“उन आँखों में गर्व है, आनन्द है, तृप्ति है, विभोरता है, वासना है, स्खलन का सुख है, माधुर्य है, अमर प्रतीक्षा की दुरूहता है, प्राप्ति को असीम बनाकर दूर से देख लेने की क्षमता है। वे आँखें देखती हैं, वे आँखें नहीं देखतीं। इनमें लज्जा भी है, समर्पण भी है, एक गोपनीयता है, एक रहस्य है, और फिर मुखरता भी है। अरूप की मूर्त्तिमती सत्ता उनमें आराधना का केन्द्र बन गई है, वैसे वे एक महाशून्य-सी हैं जिसकी समता के लिए महापण्डित और महायोगी व्याकुल हो रहे हैं। इस क्षण जैसे उस स्थान से क्षुद्रता, अहं और नीचता का तिरोधान हो गया है। वे आँखें हैं कि युगांतरों में गूंजने वाली मुरारी की बेसुध कर देने वाली बांसुरी की तान का मोहक सम्मोहन बरौनियों की छाया बनकर आत्मलय की पुतलियों में साकार जीवन की धारा को धीरे-धीरे स्पंदित कर रहा है।”
―
लखिमा की आँखें
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