Bhartiya Darshan-II Quotes

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Bhartiya Darshan-II (Hindi Edition) Bhartiya Darshan-II by Sarvepalli Radhakrishnan
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“आत्मा में पांच सामान्य गुण हैं, और नौ गुण विशेष हैं, यथा बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म और अधर्म और मानसिक प्रभावोत्पादक क्षमता। ईश्वर में पांच सामान्य गुण हैं और इनके अतिरिक्त ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न भी हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“पृथ्वी से | बनी वस्तुएं तीन प्रकार की हैं : शरीर, इन्द्रियां तथा प्रत्यक्ष—विषय पदार्थ।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“पृथ्वी के चार गुण हैं : गन्ध, रस, रंग और स्पर्श। जल के तीन गुण हैं : रस, रंग तथा स्पर्श। अग्नि के दो गुण हैं : रंग और स्पर्श। वायु में केवल स्पर्श गुण है तथा आकाश में केवल शब्द गुण है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“आकाश नित्य है, सर्वत्र उपस्थित है, इन्द्रियातीत है और जोड़ने तथा पृथक् करने के व्यक्तिगत गुण रखता है। आकाश समस्त देश को पूर्ण करता है, यद्यपि यह स्वयं देश नहीं है, क्योंकि यह वस्तुओं के साथ विशेष सम्बन्धों द्वारा सम्बद्ध हुए बिना और उन सम्बन्धों द्वारा उनमें शब्द उत्पन्न किए बिना न तो वस्तुओं पर कोई प्रभाव डाल सकता है और न क्रिया ही कर सकता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“आकाश एक सरल (अमिश्रित), निरन्तर स्थायी तथा अनन्त द्रव्य है। यह शब्द का अधिष्ठान है। यह रंग, रस, गन्ध और स्पर्श आदि गुणों से रहित है। अपनयन की क्रिया द्वारा यह सिद्ध किया जाता है कि शब्द आकाश का विशिष्ट गुण है।90 यह निष्क्रिय है। समस्त भौतिक पदार्थ इसके साथ संयुक्त पाए जाते हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“वस्तुएं गति करती हैं काल के कारण, और परस्पर सम्बद्ध रहती हैं देश के कारण।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“देश सह—अस्तित्व का प्रतिपादन करता है और काल अनुक्रम का, अथवा ऐसा कहना अधिक ठीक होगा कि देश दृश्यमान पदार्थों का वर्णन करता है और काल ऐसे पदार्थों का वर्णन करता है जो उत्पन्न होते हैं तथा नष्ट होते हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“काल एक ही है जो विस्तार में सर्वत्र उपस्थित है।84 यह स्वरूप में व्यक्तिरूप है, और इसमें जोड़ने तथा अलग करने के दोनों प्रकार के गुण हैं। क्षण, मिनट, घण्टा, वर्ष आदि प्रचलित लौकिक भाव उसी ठोस मूर्तरूप समय से निकले हैं। वैशेषिक के मत में, काल एक नित्य द्रव्य है85 और समस्त अनुभव का आधार है।86 हम यह तो नहीं जानते कि काल अपने—आप में क्या है, किन्तु हमारा अनुभव काल के रूप में ढाला जाता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“काल एक ही है जो विस्तार में सर्वत्र उपस्थित है।84 यह स्वरूप में व्यक्तिरूप है, और इसमें जोड़ने तथा अलग करने के दोनों प्रकार के गुण हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“जो सब प्रकार के परिवर्तन के होते हुए भी स्थिर रहता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“जीवात्मा तथा परमात्मा के अन्दर भेद किया गया है।78 इन दोनों में सादृश्य तो है किन्तु तादात्म्य नहीं है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, संकल्प और ज्ञान, निःश्वास और उच्छवास आंखों की पलकों का खुलना तथा बन्द होना, शारीरिक घावों का भर जाना, मन की गति और इन्द्रियों की प्रवृत्ति आत्मा के अस्तित्व के प्रमाण रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।69 अपनी प्राकृतिक अवस्था में आत्मा ज्ञान से रहित होती है, जैसे कि प्रलय में। इसे वस्तुओं का बोध तभी होता है जबकि यह शरीर से सम्बद्ध होती है।70 चेतनता का धारण आत्मा के द्वारा होता है, यद्यपि यह इसका अनिवार्य तथा अविच्छेद्य लक्षण नहीं है। मन के द्वारा जीवात्मा न केवल बाह्य वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करती है, बल्कि अपने गुणों का भी ज्ञान प्राप्त करती है। आत्मा यद्यपि सर्वव्यापक है, तो भी इसका ज्ञान, अनुभव तथा कर्म का जीवन केवल शरीर के साथ ही विद्यमान रहता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“आत्मा के अस्तित्व का अनुमान इस तथ्य के द्वारा किया जाता है कि चेतनता शरीर, इन्द्रियों तथा मन का गुण नहीं हो सकती।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“मन यद्यपि परमाणु से बना है, पर वह अन्य किसी वस्तु को उत्पन्न नहीं करता। किन्तु आकाश सर्वव्यापक होते हुए भी शब्द को उत्पन्न करता”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“आकाश, काल और देश सर्वव्यापक हैं, और बृहत्तम विस्तार रखते हैं और सब शरीरधारी वस्तुओं के एक समान पात्र हैं।