इंद्रजाल Quotes
इंद्रजाल
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जयशंकर प्रसाद176 ratings, 4.04 average rating, 2 reviews
इंद्रजाल Quotes
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“केला उसने छीलकर अपनी अंजलि में रख उसे मन्दिर की ओर नैवेद्य लगाने के लिए बढ़ाकर आँखें बन्द कर लीं। भगवान् ने उस अछूत का नैवेद्य ग्रहण किया या नहीं, कौन जाने; किन्तु बुढ़िया ने उसे प्रसाद समझकर ही ग्रहण किया।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“स्थविर ने उसके सामने आकर कहा–‘सुजाता, तुमने प्रायश्चित किया?’ ‘किसके पाप का प्रायश्चित! तुम्हारे या अपने?’ तीव्र स्वर में सुजाता ने कहा! ‘अपने और आर्यमित्र के पापों का, सुजाता! तुमने अविश्वासी हृदय से धर्म-द्रोह किया है!’ ‘धर्मद्रोह? आश्चर्य!!’ ‘तुम्हारा शरीर देवता को समर्पित था, सुजाता। तुमने…’ बीच ही में उसे रोककर तीव्र स्वर में सुजाता ने कहा–‘चुप रहो, असत्यवादी। वर्जयानी नर-पिशाच…’ एक क्षण में इस भीषण मनुष्य की कृत्रिम शान्ति विलीन हो गयी। उसने दाँत किटकिटाकर कहा–‘मृत्यु-दण्ड!’ सुजाता ने उसकी ओर देखते हुए कहा–‘कठोर से भी कठोर मृत्यु-दण्ड मेरे लिए कोमल है। मेरे लिए इस स्नेहमयी धरणी पर बचा ही क्या है? स्थविर! तुम्हारा धर्मशासन घरों को चूर-चूर करके विहारों की सृष्टि करता है–कुचक्र में जीवन को फँसाता है। पवित्र गार्हस्थ बन्धनों को तोड़कर तुम लोग भी अपनी वासना-तृप्ति के अनुकूल ही तो एक नया घर बनाते हो, जिसका नाम बदल देते हो। तुम्हारी तृष्णा तो साधारण सरल गृहस्थों से भी तीव्र है, क्षुद्र है और निम्न कोटि की हैं!’ ‘किन्तु सुजाता, तुमको मरना होगा।’ ‘तो मरूंगी स्थविर! किन्तु तुम्हारा यह काल्पनिक आडम्बरपूर्ण धर्म भी मरेगा। मनुष्यता का नाश करके कोई धर्म खड़ा नहीं रह सकता।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“महोदधि के तट पर बैठकर, सिकता में हम लोग अपना नाम साथ-ही-साथ लिखते थे। चिर रोदनकारी निष्ठुर समुद्र अपनी लहरों की उँगली से उसे मिटा देता था। मिट जाने दो हृदय की सिकता से प्रेम का नाम! आर्यमित्र, इस रजनी के अन्धकार में उसे विलीन हो जाने दो!”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“वह अमूल्य उपहार–जो स्त्रियाँ, कुलवधुएँ अपने पति के चरणों में समर्पण करती हैं–कहाँ से लाऊँगी? वह वरमाला जिसमें दूर्वा-सदृश कौमार्य हरा-भरा रहता हो, जिसमें मधूक-कुसुम-सा हृदय-रस भरा हो, कैसे कहाँ से तुम्हें पहना सकूँगी?”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“मनुष्य अधिक चतुर बनकर अपने को अभागा मान लेता है, और भगवान् की दया से वंचित हो जाता है।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“बेला पलाश के जंगल में अपने बिछुड़े हुए प्रियतम के उद्देश्य से दो-चार विरह-वेदना की तानों की प्रतिध्वनि छोड़ आने का काल्पनिक सुख नहीं छोड़ सकती थी।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“दूसरा काम करते हुए अन्यमनस्कता की आड़ में मनोयोग से और कनखियों से ठाकुर उसे देख लिया करते थे।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“बालक पास से, युवक ठीक-ठिकाने से और बूढे़ अपनी मर्यादा, आदर्शवादिता की रक्षा करते हुए दूर से”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“अन्तर में भरे हुए निष्फल प्रेम से युवती का सौन्दर्य निखर आया था। उसके कटाक्ष अलस, गति मदिर और वाणी झंकार से भर गयी थी।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“गाँववालों की छुरी-हँसिया और काठ-कबाड़ के कितने ही काम बनाकर वे लोग पैसे लेते थे। कुछ अन्न यों भी मिल जाता। चिड़ियाँ पकड़कर, पक्षियों का तेल बनाकर, जड़ी-बूटी की दवा तथा उत्तेजक औषधियों और मदिरा का व्यापार करके, कंजरों ने गाँव तथा गढ़ के लोगों से सद्भाव भी बना लिया था।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“गोली युवक होने पर भी सुकुमार और अपने प्रेम की माधुरी में विह्वल, लजीला और निरीह था।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“भूरे सचमुच भूरा भेड़िया था। गोली अधरों से बाँसुरी लगाये अर्द्ध-निमीलित आँखों के अन्तराल से, बेला के मुख को देखता हुआ जब हृदय की फूँक से बाँस के टुकड़े को अनुप्राणित कर देता, तब विकट घृणा से ताड़ित होकर भूरे की भयानक थाप ढोल पर जाती। क्षण-भर के लिए जैसे दोनों चौंक उठते।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“गोली जब बाँसुरी बजाने लगता, तब बेला के साहित्यहीन गीत जैसे प्रेम के माधुर्य की व्याख्या करने लगते।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
“गोली के स्नेह की मदिरा से उसकी कजरारी आँखें लाली से भरी रहतीं। वह चलती तो थिरकती हुई, बातें करती तो हँसती हुई। एक मिठास उसके चारों ओर बिखरी रहती।”
― इंद्रजाल
― इंद्रजाल
