देवकी का बेटा Quotes

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देवकी का बेटा देवकी का बेटा by रांगेय राघव
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देवकी का बेटा Quotes Showing 1-30 of 36
“यक्षी चूलकोका की दया थी अन्यथा क्या वे बच सकते थे?”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“राधा, रंगवेणी, सुधीरा, चित्रगंधा, सुनंदा, संभद्रा,”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“गोपी रंगवेणी अपने पिता सारंग के पास खड़ी आश्चर्य से देख रही थी। सुनन्द की पुत्री सुनन्दा, वृषभानु की पुत्री राधा, प्रचण्ड की दुहिता चित्रगंधा के नेत्र फटे-से थे। वसुदेव की गोपी स्त्रियाँ कौशल्या, रत्ना, पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना स्तब्ध खड़ी थीं। देवक-पुत्रियाँ, वसुदेव की पत्नियाँ―धृतदेवा,शांतिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा आगे बढ़ आई थीं। गोपजनों में स्तोककृष्ण, अंशु, श्रीदामा सुबल, अर्जन, विशाल, ऋषभ,तेजस्वी,देवप्रस्थ और वरुथप विचलित हो गए थे। उस समय केशी से लेकर सुभद्रा तक, वसुदेव के लगभग उनहत्तर पुत्र और एक पुत्री, एक स्वर में कृष्ण से बोल उठे थे-“भ्रातर!”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“गोपी रंगवेणी अपने पिता सारंग के पास खड़ी आश्चर्य से देख रही थी। सुनन्द की पुत्री सुनन्दा, वृषभानु की पुत्री राधा, प्रचण्ड की दुहिता चित्रगंधा के नेत्र फटे-से थे। वसुदेव की गोपी स्त्रियाँ कौशल्या, रत्ना, पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना स्तब्ध खड़ी थीं। देवक-पुत्रियाँ, वसुदेव की पत्नियाँ―धृतदेवा,शांतिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा आगे बढ़ आई थीं।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“लगता था कि आज इंद्र वारुण शंख बज रहा था। आज उसने मेघों का सर्वतोभद्र व्यूह रच दिया था।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“कृष्ण ने स्वर उठाकर कहा, “प्राणी अपने कर्म से उत्पन्न होता है और मर जाता है, ऐसा ऋषियों ने कहा है। यदि कर्म से फल मिलता तो इंद्र की क्या आवश्यकता है?”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“मैं ब्रज को चाहता हूँ, भ्राता!” कृष्ण ने कहा, “मैं इंद्र का विरोध करूँगा। इस एक इंद्र-विरोध से कंस की जड़ें कट जाएँगी।” “तू समझता है, जन मान लेंगे?” “वे तो मान लेंगे, भ्रातर! वे कंस के राज्य में दरिद्र हैं।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“व्रात्य कूर्चामुख एक अधिनायक था। वह एक काला और एक सफेद चमड़ा पहनता था। उसके वस्त्र गृहस्थ व्रात्यों की भाँति किनारेदार नीले कपड़े के नहीं होते थे। वह सिर पर उष्णीष और पाँवों में उपानह पहनकर आता, गंभीर रहता। उसके साथ निषादी और विदेह का वर्णसंकर पुत्र क्षुद्र तथा वैश्य पिता और शूद्रमाता का पुत्र करण-यह दोनों होते, जो उसकी सेवा किया करते। उसके साथ मागधी होती। कहते थे, वह मगध के उत्तरी भाग से यक्षी चूलकोका की साधना भी सीख आया था। वह वेद को नहीं मानता था और ब्राह्मणों को देखते हुए भी लिंगोपासना करता था। कहा जाता था कि उसने एक वन्य स्त्री को एक बार श्मशान में ले जाकर नग्न करके मदिरा पिलाई थी और फिर उस स्त्री ने श्मशान की राख बालों में भरकर नृत्य किया था। व्रात्य इंद्रोपासक ब्राह्मणों से त्याज्य था, क्योंकि वह चण्डालों के हाथ का भी खा लेता था।