(?)
Quotes are added by the Goodreads community and are not verified by Goodreads. (Learn more)
जयशंकर प्रसाद

“स्थविर ने उसके सामने आकर कहा–‘सुजाता, तुमने प्रायश्चित किया?’ ‘किसके पाप का प्रायश्चित! तुम्हारे या अपने?’ तीव्र स्वर में सुजाता ने कहा! ‘अपने और आर्यमित्र के पापों का, सुजाता! तुमने अविश्वासी हृदय से धर्म-द्रोह किया है!’ ‘धर्मद्रोह? आश्चर्य!!’ ‘तुम्हारा शरीर देवता को समर्पित था, सुजाता। तुमने…’ बीच ही में उसे रोककर तीव्र स्वर में सुजाता ने कहा–‘चुप रहो, असत्यवादी। वर्जयानी नर-पिशाच…’ एक क्षण में इस भीषण मनुष्य की कृत्रिम शान्ति विलीन हो गयी। उसने दाँत किटकिटाकर कहा–‘मृत्यु-दण्ड!’ सुजाता ने उसकी ओर देखते हुए कहा–‘कठोर से भी कठोर मृत्यु-दण्ड मेरे लिए कोमल है। मेरे लिए इस स्नेहमयी धरणी पर बचा ही क्या है? स्थविर! तुम्हारा धर्मशासन घरों को चूर-चूर करके विहारों की सृष्टि करता है–कुचक्र में जीवन को फँसाता है। पवित्र गार्हस्थ बन्धनों को तोड़कर तुम लोग भी अपनी वासना-तृप्ति के अनुकूल ही तो एक नया घर बनाते हो, जिसका नाम बदल देते हो। तुम्हारी तृष्णा तो साधारण सरल गृहस्थों से भी तीव्र है, क्षुद्र है और निम्न कोटि की हैं!’ ‘किन्तु सुजाता, तुमको मरना होगा।’ ‘तो मरूंगी स्थविर! किन्तु तुम्हारा यह काल्पनिक आडम्बरपूर्ण धर्म भी मरेगा। मनुष्यता का नाश करके कोई धर्म खड़ा नहीं रह सकता।”

जयशंकर प्रसाद, इंद्रजाल
Read more quotes from जयशंकर प्रसाद


Share this quote:
Share on Twitter

Friends Who Liked This Quote

To see what your friends thought of this quote, please sign up!

0 likes
All Members Who Liked This Quote

None yet!


This Quote Is From

इंद्रजाल इंद्रजाल by जयशंकर प्रसाद
176 ratings, average rating, 2 reviews

Browse By Tag