लखिमा की आँखें Quotes
लखिमा की आँखें
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लखिमा की आँखें Quotes
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“नदी में तो हम तुर्क को भी डूबने को नहीं छोड़ते। गंगा मैया की आन है। जल में पहले मांझी मरेगा, तब ही यात्री। मांझी अपना धरम नहीं छोड़ सकता।" "धरम से धरती टिकी है।" "कितने दिन का तुर्क है?" "यह धर्म सनातन है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“जो पराक्रमी नहीं हैं, वे प्रेम भी क्या करेंगे?" पराजित जीवन को धर्म की रूढ़ियां ही तो सम्बल के रूप में चाहिए। वही तो कवि ठाकुर भी कर रहे हैं। वह रसवती धारा बहाना क्या अब उनके बस में है...”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“कैसा लगता है सब!" महारानी कहती हैं, "सच, विश्वास नहीं होता कि यह वही संसार है। जिसे उस दिन देखा था। वह मानो एक स्वप्न-लोक की बात थी।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“उन आँखों में गर्व है, आनन्द है, तृप्ति है, विभोरता है, वासना है, स्खलन का सुख है, माधुर्य है, अमर प्रतीक्षा की दुरूहता है, प्राप्ति को असीम बनाकर दूर से देख लेने की क्षमता है। वे आँखें देखती हैं, वे आँखें नहीं देखतीं। इनमें लज्जा भी है, समर्पण भी है, एक गोपनीयता है, एक रहस्य है, और फिर मुखरता भी है। अरूप की मूर्त्तिमती सत्ता उनमें आराधना का केन्द्र बन गई है, वैसे वे एक महाशून्य-सी हैं जिसकी समता के लिए महापण्डित और महायोगी व्याकुल हो रहे हैं। इस क्षण जैसे उस स्थान से क्षुद्रता, अहं और नीचता का तिरोधान हो गया है। वे आँखें हैं कि युगांतरों में गूंजने वाली मुरारी की बेसुध कर देने वाली बांसुरी की तान का मोहक सम्मोहन बरौनियों की छाया बनकर आत्मलय की पुतलियों में साकार जीवन की धारा को धीरे-धीरे स्पंदित कर रहा है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“वही क्षत्रिय है। एक ओर हाथ में खड्ग लेकर उससे टपकती लहू की बूंदें देखकर मुस्कराना और दूसरी ओर पुष्पमाल लेकर उसकी गंध का आनन्द लेते हुए गीतों में डूबकर जीवन के दोनों पक्षों का आनंद लेना केवल उसी क्षत्रिय का काम है, जो जीवन को देता है औरों के लिए, और जो सुख लेता है लोक को सौंदर्य देने के लिए।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“अनादि काल से यह सृष्टि शिव और पार्वती और राधा-माधव की क्रीड़ा से ही जीवन और शक्ति ग्रहण करती रही है। नारी का रूप ही समस्त संप्रदायों में अपनी साधनाओं का उद्गम रहा है। महाशून्य की कल्पना का लौकिक आनन्द इसीलिए स्त्री-पुरुष-मिलन के सुख की चरमासक्ति में गिना गया है। महारानी! इसी आनन्द की अनुभूति में महाकवि कालिदास ने नारी को पार्वती के रूप में देखा था और उस उदात्त भूमि तक लाने के लिए जिसमें वासना अपने नग्न और पूर्ण रूप में होते हुए भी कल्मष से परे होती है; नारी की क्षुद्रता को हटाने के लिए महाकवि ने उससे तप करवाया था, जिसके कि फलस्वरूप वह अन्ततोगत्वा परमशिव पर लौकिक सर्जन के देवता काम के माध्यम से उसके अनंग बन जाने पर भी प्रेम के बल पर विजय प्राप्त कर सकी। जो इस लोक की व्याप्ति में परमात्मा के प्रसादों में काया को भूल जाता है और आंगिक सुख से अलग करके आत्मिक सुख को देखता है, वह वास्तव में सत्य को नहीं देखता। वासना को केवल अंग-चेष्टाओं में ही समाप्त करना तो वज्रयानियों और वाममार्गियों का काम है। किन्तु वामा से परे तो योगी भी नहीं, क्योंकि वे वामा को कुण्डलिनी के रूप में देखते हैं। वासना एक सत्य है और वह एक लीला है, जिसकी वेदना में भी मिठास है, यदि वह प्रेम की विभोरता में तल्लीन है। यही तो राधा-माधव शिव-शिवा की भूमियों का प्रसाद है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“कामिनी है न महाराज! उसमें जो मान होता है न देव! उसे पुरुष समझेगा? उसे तो स्त्री ही वृद्धा हो जाने पर नहीं समझ पाती! कामी उस नारी के मान का दास बन जाता है। योगी उसे देखकर भाग जाता है। आनन्द भी लेती है, किन्तु पुरुष को स्वार्थी कहती है और मातृत्व में तो उसने बड़ा ही भारी अहसान मानो पुरुष पर लाद दिया हो!”