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“जब भाभी राधा, वृषभानु की पुत्री, ने उसे एकांत में ले जाकर अपने वक्ष से लगाकर उसका मुख अतृप्त नयनों से देखा था तब वह लज्जित हो उठा था। दोष राधा का नहीं था। बचपन में जब कृष्ण सात वर्ष का था, तब भी वह एक दिन नहाती कुमारियों के वस्त्र लेकर छिप गया था। तब उसने कुमारियों को नग्न निकलकर, जल से आने तक, तंग किया था। आज वह बचपन की बात फिर याद आ रही है और कृष्ण लजा रहा है। वे बचपन के दिन कितने ऊधम के दिन थे, कितने उच्छृंखल थे! वे भाभियाँ जो उससे दो-दो, तीन-तीन वर्ष बड़ी थीं, उससे अब दूसरे प्रकार का व्यवहार क्यों करती थीं!”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“यह स्त्री की निर्बलता है। राष्ट्रनीति और बालक को प्रसव देना, दो भिन्न बातें हैं। पहली में बोलने की आज्ञा नहीं, दूसरी में चाहे जितना चिल्ला सकती है।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“समृद्धि और शांति राजा का कर्त्तव्य है, इसीलिए प्रजा उसे सम्मान और कर देती है, वह ऐसा करके कोई उपकार नहीं करता। राजा प्रजा का प्रहरी है, भोक्ता नहीं।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“अक्रूर ने कहा, “देवी! विश्वास तो एक नौका है, उसे सदैव परिस्थिति की लहरों के झटके लगा करते हैं।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“बलाहक ने चिढ़कर कहा, “नागों पर गरुड़ यहाँ यमुना तीर पर आक्रमण नहीं कर सकते। जिस दिन रमणक द्वीप से युद्ध के बाद नाग यमुना तीर पर आए थे उस दिन वे कुछ सोचकर ही आए थे। ऋषि सौभरि का यहाँ तपोवन था और मत्स्य जाति रहती थी। गरुड़ों ने मत्स्यों पर आक्रमण कर दिया था। मत्स्य कबीला उस समय ब्राह्मणों का प्रिय था। तब से गरुड़ों को ब्राह्मणों ने भगा दिया था। नाग इसलिए यहाँ बस गए थे कि कालिय वंश बड़ा भयानक था।” “था”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“उत्तर में नागों का रसातल में अभी तक व्यापार है, जहाँ से वे हाटक लाकर बेचते हैं। इनकी भोगवती अत्यन्त सुंदर नगरी है। जहाँ ब्राह्मणमित्र नागराज वासुकि वंश रहता है। बाकी ऐरावत, तक्षक, एलापत्र और सुरस ब्राह्मण और क्षत्रियों के विरोधी हैं, जो इंद्रप्रस्थ के उत्तर और इधर-उधर फैले हुए हैं। तक्षक को कुछ दिन पूर्व ही खाण्डव वन में शरण लेनी पड़ी है। बलाहक”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“नागरिक खण्ड-खण्ड होकर परस्पर झुण्ड बनाते और परस्पर विचार-विनिमय करते। वे कभी धर्माधिकरण की ओर जाते, कभी राजप्रासाद की ओर। परन्तु आगे बढ़ने का साहस नहीं होता। जयाश्व इस सुलगती लपट को बड़े ध्यान से देख रहा था।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“आकाश में सौदामिनी का स्फुरण देखकर वृक्ष क्यों झूमने लगता है? गर्भ की पीड़ा देखकर भी युवती फिर गर्भ धारण करती है, क्यों?” “देवि! वह भविष्य के सुख की आशा और वर्तमान में एक उत्कट वासना होती है।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“क्या स्त्री से जन्म लेने वाले, स्त्री की रक्षा करने में असमर्थ हो गए हैं! क्या सब ही हिंस्र और पशु हो गए हिंम?..नहीं..”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“उसके नेत्र कैसे हैं पीलुका?” “रुरु। मृग के से हैं प्रभु!”