62 आत्मा और मन, आकाश, काल और देश, वायु और अन्तिम परमाणु साधारणतः प्रत्यक्ष के विषय नहीं हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, देश, आत्मा और मन—ये नौ द्रव्य हैं, जिनके अन्दर समस्त शरीरधारी तथा अशरीरी वस्तुओं का समावेश हो”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“सरल (अमिश्रित) द्रव्यों में नित्यत्व, स्वातन्त्र्य तथा निरपेक्ष व्यक्तित्व के लक्षण पाए जाते हैं।57 उनकी न तो उत्पत्ति होती है और न विनाश ही होता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“जो वस्तु अन्य किसी पर निर्भर करती है वह नित्य नहीं हा सकती।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“वह जिसके अन्दर कर्म व गुण रहते हैं और जो सहास्तित्वयुक्त कारण है”, द्रव्य है।53 यह गुणों का अधिष्ठान है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“स्वात्मसत्त्व’ को आत्मनिर्भर अस्तित्व कहा है जो समस्त अस्तित्व से स्वतन्त्र है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“अस्तित्व में भेद किया जाता है—सत्ता—सम्बन्ध द्रव्यों, गुणों तथा कर्मों में रहता है और स्वात्मसत्त्व सामान्य, विशेष और समवाय में रहता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“तीन, अर्थात् सामान्य, विशेष और समवाय बौद्धिक भेद से उत्पन्न होते हैं, अर्थात् बुद्धि की अपेक्षा रखते हैं।46 ये तार्किक द्रव्य हैं। प्रशस्तपाद का कहना है कि ‘वे अपने एकमात्र सत्त्व को अपने अन्दर धारण करते हैं—अर्थात् स्वात्मसत्त्व हैं। बुद्धि उनकी मार्गदर्शक है (बुद्धिलक्षणत्व)। वे कार्य नहीं हैं, कारण नहीं हैं तथा उनमें सामान्य अथवा विशेषत्व भी नहीं है। वे नित्य हैं और उन्हें वस्तु शब्द से व्यक्त नहीं किया जा सकता”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“आंखें खोलते ही हम अपने आगे एक विस्तृत भौतिक जगत् को पाते हैं जिसमें भिन्न—भिन्न वस्तुएं तथा उनकी व्यवस्थाएं भी भिन्न—भिन्न प्रकार की हैं, जिन पर विचार अपना कार्य कर सकता है और जब हम अन्दर की ओर देखते हैं तो हमें एक अभौतिक जगत् का अनुभव होता है जिसकी परिभाषाएं और सम्बन्ध अपने हैं। निर्दोष दर्शनपद्धति की मांग है कि हम अपने ध्यान को अनुभव—सिद्ध पदार्थों पर ही केन्द्रित करें, जो ज्ञान के विषय हैं, और केवल ऐसी ही प्रकल्पनाओं को स्वीकार करें जो हमारी अनुभवगम्य व्यवस्था की व्याख्या के सम्बन्ध में अनिवार्य प्रतीत होंं। विश्लेषणात्मक सर्वेक्षण एक परिशुद्ध दर्शनपद्धति की सबसे प्रथम आवश्यकता है, और वैशेषिक के विश्लेषण के परिणाम पदार्थों के सिद्धान्त में निहित हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“उसके अनुसार हर एक वस्तु का अपना अस्तित्व केवल पारस्परिक सम्बन्ध के कारण है तथा कोई भी वस्तु निरपेक्ष रूप में अपना अस्तित्व नहीं रखती क्योंकि सम्बन्ध ही जीवन की सामग्री अथवा मूल तत्त्व है, इसलिए आत्मा और प्रकृति भी केवल सम्बन्धों के संकलन हैं,”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“मिथ्याज्ञान के चार भेद किए गए हैं और वे ये हैं : ‘संशय, विपर्यय, अध्यवसाय और स्वप्न। शिवादित्य इन चारों को एक—दूसरों में सन्निविष्ट करके केवल दो ही भेद रखता है, अर्थात् संशय और भूल। ऊहा, निर्विकल्प ज्ञान तथा पराश्रित तर्क को वह संशय के अन्तर्गत रखता है।36 श्रीधर स्वप्न का पृथक् रूप से वर्णन करने के औचित्य का समर्थन इस आधार पर करता है कि स्वप्न शरीर की एक अवस्था—विशेष में ही आते हैं।37 4.”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“आर्षज्ञान ऋषियों की अन्तर्दृष्टि है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“शाब्दिक ज्ञान अनुमान का विषय है।29 चेष्टा,30 अर्थापत्ति,31 सम्भव32 तथा अभाव,33 ये सब अनुमान प्रमाण के अन्तर्गत आते हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“योग्यतर मनों ने सत्यों का ज्ञान ग्रहण किया और उसे हम तक पहुंचाया। वेदों की वाक्य रचना को देखकर यह समझा जा सकता है कि इनके रचयिता अवश्य मेधावान् व्यक्ति रहे होंगे और उनको स्वर्ग तथा अदृष्ट (नियति) का पूर्ण और सही—सही ज्ञान भी अवश्य था। शनै:—शनै: ईश्वर को ही वेदों का रचयिता माना जाने लगा। “वेदों की प्रामाणिकता इसके ईश्वर की वाणी होने के कारण है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“वेदों की प्रामाणिकता को ऋषियों के साक्षात् ज्ञान के आधार पर रखता है, जिन्होंने नित्य सत्यों तथा विधानों को समझ लिया है, वहां वैशेषिक उनकी प्रामाणिकता का अनुमान ईश्वरी—प्रेरणाप्राप्त ऋषियों के सर्वथा निर्भ्रान्त के आधार पर करता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II
“शब्द ज्ञान को अनुमान के अन्तर्गत रखता है।25 शास्त्रीय कथनों की प्रामाणिकता वक्ताओं की प्रामाणिकता के अनुमान से है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-II

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