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“सामने देखा, बुद्ध। वह चकित रह गई। जल्दी से गले में आँचल डालकर उसने चरण-स्पर्श किया। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और स्तब्ध रह गए। सहसा बुद्ध ने अनुभव किया कि जैसे उनके हृदय में कोई कुछ बोला, ‘कौन निर्वाण?’ ‘‘हाँ, तथागत! मैं तुम्हारी साधना की तीव्रता सहने में असमर्थ हूँ। मैं जाना चाहता हूँ नारी के स्नेह की कोमल छाया में।’’ ‘‘जाओ।’’ बुद्ध ने उत्तर दिया। जिस समय यशोधरा ने अपना शीश बुद्ध के चरणों पर रखा, उसने अनुभव किया अपने हृदय में झिलमिलाती हुई ज्योति का। ‘‘मैं निर्वाण हूँ—यशोधरा को बुद्ध की एकमात्र भेंट।’’ ज्योति बोली।”

Dharamvir Bharati, धर्मवीर भारती की लोकप्रिय कहानियाँ
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