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“पुरुष की कल्पना की नारी, इस पृथ्वी पर घूमती ही नहीं। पुरुष अपनी कल्पना में केवल अच्छा चित्र बनाता है, किन्तु नारी के ऐहिक रूप में रहने वाली लालसा, तृष्णा, वासना और उसके अहं को छोड़ देता है, इसीलिए वह भूल जाता है। स्त्री की खुशामद करने से ही निस्तार होता है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“राजा के पास जाने की आवश्यकता ही क्या है? अरे जो है उसी में गरीबी में दिन काट लेंगे।" गरीबी। कवि सोचता है। घर में दास हैं, दासियां हैं। फिर भी गरीबी! खेत हैं, सब कुछ है। कैसी है यह स्त्री! वह फिर कहती है, "सोचती थी आभूषणों से लदी रहूंगी, पर नहीं हैं तो मैं क्या मांगती हूं। ऐसे ही अच्छे हैं हम! हैं न?" कवि का मन विक्षुब्ध हो रहा है। स्त्री फिर कहती है, "पहले तुम संस्कृत के ग्रंथ लिखते थे, सम्मान था। अब क्या देशी भाषा के गीत लिखने लगे हो। जिनके लिए लिखते हो वे क्या कुछ समझते हैं?”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“जब हीरक-जटित अंगूठी उंगली पर चढ़ जाती है जब लोक यही कहता है-हीरे वाली अंगूठी, देह वाली नहीं।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“हे माधव! जहां प्रेम-रस होता है वहीं प्रेम-कलह भी होता है, परन्तु गुणवान व्यक्ति एक बार प्रीति-भंग हो जाने पर पुनः प्रीति करते हैं। हमने तो सर्वत्र ही ऐसी रीति होती सुनी है कि हार के बार-बार टूट जाने पर भी उसे फिर गूंथ लिया जाता है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“मनोरंजन एक महान प्रेषणीयता रखता है। जो काम सहज हो सकते हैं वे तर्क से नहीं हो सकते, क्योंकि तर्क की नींव में सदैव अहं होता है और वह कभी सत्य को नहीं पकड़ता, वह तो एक कुठार की भांति होता है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“एक सुन्दर हिरण की आंखों पर मोहित होकर बाण धनुष पर चढ़ाए उसके पीछे भागा था। किन्तु वन के बीहड़ में उसने देखा कि वह जो दूर से हिरण लग रहा था। वास्तव में एक इच्छारूप सिंहनी थी जिसके मुख पर अब एक विचित्र व्यंग्य-भरी मुस्कान थी।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“नारी का कौन-सा रूप है। राजा सोचता है। अच्छा होता मैं एक किसान होता। तब यही लखिमा मेरे हल जोतकर खेत में खड़े रहते समय सिर पर मट्ठा और रोटी लेकर आती। उस समय किसान अपनी भूख मिटाता और कार्यलीन रहता। स्त्री अपने सामाजिक कार्य करती। स्त्री जब आनन्द में लीन रहती है तब उसकी क्षुद्र वासनाएं अधिक भड़क उठती हैं और कठोर जीवन से वह बचने का प्रयत्न करती है। उस समय उसके मन में हलाहल जन्म लेता है। उसे लगता है वह सब-कुछ खो रही है। पुरुष की वासना उतनी जघन्य नहीं होती जितनी स्त्री की। स्त्री अपनी वासना पर लज्जा का छद्म चढ़ाए रखती है और इसलिए वह बहुत ही भयानक होती है, क्योंकि पुरुष कैसा भी छलिया हो, उसकी वासना सरल होती है, नारी की वासना की भांति गूढ़ और रहस्यमयी नहीं होती।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“लगता है जैसे उसके और कला के बीच में नारी एक व्यवधान बनकर खड़ी हो गई है। राजा की चेतना में विष-सा भर गया है, जो उसे झुलसा रहा है। सामने चन्द्रमा उग रहा है, किन्तु उसमें कोई जादू नहीं है। और स्त्री खड़ी है अवरुद्ध-सी, विधाता को शाप देती हुई-सी।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“लोकहित में जीवन-दान देने वाले प्राणी की वैयक्तिकता कितनी सीमित हो जाती है यह तो जानती हो न?”