द्वारका का सूर्यास्त Quotes
द्वारका का सूर्यास्त
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द्वारका का सूर्यास्त Quotes
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“हम तो निमित्त हैं। कर्मों का निर्माण तो भवितव्य कर चुका होता है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“अब से तुम देह नहीं, निर्भ्रांत आत्मा हो। आत्मा से कोई संवेदना या भाव उत्पन्न नहीं होता। देह के धर्म देह के साथ ही संलग्न रहने देना। वे धर्म तुम्हारी आत्मा को विचलित न करें, यह देखना तुम्हारा कर्तव्य है।...”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“वाणी का उच्चारण, मन का विचार एवं इंद्रिय का आचार—इन तीनों का एकत्व एवं इस एकत्व के अंत में वह अलिप्त भाव तुम्हें उस मार्ग पर ले जाएगा।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“जो कर्म करना है उसे निर्लिप्त भाव से करना, उद्धव! योगी को कोई भी कर्म लिप्त नहीं करता। आसक्ति ही कर्मों को दूषित करती है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“विकट परिस्थितियों के बीच भी उनके ओष्ठद्वय पर विलसित भुवनमोहन स्मित का कभी विलयन नहीं हुआ था। उद्धव ने अनुभव किया कि कृष्ण के चेहरे पर वह करुणापूर्ण स्मित अब तक यथावत् है। लेकिन उस स्मित के साथ कुछ अपरिचित भी संयोजित हो गया है। उस परिचित तत्त्व को समझने के लिए उद्धव एक क्षण कृष्ण की ओर अपलक नेत्रों से देखते रहे। “उद्धव!” कृष्ण बोले, “तुम्हें जो अपरिचित लग रहा है, वह विराट् तत्त्व की ही एक छाया है। अब तुम्हें इस विराट् तत्त्व को समझने का प्रयास करना है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“सामर्थ्य अहंकार की गंगोत्तरी है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“भवितव्य की निर्मिति हम महाकाल को ही सौंप दें। सृष्टि के नियमों का हम केवल अनुशीलन ही करें।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“गहरी साँस ली। हवा में अचानक सुगंध कहाँ से आ गई? कृष्ण ने अनुभव किया कि हवा मात्र शीतल ही नहीं थी, सुगंधित भी थी। थोड़े”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“गहकते मयूर, कदंब वृक्ष एवं कालिंदी तट पर से बार-बार प्रवाह में सरकते विशालकाय कछुए”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“शरीर की आत्मा के समान पुत्र भी जैसे एक व्यर्थ एवं स्थूल वस्तु के लिए पराए बन गए थे। आजीवन उन्हें पुत्रवत् प्रेम करनेवाले ज्येष्ठ भ्राता बलराम भी इसी तुच्छ वस्तु के लिए जैसे उन्हें उपेक्षित कर रहे थे।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“मानव जीवन अत्यंत संकुल है, देवि!” कृष्ण ने उत्तर दिया, “इस जीवन में प्रत्येक संबंध की एक सीमा होती है।” “अर्थात्?” रुक्मिणी ने पूछा। “प्रत्येक अर्थ भी जानने जैसा नहीं होता। जब जो भी प्रकट हो, उसका सहजभाव से स्वीकार ही किसी भी समस्या का निराकरण है।” कृष्ण ने मुसकराकर कहा।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“हे महाराज धृतराष्ट्र! कुल के लिए व्यक्ति का त्याग, जनपद के लिए कुल का त्याग, राष्ट्र के लिए जनपद का त्याग एवं आत्मा की पवित्रता बनाए रखने की आवश्यकता पड़ने पर समग्र पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिए।’ कृष्ण”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“यदि स्वयं ज्येष्ठ पिताश्री मद्यपान कर रहे हों तो...” “तो हमारे लिए अब यह घोषणा शिथिल हो जाएगी।” सांब ने सारण के कान के पास झुककर धीरे से कहा, “अब अनुज्ञा की आवश्यकता नहीं। जिस प्रकार ज्येष्ठ पिताश्री इस घोषणा को स्वीकार कर रहे हैं उसी प्रकार हम भी...”