़ता है।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“सुजाता के नयनों में था शहद-सा वात्सल्य, चाँदनी-सा स्नेह।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“रसाल के हरे परदे में पपीहा बोला—‘पीऊ।’ इस कोलाहल से घबराकर सिद्धार्थ ने आँखें बंद कर लीं, ‘‘मुझे निर्वाण चाहिए। मैं इन बूँदों-सा सूक्ष्म बन सकूँ। मैं इस विहग-ध्वनि सा विस्तृत हो सकूँ। मैं जीवन का सत्य देखूँगा, जीवन का सत्य।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“मणिदीप पर ढँका हुआ कमल-पत्र उसने उठा दिया। कक्ष में धीमी हरीतिमा लहरा उठी, उसने”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“झूला आगे बढ़े या पीछे, पर उसे पृथ्वी पर आना ही पड़ता है संगीत के सम की भाँति—और नारी वह सम है आर्य, जहाँ पर घूम-फिरकर पुरुष को आना ही पड़ता है।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“नारी की मूक भंगिमाओं में भी कितने संगीत लहरा उठते हैं! उसके मौन में भी कितने स्वर ध्वनित हो उठते हैं!”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“नारी की मूक भंगिमाओं में भी कितने संगीत लहरा उठते हैं!”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“धीमे-धीमे झूलो, कुमार! धीमा संगीत अधिक सुखदायी होता है। संगीत का सम अधिक मधुर होता है, कुमार!’’ ‘‘संगीत का सम तो मधुर है, किंतु उसकी मधुरता का आनंद आलाप की ऊँचाई और स्वरों के घुमाव के बाद ही आता है, गोपा।’’ झूला बढ़ता गया। रसाल की शाखें झूमने लगीं। पास के चंपक-तरु की डालियाँ गुँथ गई थीं रसाल की शाखाओं से। चंपक की डालियों पर थे फल और फूलों पर थीं वर्षा की बूँदें—शाखें झूमीं और चंपक सौरभ से सनी हुई बूँदें सहसा चू पड़ीं।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“करीम ने सिर झुकाकर कहा, ‘‘या खुदा! हम लोग नंगे हैं, भूखे हैं।’’ खुदा ने अपनी आँखें उठाईं। सकीना पर उसकी निगाह गड़ गई और उन्होंने बगल में बैठे हुए एक फरिश्ते से कहा, ‘‘हजरत, मैं देखता हूँ कि भूख में भी आदमी का हुस्न निखरता जाता है।’’ फरिश्ते ने अदब से सिर झुकाकर कहा, ‘‘हुजूर की नायाब कुदरत!”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“एक दिन सभी बाँदियाँ मुर्शिदाबादी रेशम की पोशाक पहनकर खड़ी हुईं। नवाब साहब ने पहली बाँदी के कंधे पर हाथ रखा ही था कि रेशम की चिकनाहट की वजह से दुपट्टा फिसल गया और वे गिरते-गिरते बचे। नीचे से ऊपर तक बाँदियों में भय की एक लहर दौड़ गई। नवाब साहब सँभले और गरजकर बोले, ‘‘बदजातो! कल से तुम लोगों के कंधे नंगे रहने चाहिए।’’ और दूसरे दिन से उनके कंधे नंगे रहने लगे। ‘‘समझी बेटी, तब कपड़ों की कमी नहीं थी और न अब है; मगर हम गुलाम और गरीब तब भी नंगे रहते थे और अब भी नंगे रहते हैं।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“छतरमंजिल में नवाब साहब की ऐशगाह थी। दिन भर दोस्तों के साथ ऐश करने के बाद जब नवाब साहब आरामगाह में जाते थे तो उनकी पलकों में गुलाबियों का नशा रहता और उनके कदमों में शराब की छलकन। उन्हें सहारा देने के लिए जीने की हर सीढ़ी पर दोनों ओर नौजवान बाँदियाँ रहती थीं, जिनके कंधों पर हाथ रखकर वे धीरे-धीरे ऊपर जाते थे। सुन रही है न?’’ ‘‘हूँ!”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“जिसने आग लगाई वह कप्तान, जिसने फाँसी चढ़ाई, वह जेलर और मैंने गाँठ लगा दी तो मैं जल्लाद हो गया। जो बचे वो अफसर हो गए, जो कप्तान था सुपरंडंट हो गया और मैं जल्लाद हो गया! राम जानता है, मैंने ऐसे आहिस्ते से झटका दिया था कि एक नस भी नहीं चिटकी होगी और परान तो ऐसे आहिस्ते से रेंगकर निकले होंगे...