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Bhartiya Darshan-II Quotes
Bhartiya Darshan-II
by
Sarvepalli Radhakrishnan2 ratings, 3.00 average rating, 0 reviews
Bhartiya Darshan-II Quotes
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“अनुभूत एकत्व को अनेकों विभिन्न तत्त्वों में भंग कर देता है,”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“अनुभूत पदार्थों को परदे पर पड़े हुए छायाचित्रों की भांति मानते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में द्रव्य हैं। द्रव्यों के द्वारा, जो पृष्ठभूमि में छिपे रहते हैं, हमारे मन के परदे पर छायाचित्र प्रकट होते हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“अनुभव को एक निरन्तर परिवर्तित होने वाले छायाचित्र की भांति मानने के लिए बाध्य होते हैं,”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“हम एक पदार्थ को भिन्न—भिन्न समयों में वही तभी तक कहते हैं जब तक कि उसमें वही गुण रहते हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“अपने गुणों तथा कर्मों को छोड़कर द्रव्य क्या वस्तु है, यह जानने की आशा हम नहीं कर सकते।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“धागों से बननेवाला कपड़ा केवल धागों की जगह घेरता है, कपड़े का स्थान (देश) नहीं घेरता जबकि कपड़े के गुण जैसे इसका रंग आदि केवल कपड़े का ही स्थान घेरते हैं धागों का नहीं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“द्रव्यों तथा गुणों का परस्पर सम्बन्ध समवाय—सम्बन्ध कहा जाता है, अर्थात् इन दोनों में से कोई भी एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकता।238”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“विचार के एक चिरस्थायी स्वभाव की प्रवृति के कारण हम गुणों की अपेक्षा द्रव्य को अधिक यथार्थ समझते हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“द्रव्यों के विशिष्ट गुण कार्य माने गए हैं, अर्थात् ऐसे गुणों का उद्भव द्रव्यों के अन्दर से है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“द्रव्य वह है जो गुणों का अधिष्ठान हो।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“द्रव्य, गुण और कर्म को विषयनिष्ठ माना गया है, जबकि सम्बन्ध तार्किक विश्लेषण की उपज हैं, जिन्हें विश्व के तथ्यों का रूप देना हमारे अधिकार के बाहर की बात है। पहले तीन पदार्थों के विषय में कहा जाता है कि वे सत्ता के लक्षण को ग्रहण करते हैं, और सत्ता के विषय में समझा जाता है कि वह उस गुण का, अर्थात् सत् से युक्त एक कल्पना का, तीनों पदार्थों में आधान करती है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“विभिन्न सम्बन्ध—कारण—कार्य और अन्योन्य तथा सह—उपस्थिति”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“वह क्या है जो किसी वस्तु को वस्तुविशेष बनाता है? किसी भी वस्तु के विषय में जो कुछ हम जानते हैं, वह उसके कुछ गुण हैं और यह कि किस रूप में वह व्यवहार करती है। अनुपमता की परिभाषा नहीं की जा सकती, तो भी यह अक्षय प्रतीत होती है। विशेषता मात्र एक धारणा प्रतीत होती है, जो अभाव ही बराबर है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“समवाय अर्थात् कभी पृथक् न हो सकने वाला सम्बन्ध कहलाते हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“जब वैशेषिक दर्शन आस्तिकवादपरक हो गया तो मोक्ष के आनन्द को दैवीय अनुकम्पा का परिणाम समझा जाने लगा, और धार्मिक नियमों को ईश्वरीय इच्छा की अभिव्यक्ति माना जाने लगा।210”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“जब हम यह अनुभव कर लेते हैं कि आत्मा का यथार्थस्वरूप इस सब देहधारी सत्ताओं से सर्वथा पृथक् तथा भिन्न है तो हम यह जान लेंगे कि सब आत्माएं एकसमान हैं। जब यथार्थज्ञान स्वार्थ—प्रेरणा को दूर भगा देता है, तो स्वार्थपरक कर्मों का अन्त हो जाता है, कोई मौलिक मूल्य उत्पन्न नहीं होता, और इसीलिए फिर पुनर्जन्म भी नहीं होता।