Bhartiya Darshan-I Quotes

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Bhartiya Darshan-I (Hindi Edition) Bhartiya Darshan-I by Sarvepalli Radhakrishnan
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“यज्ञ का तात्पर्य भोग नहीं, त्याग है। अपनी प्रत्येक क्रिया, प्रत्येक मनोभाव और प्रत्येक विचार ईश्वर को अर्पित करो। तुम्हारा जीवन यज्ञमय हो।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“जीवन स्वयं एक यज्ञ है। “मनुष्य यज्ञस्वरूप है, उसके जीवन के पहले चौबीस वर्ष उसका प्रातःकालीन उदकदान हैं… भूखे-प्यासे रहने एवं सुखों से वर्जित रहने में ही उसका उत्सर्ग और संस्कार है।… उसके खाने-पीने और आनन्द मनाने में उसका पवित्र उत्सव होता है और हंसी में, भोज में और खुशियां मनाने में वह स्तुति के मन्त्र गाता है। आत्मनियन्त्रण, उदारता, ऋजुता, विनय, अहिंसा20 और वाणी में सत्य, ये उसके दान हैं, और यज्ञ के अन्त में पवित्रता देने वाला जो अवभृथ (यज्ञान्तस्नान) है, वह मृत्यु है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“आत्मविजय से उत्पन्न होने वाले हर्षातिरेक से ही जीवन में अभिरुचि उत्पन्न होती है। संसार केवल आध्यात्मिक अवसरों की एक परम्परा-मात्र है। जीवन आध्यात्मिक पूर्णता की प्राप्ति के लिए यात्रा करते हुए मार्ग में एक पड़ाव की भांति है–अनन्त की ओर प्रस्थान करने की दिशा में एक कदम है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“उपनिषदें वेदों के अन्तिम भाग हैं, और इसलिए इन्हें ‘वेद-अन्त’ की संज्ञा दी”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“ब्राह्य पवित्रता के साथ-साथ आभ्यन्तर पवित्रता पर भी पूरा बल दिया गया था। सच्चाई, देवभक्ति माता-पिता का आदर, पशुजगत् के प्रति दयालुता का भाव, मनुष्यजाति के प्रति प्रेम, तथा चोरी, हिंसा और व्यभिचार से दूर रहना आदि धार्मिक जीवन के अंग हैं”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“तैत्तिरीय आरण्यक में ही नारायण और विष्णु का एक साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“समाधि की अवस्थाओं में देवता मनुष्यों के अन्दर प्रवेश करते हैं।158 तपस्वी महात्माओं की समाधि-अवस्थाओं का सबसे पुराना वर्णन ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 136 वें सूक्त में मिलता है।159”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“वैदिक सूक्तों के अन्दर हम प्रकृति के सौन्दर्य, उसकी महानता एवं उसकी भव्यता और करुणामय स्वभाव के प्रति उत्कट अनुराग पाते हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“अजन्मा नित्यसत्ता आत्मचेतन रूपी ब्रह्म के रूप में अभिव्यक्त होकर हमारे सामने आती है, जिसके साथ प्रकृति, अन्धकार, असत्, शून्य और विश्रृंखलावस्था है, जो इसके विरोधी हैं। इच्छाशक्ति इस स्वयंचेतन पुरुष को अनिवार्य स्वरूप है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“यही वह बन्धन है जिससे सत् और असत् का सम्पर्क सम्भव होता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“इच्छा में ही सृष्टि के निर्माण का रहस्य छिपा है। इच्छा, अथवा काम, आत्मचेतना का लक्षण है, जो मानस का बीज है—‘मनसो रेत:’। समस्त विकास की यही आधारभित्ति है, उन्नति के लिए प्रेरणा है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“एक यथार्थ विचारक मनुष्य के लिए सूर्योदय से बढ़कर कोई और गम्भीर धार्मिक अनुष्ठान नहीं है।” असीम प्रभातवेला जो प्रत्येक प्रातःकाल में दिग्दिगन्त में प्रकाश एवं जीवन को प्रक्षिप्त करती है, उषादेवी के रूप में प्रकट होती है, जिसे यूनानी साहित्य में इओस कहा गया है, जिससे प्रातःकाल की उज्ज्वल कन्या के रूप में अश्विनी देवता-युगल एवं सूर्य दोनों प्रेम करते हैं, किन्तु जो सूर्य के सामने तिरोहित हो जाती है जबकि वह अपनी स्वर्णिम किरणों से उसका आलिंगन करना चाहता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“सूर्य मेधा को उपलक्षित करता है, अग्नि इच्छा को, और सोम मनोभावों को।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“मनुष्य, जो बाह्य पदार्थों की ज्ञानप्राप्ति के आदि हैं, एकसाथ ही उच्चतम सत्य के अन्दर प्रवेश करके उसे ग्रहण नहीं कर सकते,”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“हिन्दू संस्कृति युगों की देन है, जिसमें सैकड़ों पीढ़ियों द्वारा किए गए परिवर्तन समवेत हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“सनातन मिश्रित उदारता ही भारतीय संस्कृति व सभ्यता की सफलता का प्रधान रहस्य है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“विद्यार्थी के लिए आदेश है कि उसे शान्ति, आत्मसंयम, त्याग, धैर्य, मन की शान्ति और श्रद्धा का संचय करना चाहिए।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“वस्तुओं को, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, ठीक–ठीक समझना।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“सब प्रकार की छोटी–छोटी इच्छाओं एवं निजी प्रयोजन अथवा क्रियात्मक स्वार्थ का सर्वथा त्याग होना चाहिए।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“ध्यान लगाने की आदत का होना भी आवश्यक है,”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“प्रश्नात्मक जिज्ञासुभाव का होना”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“विद्यार्थी के लिए चार साधन आवश्यक हैं।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“गति निर्विकार की केवल एक प्रकार की अवनति ही है। अचल सत्ता ही व्यापक गति का सत्य है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“माया नाम उसी अभावात्मक तत्त्व का है जो सर्वव्यापक सत्ता को उच्छृंखल कर देता है, जिससे अनन्त उत्तेजना और निरन्तर रहनेवाली अशान्ति का जन्म होता है। विश्व का प्रवाह उसी निर्विकार की प्रतीयमान अवनति के कारण सम्भव होता है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I
“यह आत्मा ही है जो स्वयं निर्लिप्त रहकर जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं की परिवर्तनशील मनोवृत्तियों से प्रभावित विचारों के नाटक की एकमात्र साक्षी एवं दर्शक के रूप में बराबर विद्यमान रहती है।”
Sarvepalli Radhakrishnan, Bhartiya Darshan-I