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“यह आप क्या कह रहे हैं, बड़े भैया!’ कृष्ण चकित रह गए। दिशाएँ जैसे एकाकार हो गईं। बहती वायु एक क्षण स्थिर हो गई। ‘आप...आप...मुझ पर संदेह कर रहे हैं, बड़े भैया?’ ‘संयोग हों तो ऐसा ही होता है, भाई।’ बलराम कठोरता से बोले, ‘तुमने सत्राजित् से मणि की माँग की थी और अब प्रसेनजित् मृत्यु को प्राप्त हुआ है तब मणि मिल नहीं रही। इन दो घटनाओं के कारण समस्त यादव कुल असमंजस में पड़ गया है।’ ‘मैं सच कहता हूँ, बड़े भैया, स्यमंतक का अदृश्य होना और प्रसेनजित् की मृत्यु होना—ये दोनों घटनाएँ मेरे लिए भी एक विकट समस्या हैं।’ लेकिन बलराम कृष्ण की बात को स्वीकार नहीं कर सकते थे।”

डॉ. दिनकर जोशी, द्वारका का सूर्यास्त
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