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“जिस स्थल पर सांब के पेट से जनमे हुए मूसल को चूर्ण बनाकर समुद्र में फेंका गया था उस स्थल का जल मानो विषादपूर्ण संगीत को फैला रहा हो, किंतु किनारे से टकराकर शांत हो गया। इस क्षण यादवकुमारों को सर्वविनाश का महाशाप तुच्छ लग रहा था और मद्य-निषेध की घोषणा अधिक कष्टप्रद लग रही थी।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“युधिष्ठिर के राज्यारोहण के बाद का दीर्घ समय का अंतराल शांति का युग था और इस शांति के कारण ही द्वारका के यादव प्रायः निष्क्रिय बन चुके थे। निष्क्रियता के इस काल में यादवों के लिए समय व्यतीत करने का सरल और उपलब्ध साधन मद्यपान था। मद्यपान से जो उत्तेजना उत्पन्न होती उसका शमन यादव मृगया द्वारा करते या नृत्य इत्यादि स्थूल मनोरंजन में उनका समय व्यतीत होता।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“प्रायश्चित्त है और इस प्रायश्चित्त से बचने की कोई भी मनोवृत्ति यादवों को अधिक अवनति की ओर ले जाएगी, इस परम सत्य का हम सबको लक्ष्य रखना है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“अर्जुन, जिनका शोक करना उचित नहीं है उनका शोक तुम क्यों करते हो? जो असत्य है वह कभी सत्य नहीं होता और जो सत्य है उसका कभी नाश नहीं होता।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“महायुद्ध के पहले दिन अर्जुन के मन में प्रकट होनेवाला विषाद श्रीकृष्ण के संस्पर्श से योग बन गया था। किंतु यदि स्वयं श्रीकृष्ण के मन में विषाद प्रकट हो तो उसे कौन योग बना सकता है?” “देवर्षि! महायुद्ध के आरंभिक क्षण में अर्जुन के विषाद को योग में परिवर्तित करनेवाला कृष्ण का मन भी आखिर तो मानव मन ही है—और मानव जीवन की संकुलता तो अपार है। आप जैसे तपोनिष्ठ एवं ब्रह्म के ज्ञाता के सिवाय इस विषाद को कौन स्पर्श कर सकता है?”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“कृष्ण के मन में स्थित यह मनोव्यापार शब्द के रूप में उनके होंठों से प्रकट हुआ, उससे पूर्व उन्होंने कितने वर्षों तक अंतर्व्यथा सहन की होगी!”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“जिन परिजनों के चरणों में मैंने किसी भी प्रकार के स्वार्थ के बिना यह सब धर दिया, वे परिजन ही मुझसे असंतुष्ट क्यों रहते हैं, यह समस्या मैं समझ नहीं सकता, देवर्षि! आसक्ति-रहित कर्म का जो उपदेश मैंने दिया है उसी का आजीवन आचरण भी किया है और फिर भी मेरे आप्तजन मुझ पर आशंकित हों और मेरे कर्मों से असंतुष्ट हों, ऐसा क्यों होता है, यह मैं समझ नहीं पाता!” कृष्ण ने एक गहरी साँस लेकर कहा।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“कृष्ण शायद अपनी व्याप्ति को आत्मा में केंद्रित कर रहे थे। व्याप्ति के क्षण समाप्त होने की तैयारी थी और आत्मा में यह सब केंद्रित करके महाकाल के चरणों में स्वस्थता से बैठ जाने की पूर्व तैयारी हो रही थी।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“कृष्ण जानते थे कि देह की एक अवधि होती है और प्रत्येक संबंध का एक अनिवार्य अंत भी होता है। जिस अंत का सहज भाव से स्वीकार हो सके, वह दुःखद नहीं होता; इसके विपरीत इस सहज स्वीकार के साथ वह स्मरणीय बन जाता है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“यादवों को उनके सामर्थ्य का घमंड उस दिशा में खींच न ले जाए तो ही आश्चर्य होगा! आपका यह शाप एक तरह से अनुग्रह ही कहा जा सकता है। मैं इसे स्वीकार करता हूँ, माता।