और उस पर यह मुझे जल्लाद कहता है! दिन भर यही सोचता है पड़े-पड़े!”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“सुपरंडंट साहब ने पूछा, ‘तेरी आखिरी ख्वाहिश क्या है?’ तो हँसकर बोला, ‘अगले जन्म में तुम्हारा सगा भाई बनूँ, तब तुम फाँसी दो!’ साहब ने मुँह फेरकर रूमाल निकाल लिया, फिर मेरी ओर देखकर बोला, ‘देर क्यों करते हो पुरोहितजी, जल्दी कंगन बाँधो। लगन टल गई तो?’ बस, मेरा हाथ काँप गया। पहले तो लगा जैसे आँख में आँसू आने वाले हैं, फिर मैंने दिल कड़ा करके सोचा, अरे, आँसू-वाँसू तो सब बड़े आदमियों के चोचले होते हैं। जिसके पेट में दाना हो, तन पर कपड़ा हो, उसके दीदे में आँसू भी सोहता है। बस, मैंने फंदा डालकर खींच ही तो दिया रस्सा।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“वे क्यों रोते हैं? क्यों टूटते हैं? अपनी जिंदगी को, अपने रहन-सहन को, अपनी व्यवस्था को बदलते क्यों नहीं?”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“मैं प्रेम के रूमानी अंश को नहीं मानता, फिर भी लगता है, उसे अस्वीकार भी नहीं कर सकता। पता नहीं यह केवल संस्कार मात्र है, जो छूट नहीं पाता या सच्चाई का तकाजा है?’’ चाँद को लगा कि राजे ने अभी-अभी जाल के जो तार तोड़े हैं, वह स्वयं उनमें उलझ रहा है।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“उम्र होती है, जब एक अजब सा रंगीन प्यारा फूल सभी के मन में खिलने लगता है। उस समय जो भी व्यक्तित्व हमारे समीप आया, उसकी गहरी छाप हम पर पड़ जाती है; लेकिन हमारे चारों ओर की व्यवस्था, वातावरण, परंपराएँ, सामाजिक ढाँचा कुछ ऐसा है कि हम सब बेबस हैं और कायर हैं। सामाजिक स्तर पर वह व्यक्ति हमारे साथ आ नहीं पाता। अपनी व्यक्तिगत सीमाओं में आबद्ध हम आत्मिक प्रेम, आस्था और निष्काम पूजा की बात करने लगते हैं; पर सामाजिक स्तर पर विवाह करते हैं। पत्नी आती है, बच्चे होते हैं और हमारे दो व्यक्तित्व हो जाते हैं। दोनों एक-दूसरे को धिक्कारते हैं। दोनों एक-दूसरे की साँसों में जहर घोल देते हैं। हमारा व्यक्तित्व खोखला हो जाता है और खोखले व्यक्तित्व से बना हुआ समाज अनैतिक।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“एक अजब सा बल, एक अजब सी रंगीनी, एक ताजा अँगड़ाई हमारी आत्मा में जाग जाती है और जो व्यक्तित्व हमें छूकर फूल की तरह खिला देता है, जो हममें जाने कितना अमृत भर देता है, जिसके सपनों में हम बरसों डूबे रहते हैं, फिर उसी के सामने हम एक दिन यह प्रश्नचिह्न लगा दें कि इससे हमारी समस्याएँ सुलझती हैं या नहीं?”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“नारी और पुरुष के संबंधों में अस्वस्थ रूमानी अंश निकालकर अगर एक स्वस्थ मानवीय हमदर्दी रहने दी जाए, जिसके सहारे एक स्वच्छ सामाजिक जीवन बन सके तो बहुत समस्याएँ सुलझ जाएँ।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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“घर-बार, पत्नी, बच्चे सभी जैसे पिंजरे की तीलियाँ हैं। पल भर अगर आदमी को एकांत मिलता है, तब सिर्फ एक व्यक्ति हमारे साथ रहता है। वह, जो हमारी जिंदगी में साथ नहीं आ पाया, जिसे हम खो चुके हैं।”
― धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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