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“कांचनगात्री है प्रभु!”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“पीलुका ने अपना नाश देखकर यही निश्चित किया था कि जब वह गिर ही चुकी है तो फिर अब वह इतना गिर लेगी कि उसका पतन ही दूसरे प्रकार का उत्थान वन जाए।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“चिमुरा हँस दी। उसने दोनों हाथों से चषक थाम लिया और सारी मदिरा गटगट करके पी गई। कंस ने कहा, “सुंदर! अभुक्त है?” पीलुका मुस्कराई। कहा, “अपराध क्षमा हो, देव! जब तक तरुणी माता नहीं होती तब तक वह ऐसे वृक्ष के समान है जिसके फूल सदा ही समान गंध देते हैं और प्रत्येक प्रभात में मनमोहन करते हैं।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“वतवारें टूट गई थीं। तब वसुदेव ने बालक को उठाकर वक्ष से चिपकाकर कहा था, “वज्रधर इन्द्र! आज शपथ है कि तेरा यह दुरभिमान वसुदेव कुचलकर रहेगा। आज इस फूल को कोई नहीं मसल सकेगा।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“कंस एकांत में पागल-सा घूमता। यह वह क्या कर रहा था। उसकी प्रतिहिंसा उसे डराती थी। वह भयानक था परन्तु मनुष्य था। और मनुष्य एकांत में डरता है। उसे हत्याएँ डरातीं। वह सोचता, वसुदेव को देवकी से इतना प्रेम था! उसने संतान का वध करवा दिया किन्तु स्त्री का नहीं! उसने सहर्ष बच्चों की हत्या करवा दी! पिता अपने हाथ से बालकों को उठा-उठाकर मारने के लिए देता गया! क्या था वह साहस!! घोर सीमा थी वह प्रेम और बलिदान की! वह”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“संमर्दन और भद्र को जब कंस ने मारा, तब देवकी सस्वर गाने लगी थी। उसको सुनकर कंस के रोंगटे खड़े हो गए थे। वह डरने लगा था। वसुदेव और देवकी का मौन उसे हराने लगा था।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“जब कंस ने ऋजु को मारा था तब देवकी ने वसुदेव के नेत्रों में देखा था,”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“दूसरे बालक सुषेण की हत्या के समय वसुदेव और देवकी, दोनों”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“पहले बालक कीर्तिमान की हत्या की थी, देवकी मूर्च्छित हो गई थी, वसुदेव थर्रा उठे थे।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“प्रहरी जाणुक आँखें फेर लेता।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“वह चाहते थे कि उनकी प्रतिहिंसा के केहरी को कंस के अत्याचार की ठोकरें बार-बार अपमानित किया करें और बाहर व्रज के वृष्णि और पुराने अंधक शीघ्र-से-शीघ्र कंस को उखाड़कर बाहर फेंक दें! आ”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा
“जब वसुदेव ने देवकी से विवाह किया और उसे स्वयं कंस रथ में पहुँचाने चला तब किसी चर ने कंस को सावधान कर दिया। वह कण्ठ में दबे, परन्तु पैने स्वर से बोला और आकाशवाणी-सा सुनाई दिया1-कंस! तूने अपनी अंतिम बहिन से स्नेह किया है, परन्तु वह वसुदेव वृष्णि के साथ षड्यंत्र कर रही है, कि तुझे सिंहासन से उतार सके और फिर गणराज्य को स्थापित कर दे। सावधान! देवकी और वसुदेव ने परस्पर सपथ ली है कि जब तक हम हैं तब तक, हमारे बाद हमारी संतान भी इस निरंकुशता से युद्ध करती रहेगी! बस, पाँसा वहीं से पलट गया था।”
रांगेय राघव, देवकी का बेटा

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