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“कृष्ण ने अपना समग्र कृष्णत्व भी दाँव पर लगाकर कर्ण से कहा था, ‘कर्ण, तुम सूतपुत्र नहीं हो, तुम तो कुंतीपुत्र हो, पाँच पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हो। यदि पांडव पक्ष में रहोगे तो पाँच पांडवों की साझा पत्नी द्रौपदी ज्येष्ठ भ्राता के रूप में तुम्हारी भी पत्नी बनेगी।’ तब कितनी प्रचंड यातना के साथ कृष्ण ने इन शब्दों का उच्चारण किया था।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“स्यमंतक से प्रतिदिन आठ स्वर्णमुद्राएँ प्राप्त करनेवाले अक्रूर ने अपने प्रांगण में अहर्निश महायज्ञ आरंभ किया था। इन महायज्ञों की ज्वाला में कृष्ण ने अक्रूर का यह चौर्य कर्म पकड़ लिया था। अक्रूर में कृष्ण के समक्ष सत्य को अस्वीकार करने की अब शक्ति नहीं थी। इस अतिवृद्ध वरिष्ठ यादव ने कृष्ण के समक्ष स्यमंतक मणि प्राप्त करने की कथा को स्वीकार कर लिया था। कृष्ण ने स्यमंतक तो प्राप्त कर ली, परंतु यदि इस चौर्य कर्म के लिए अक्रूर को यादव सभा में उपस्थित किया जाए तो इस वरिष्ठ यादव के आयुष्य के अंतिम दिन लज्जास्पद एवं दुःसह बन जाएँगे। कृष्ण ऐसा कैसे होने देते?”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“यह आप क्या कह रहे हैं, बड़े भैया!’ कृष्ण चकित रह गए। दिशाएँ जैसे एकाकार हो गईं। बहती वायु एक क्षण स्थिर हो गई। ‘आप...आप...मुझ पर संदेह कर रहे हैं, बड़े भैया?’ ‘संयोग हों तो ऐसा ही होता है, भाई।’ बलराम कठोरता से बोले, ‘तुमने सत्राजित् से मणि की माँग की थी और अब प्रसेनजित् मृत्यु को प्राप्त हुआ है तब मणि मिल नहीं रही। इन दो घटनाओं के कारण समस्त यादव कुल असमंजस में पड़ गया है।’ ‘मैं सच कहता हूँ, बड़े भैया, स्यमंतक का अदृश्य होना और प्रसेनजित् की मृत्यु होना—ये दोनों घटनाएँ मेरे लिए भी एक विकट समस्या हैं।’ लेकिन बलराम कृष्ण की बात को स्वीकार नहीं कर सकते थे।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“सत्राजित् मेरे पिता थे और यादवों की आशंका अनुसार यदि स्यमंतक मणि आपके पास है तो उनकी संतान होने के नाते उस मणि पर मेरा अधिकार तो है ही। मैं वह मणि आपके ही चरणों में धर दूँगी। किंतु मुझे सत्य जानना है, प्रभु!”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“बिना परिश्रम के प्राप्त होनेवाली संपत्ति व्यक्ति की नहीं, समष्टि की होनी चाहिए। व्यक्ति को तो अपने पुरुषार्थ से जो प्राप्त हो उसी का उपयोग करना चाहिए, नहीं तो जो कुछ भी हो, वह सब बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के लिए उपयोगी हो, उसी को कल्याण योग कहते हैं।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“विकद्रु नामक ऐसे ही एक वरिष्ठ यादव ने जब कृष्ण से कहा था, ‘हे श्रीकृष्ण! इस समय यादव वंश का नाश समीप है। तुम्हारा तेज एवं प्रतिभा अब हम अधिक समय तक नहीं झेल सकते। तुम अकेले ही जरासंध के साथ युद्ध के लिए समर्थ हो, जबकि मथुरा के साधन तो बहुत कम हो चुके हैं। इसलिए यह निर्बल नगरी एक दिन के लिए भी शत्रु का घेरा सहन करने की स्थिति में नहीं है। दुर्ग के तोरण एवं गुंबद टूट चुके हैं और शस्त्रास्त्र भी समाप्त हो गए हैं।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
“निर्भयता ही तो दुर्भाग्य में से प्राप्त सौभाग्य है।”
― द्वारका का सूर्यास्त
― द्वारका का सूर्यास्त