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“वैभव की भी अपनी मर्यादाएं हैं। वह मर्यादाएं ही ऐसे बंधन हैं जो उस वैभव के द्वारा प्राप्त अधिकारों के फल हैं, वे अधिकार औरों के अधिकारों से कहीं अधिक हैं। कोई चाहे कि इधर वैभव के सुख भी ले लूं उधर संसार के अन्य आनन्द भी लूट लूं, यह कैसे सम्भव हैं। यह कहती है कि यह देह नहीं है, किन्तु यदि पुरुष नारी को उसके देहत्व का आभास न दिलाए, तो क्या वह सचमुच पुरुष के आत्मिक दुलार के बल पर जीवित रह सकती है? यदि पुरुष केवल आत्मा का सम्बम्ध रखे तो वह फिर कहती है कि तुम मुझसे दूर-दूर रहते हो। पता नहीं विधाता ने स्त्री को किस क्षण में बनाया था।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“रानी कहती है, "मैं केवल देह ही तो नहीं हूं। आत्मा भी तो हूं। मेरी भी तो कुछ लालसाएं हैं। इस वैभव में न होकर एक दरिद्र की स्त्री होती तो कम से कम मैं स्वतन्त्र तो होती।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“एक अपूर्व सुन्दरी चली आ रही है। उसे देखकर लगता है जैसे देह रूपी कनकलता के सहारे निष्कलंक चन्द्रमा का उदय हुआ हो। उसके कमल के समान दोनों नेत्र तो अंजन-रंजित हैं और भौंहें बड़ी ही कुटिल तथा भावयुक्त हैं। उनकी चंचलता को देखकर लगता है जैसे विधाता ने चक्रवाक मिथुन को केवल अंजनगुन के पाश में बांध रखा हो। उसके उत्तुंग कुचों को छूती हुई गजमुक्ताओं की माला गले में पड़ी है। ऐसा लगता है जैसे कामदेव कण्ठ रूपी शंख में भरकर गंगा की निर्मल धारा को सुवर्ण के शिवलिंगों पर डाल रहा है।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“क्यों नहीं यह उठ पड़ते? उठेंगे। आत्मा का बल तो नहीं खोया है न? वह बल कहां है? वह अंतरात्मा में है, रूप और प्रेम में है। हममें शक्ति नहीं है, किन्तु इस शक्ति के स्वप्न के लिए जीवित रहते हैं, हम असंगठित हैं, परस्पर लड़ते हैं, किन्तु हम सदैव एकता और प्रेम के स्वप्न का दीपक हृदय में संजोए रहते हैं...वह सब एक अयथार्थ है, यथार्थ है मनुष्य के ही सुनिश्चित उज्ज्वल भविष्य की कामना में जीवित रहना।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“वे इन्हें खाकर समाप्त नहीं कर सकते, इनकी जड़ को नहीं काट सकते क्योंकि इनका धरती से संबंध है, और हाय, कैसी दीनता है कि यह कटते रहते हैं?”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“जितनी ही वर्तमान की परिस्थिति दुख देती है, पारस्परिक संबंधों में जीविका के लिए संघर्ष और वैमनस्य जन्म लेता है, जितने ही समाज के, धर्म के बंधन कचोटते हैं, उतनी शक्ति से आबालवृद्ध, धनी-दरिद्र, ऊंच-नीच में एक नयी चेतना जाग रही है,”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“बाह्य जीवन अवरुद्ध होता जाता था, बंधन घोंटते थे, उतने ही आनन्द और विलास की भावना विद्रोह करती थी क्योंकि उसी में उसे संतोष मिलता था।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“रंग उजड़ गए। ज्येष्ठ ने तो सब कुछ छीन लिया।”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“चैत आ गया। भ्रमर फूलों पर गुंजार करते हुए मधुपान कर रहे हैं। और जाने दो। किन्तु वैशाख तो भूने दे रहा है!”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“फाल्गुन आया! होली आई, रंग-अबीरों की मस्ती झकोरे लेने लगी। कुसुम- सौरभ से मत्त कोकिलों ने पंचम स्वर छेड़ा”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“माघ में यह सघन पड़ता तुषार! और”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“पूस के छोटे दिन और ये लम्बी रातें!”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“कार्तिक भी बीत चला। प्रतीक्षा के पल विरस हो गए। दीपावली की छाया के सघन तिमिर ने ही तो दुखियारी अबलाओं को घेर लिया है! अगहन आया कि सोकर जागना और जागकर सोना, हतभागिनी के भाग्य में अब भी यही दो काम रह गए?”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें
“आश्विन भी तो आ पहुँचा। सरोवरों के तीरों पर चक्रवाक मिलकर कल्लोल करने लगे। परन्तु”
― लखिमा की आँखें
― लखिमा की आँखें