चुनी हुई कविताएँ Quotes

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चुनी हुई कविताएँ चुनी हुई कविताएँ by Atal Bihari Vajpayee
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“दो दिन मिले उधार में, घाटे के व्यापार में, क्षण-क्षण का हिसाब जोड़ूँ या पूँजी शेष लुटाऊँ मैं? राह कौन-सी जाऊँ मैं?”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“दाँव पर सबकुछ लगा है, रुक नहीं सकते। टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“आदमी की पहचान, उसके धन या आसन से नहीं होती, उसके मन से होती है। मन की फकीरी पर कुबेर की संपदा भी रोती है।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है, प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है, तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महँगा सौदा, रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है। जो हम पर गुजरी बच्चों के संग न होने देंगे। जंग न होने देंगे।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“टू टे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर, पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर, झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात, प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ। गीत नया गाता हूँ। टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी? अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी। हार नही मानूँगा, रार नई ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते, न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“जन्म-मरण का अविरत फेरा, जीवन बंजारों का डेरा, आज यहाँ, कल कहाँ कूच है, कौन जानता, किधर सवेरा, अँधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें। अपने ही मन से कुछ बोलें!”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“पाँच दशकों से अधिक राजनीतिक यात्रा के बाद भी देश की बँटी हुई राजनीति को जोड़ने की आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है। जो केवल सत्ता के लिए नहीं अपितु विघटनकारी शक्तियों से लोहा लेकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के काम में आगे बढ़ सकें, उनके लिए ऐसे मंच की सार्थकता सदैव रहेगी।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुवन, पर-हित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ
“हरी-हरी दूब पर ओस की बूँदें अभी थीं, अब नहीं हैं। ऐसी खुशियाँ जो हमेशा हमारा साथ दें कभी नहीं थीं, कभी नहीं हैं। क्वार की कोख से फूटा बाल सूर्य, जब पूरब की गोद में पाँव फैलाने लगा, तो मेरी बगीची का पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ या उसके ताप से भाप बनी, ओस की बूँदों को ढूँढ़ूँ? सूर्य एक सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता मगर ओस भी तो एक सच्चाई है यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है क्यों न मैं क्षण-क्षण को जीऊँ? कण-कण में बिखरे सौंदर्य को पीऊँ? सूर्य तो फिर भी उगेगा, धूप तो फिर भी खिलेगी, लेकिन मेरी बगीची की हरी-हरी दूब पर, ओस की बूँद हर मौसम में नहीं मिलेगी।”
Atal Bihari Vajpayee, चुनी हुई कविताएँ