“व्रात्य कूर्चामुख एक अधिनायक था। वह एक काला और एक सफेद चमड़ा पहनता था। उसके वस्त्र गृहस्थ व्रात्यों की भाँति किनारेदार नीले कपड़े के नहीं होते थे। वह सिर पर उष्णीष और पाँवों में उपानह पहनकर आता, गंभीर रहता। उसके साथ निषादी और विदेह का वर्णसंकर पुत्र क्षुद्र तथा वैश्य पिता और शूद्रमाता का पुत्र करण-यह दोनों होते, जो उसकी सेवा किया करते। उसके साथ मागधी होती। कहते थे, वह मगध के उत्तरी भाग से यक्षी चूलकोका की साधना भी सीख आया था। वह वेद को नहीं मानता था और ब्राह्मणों को देखते हुए भी लिंगोपासना करता था। कहा जाता था कि उसने एक वन्य स्त्री को एक बार श्मशान में ले जाकर नग्न करके मदिरा पिलाई थी और फिर उस स्त्री ने श्मशान की राख बालों में भरकर नृत्य किया था। व्रात्य इंद्रोपासक ब्राह्मणों से त्याज्य था, क्योंकि वह चण्डालों के हाथ का भी खा लेता था।”
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देवकी का बेटा
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