Yog Vashishth Quotes
Yog Vashishth
by
Badrinath Kapoor20 ratings, 4.70 average rating, 3 reviews
Yog Vashishth Quotes
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“किसी एक के प्रति पूर्ण समर्पण, प्राणों का नियमन अथवा मन का अंत-यदि इन तीनों में से किसी एक में भी परिपूर्णता प्राप्त कर ली जाए तो व्यक्ति परम स्थिति प्राप्त कर लेता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“आत्मज्ञान से वासना नष्ट होती है और साथ ही मन भी। तभी प्राणों में ठहराव आता है। यही निश्चित रूप से परमशांति है। आत्मज्ञान से ही सांसारिक पदार्थों की अवास्तविकता का बोध होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“जो सदा समाधि में रहते हैं और जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके हैं उन्हें सांख्य योगी कहते हैं। जो प्राणायाम के द्वारा अशरीरी चेतना की स्थिति में पहुँच चुके हैं उन्हें योग योगी कहते हैं।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“मुक्त संतों का आचरण आचार-संहिता के नियमों से नहीं चलता। इनका आविष्कार अज्ञानी लोगों द्वारा हुआ है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“मैं’ इस ब्रह्मांड में मात्र एक विचार है और जिसकी विशुद्ध सत्ता है–यही है गहन निद्रा का मौन। उस विशुद्ध सत्ता में ‘मैं’ या ‘कोई और’ है कहाँ? वह तो असीम चेतना है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“(सुषुप्ति) का मौन ही मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। उसमें प्राण की गति को न बढ़ाया ही जाता है और न घटाया ही, इंद्रियों को न भोजन दिया जाता है न भूखों मारा जाता है, विविधता का बोध न व्यक्त किया जाता है न दबाया जाता है, न मन मन ही रहता है और न अमन ही।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“चार प्रकार के मौन का विवरण प्राप्त होता है। वे प्रकार हैं–भाषण का मौन, इंद्रियों (आँख आदि) का मौन, घोर (या दुराग्रहपूर्ण) मौन और गहन निद्रा का मौन। एक और प्रकार का भी मौन है जिसे मन का मौन कहते हैं। यह उसी में होता है जो या तो मृत हो, या जिसने कठोर मौन (काष्ठ मौन) धारण कर रखा हो अथवा जो गहन निद्रा में हो। इसे सुषुप्ति मौन भी कहते हैं। पहले के तीन मौन तो कठोर मौन हैं। चौथा मौन है जो मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“मुक्त संत जानता है कि क्या क्या है, (अर्थात् सत्य को सत्य जानता है और मिथ्या को मिथ्या जानता है) आत्मज्ञान से युक्त होता है फिर भी वह साधारण व्यक्ति का-सा व्यवहार करता है। जिसे मौन कहते हैं वह इन मुनियों की प्रकृति और आचरण पर आधारित होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“आकृति का संबंध (परम) आत्मा से वैसे ही होता है जैसे लहरों का समुद्र से। जब इस सत्य का ज्ञान होता है तो आकृति (भ्रम) नहीं रहती।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“भ्रामक प्रज्ञान (प्रत्यक्ष ज्ञान) ही है जो स्वर्ण में कंगन दिखता है। आकृति ही भ्रामक प्रज्ञान का कारण होती है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“यह आत्मा की ऊर्जा ही है जिसे अनुभवों का अनुभव होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“मैं’ तो संसार से पहले था। तो फिर मुझे कैसे संसार की धारणाएँ बाँध सकती हैं? इस प्रकार जिसे सत्य का बोध प्राप्त होता है वह सभी आदियों और अंतों से मुक्त होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“मैं’ तो संसार से पहले था। तो फिर मुझे कैसे संसार की धारणाएँ बाँध सकती हैं?”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“इस बात का सदा बोध रखो कि जो कुछ भी तुम करो या अनुभव करो वह सर्वशक्तिमान ब्रह्म के प्रति पूजा है। तभी तुमको सत्य का बोध होगा और तभी तुम्हारी सभी शंकाओं का निवारण होगा।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“शरीर भी जीव की धारणा का परावर्तन होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“जब अहंभावना (‘मैं’ की भावना) उत्पन्न होती है तो इसे अहंकार कहते हैं। जब विचार प्रबल होते हैं तब मन प्रकट होता है। जब बोध होता है तब बुद्धिमत्ता प्रकट होती है। जब व्यक्तिगत आत्मा (इंद्र) दृश्य देखती है तो उसे इंद्रिय कहते हैं। जब शरीर की धारणा बलवती होती है तो शरीर प्रकट होता है और जब पदार्थ की धारणा प्रबल होती है तो विविध पदार्थ प्रकट होते हैं। इन धारणाओं के दबाव से सूक्ष्म व्यक्तित्व घनीभूत होकर भौतिक अस्तित्व ग्रहण कर लेता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“पदार्थभाव जादू का खेल है। चेतना स्थूलता देखने लगती है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“जिस प्रकार द्रव्यों में द्रव्यता होती है, हवा में गति होती है, आकाश में शून्यता होती है उसी प्रकार आत्मा में सर्वव्यापकता होती है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“कोई काल्पनिक पदार्थ का वर्णन काल्पनिक ढंग से करता है और दूसरा अपनी कल्पना के अनुसार उसे समझता है परंतु वह वही समझता है। जिसकी वह कल्पना करता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“जीव अपने को सृष्टिकर्ता, पालक आदि सोच लेता है, परंतु यह सब–कुछ विचार–रूप से अधिक कुछ नहीं। तो भी यह विचार–रूप अन्य विचारों की कल्पना या धारणा कर लेता है और उन्हें अनुभूत भी करता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“समभाव ऐसी मिठास है जिस तक मन और इंद्रियाँ नहीं पहुँच सकतीं। जिसका भी उस समभाव का संपर्क होता है वह मिठास से भर जाता है, फिर चाहे उसकी जैसी व्याख्या करे।