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“हम धर्म और अधर्म अथवा अदृष्ट का संग्रह करते रहते हैं,”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“ज्योंही हम अनुभव करते हैं कि पदार्थ, जो इतने अधिक आकर्षक अथवा अपकर्षक प्रतीत होते हैं, केवल परमाणुओं के क्षणिक मिश्रणमात्र हैं, हमारे ऊपर से उनका प्रभुत्व जाता रहता है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“नि:स्वार्थ अन्तर्दृष्टि द्वारा प्राप्त किया गया वस्तुओं का सत्यज्ञान ही केवल हमें अन्तिम मोक्ष दिला सकता है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“विस्तृत अर्थों में, अहिंसा ही धर्म है, और हिंसा अर्थात् सृष्टि के प्रति विद्वेषभाव अधर्म है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“कर्तव्य किसी दृश्य परिणाम (यथा धन—सम्पति आदि) की प्राप्ति इच्छा को छोड़कर और सर्वथा पवित्र प्रेरणा की भावना से किए जाएं, तो उनका परिणाम धर्म होता है।202 आत्मिक उन्नति के लिए आत्मसंयम आवश्यक है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“संन्यासी वह नहीं है जो संसार को एकदम भुला देता है, बल्कि वह है जो सार्वभौम उपकार का व्रत लेता है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“कर्तव्य जो सब पर और सब कालों तथा सब देशों में लागू हों, ये हैं: (1) श्रद्धा, (2) अहिंसा, अर्थात् किसी भी जीव को हानि न पहुंचाने का संकल्प:198 (3) भूतहित की भावना, अर्थात् प्राणिमात्र के प्रति दया की भावना; (4) सत्यभाषण; (5) अस्तेय, अर्थात् इंमानदारी; (6) ब्रह्मचर्य; (7) मन की शुद्धता; (8)क्रोध का वर्जन; (9) स्नान द्वारा शरीरशुद्धि (अभिषेचन); (10) शुद्धिकारक द्रव्यों का प्रयोग; (11) विशिष्ट देवता की भक्ति; (12) उपवास; और (13) कर्तव्यपालन में आलस्य न करना (अप्रमाद)।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“धर्म सांसारिक वैभव तथा आत्मिक कल्याण (नि:श्रेयस) दोनों की प्राप्ति का उपाय बताता है। सांसारिक वैभव कर्मकाण्ड सम्बन्धी पवित्रता की देन है तथा नि:श्रेयस तत्वज्ञान से प्राप्त होता है।196 सबसे उच्च श्रेणी का सुख, प्रशस्तपाद के मत में, ज्ञानी पुरुषों का सुख है जो पदार्थ की स्मृति, इच्छा, चिन्तन जैसे सर्व प्रकार के माध्यमों से स्वतन्त्र है तथा जो उनके ज्ञान, मन की शान्ति, सन्तोष और सद्गुणों के विशिष्ट स्वभाव के कारण होता है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“आत्मा में पांच सामान्य गुण हैं, और नौ गुण विशेष हैं, यथा बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म और अधर्म और मानसिक प्रभावोत्पादक क्षमता। ईश्वर में पांच सामान्य गुण हैं और इनके अतिरिक्त ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न भी हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“पृथ्वी से | बनी वस्तुएं तीन प्रकार की हैं : शरीर, इन्द्रियां तथा प्रत्यक्ष—विषय पदार्थ।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“पृथ्वी के चार गुण हैं : गन्ध, रस, रंग और स्पर्श। जल के तीन गुण हैं : रस, रंग तथा स्पर्श। अग्नि के दो गुण हैं : रंग और स्पर्श। वायु में केवल स्पर्श गुण है तथा आकाश में केवल शब्द गुण है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“आकाश नित्य है, सर्वत्र उपस्थित है, इन्द्रियातीत है और जोड़ने तथा पृथक् करने के व्यक्तिगत गुण रखता है। आकाश समस्त देश को पूर्ण करता है, यद्यपि यह स्वयं देश नहीं है, क्योंकि यह वस्तुओं के साथ विशेष सम्बन्धों द्वारा सम्बद्ध हुए बिना और उन सम्बन्धों द्वारा उनमें शब्द उत्पन्न किए बिना न तो वस्तुओं पर कोई प्रभाव डाल सकता है और न क्रिया ही कर सकता है।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“आकाश एक सरल (अमिश्रित), निरन्तर स्थायी तथा अनन्त द्रव्य है। यह शब्द का अधिष्ठान है। यह रंग, रस, गन्ध और स्पर्श आदि गुणों से रहित है। अपनयन की क्रिया द्वारा यह सिद्ध किया जाता है कि शब्द आकाश का विशिष्ट गुण है।90 यह निष्क्रिय है। समस्त भौतिक पदार्थ इसके साथ संयुक्त पाए जाते हैं।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
“वस्तुएं गति करती हैं काल के कारण, और परस्पर सम्बद्ध रहती हैं देश के कारण।”
― Bhartiya Darshan-II
― Bhartiya Darshan-II