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“यह संपूर्ण सृष्टि उस मंच के समान है जिसपर चेतना की उक्त शक्तियाँ समय की धुन पर नृत्य करती हैं। इन सबमें प्रमुख है ‘व्यवस्था’–पदार्थों के अनुक्रम की प्राकृतिक व्यवस्था। इसे क्रिया, इच्छा, इच्छाशक्ति, समय आदि भी कहते हैं। यह शक्ति ही है जिस का आदेश रहता है कि प्रत्येक वस्तु में कुछ निश्चित गुण रहने चाहिए। इन वस्तुओं में घास की पत्ती भी सम्मिलित है और सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा भी। यह प्राकृतिक व्यवस्था उत्तेजना से रहित है परंतु अपनी परिसीमा की दृष्टि से विशुद्ध नहीं है। प्राकृतिक व्यवस्था जिस नृत्य नाटक का नर्तन करती है उसे दृश्य संसार कहते हैं।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“शरीर में रहनेवाले मनरूपी भूत का आत्मा से कुछ संबंध नहीं, जबकि वह चुपचुपाते अपने को आत्मा मान लेता है। यही जन्म और मरण का कारण है?”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“हर समय असीम चेतना ही यहाँ विद्यमान है। जो कुछ दिखाई देता है वह मात्र आकृति है। जब आकृति का बोध आकृति के रूप में होता है, तो जो है उसका बोध होता है। या तो यह बोध होगा कि “मैं नहीं हैं और ये अनुभव मेरे नहीं हैं” या “मैं ही सब–कुछ हूँ। इससे तुम दृश्य संसार के आकर्षण से मुक्त हो जाओगे।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“हलचल अभी न हुई हो, कुंभक उत्पन्न होता है और बिना किसी प्रयास के उत्पन्न होता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“प्राण और अपान दोनों के न रह जाने पर जो शेष रहता है तथा प्राण और अपान के बीच रहता है मैं उस असीम चेतना का चिंतन करता हूँ। मैं उस असीम चेतना का चिंतन करता हूँ जो प्राण का प्राण है, जो जीवन का जीवन है और जो अकेले ही शरीर के रक्षण का दायित्व निभाता है। वह मन का मन है, बुद्धि में बुद्धिमत्ता है और अहंभाव में वास्तविकता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“अपान चंद्रमा के समान है जो शरीर की बाहर से रक्षा करता है, प्राण सूर्य या अग्नि के समान है जो शरीर का आंतरिक उपकार करता है। प्राण हर क्षण हृदयाकाश में ताप उत्पन्न करता है तथा इस ताप को उत्पन्न करने के बाद यह मुख के सामने के आकाश में भी ताप उत्पन्न करता है। अपान चंद्रमा है वह मुख के सामने के आकाश को पुष्ट करता है और फिर हृदयाकाश को भी पुष्ट करता है। यदि कोई उस स्थल तक पहुँचता है जहाँ अपान प्राण से मिलता है तो फिर उसे कोई दुख नहीं सताता और न ही वह फिर जन्म ही लेता है। वस्तुस्थिति यह है जब प्राण अपने प्रचंड ताप का त्याग कर परिवर्तित रूप में अपान का रूप ग्रहण करता है तब वही प्राण चंद्रमा की शीतलता का त्याग कर पुनः अपना प्राकृतिक रूप–सूर्य की शोधनकारी अग्नि–प्राप्त कर लेता है। ज्ञानी लोग प्राण की प्रकृति में तब तक अनुसंधान करते हैं। जब तक वह अपनी सौर प्रकृति का त्याग कर चांद्र प्रकृति नहीं धारण कर लेता। जो अपने हृदय में सूर्य और चंद्रमा के उदय और अस्त होने से संबद्ध सत्य को जान लेते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते। जो अपने हृदय में सूर्य का दर्शन करता है वह सत्य को जान लेता”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“द्वादशांत से अभिप्राय शरीर से बाहर का बारह अंगुल की दूरी का चुंबकीय क्षेत्र है। प्राण और अपान भी इस चुंबकीय क्षेत्र के अंग होते हैं।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“महर्षे, प्राण हृत्कमल से आरंभ होता है और शरीर से बारह अंगुल की दूरी पर समाप्त होता है। अपान द्वादशांत (बारह अंगुल से दूरी पर) से आरंभ होता है और हृत्कमल में जाकर समाप्त होता है। इस प्रकार अपान वहाँ से आरंभ होता है जहाँ पर प्राण समाप्त होता है। प्राण लौ के समान है जो ऊपर उठता है। और बुझ जाता है, अपान जल की तरह है जो नीचे हृत्कमल की ओर जाता”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
“प्राण और अपान। मेरा उनके प्रति पूज्यभाव है। वे थकान से दूर हैं। हृदय में सूर्य और चंद्र की तरह चमकते हैं। वे उस मन रूपी गाड़ी के पहिए हैं जो शरीर रूपी नगर का अपने को संरक्षक समझता है। अहं रूपी राजा के प्रिय अश्व भी हैं। उनके प्रति श्रद्धान्वत रहता हूँ और रहता हूँ सदा एकरूप रहनेवाली चेतना में स्थित कि जैसे गहरी नहीं में होऊँ। जो प्राण और अपान के प्रति पूज्य भाव रखता है वह इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेता और वह बंधन से मुक्त हो जाता है।”
― Yog Vashishth
― Yog Vashishth
