“अपान चंद्रमा के समान है जो शरीर की बाहर से रक्षा करता है, प्राण सूर्य या अग्नि के समान है जो शरीर का आंतरिक उपकार करता है। प्राण हर क्षण हृदयाकाश में ताप उत्पन्न करता है तथा इस ताप को उत्पन्न करने के बाद यह मुख के सामने के आकाश में भी ताप उत्पन्न करता है। अपान चंद्रमा है वह मुख के सामने के आकाश को पुष्ट करता है और फिर हृदयाकाश को भी पुष्ट करता है। यदि कोई उस स्थल तक पहुँचता है जहाँ अपान प्राण से मिलता है तो फिर उसे कोई दुख नहीं सताता और न ही वह फिर जन्म ही लेता है। वस्तुस्थिति यह है जब प्राण अपने प्रचंड ताप का त्याग कर परिवर्तित रूप में अपान का रूप ग्रहण करता है तब वही प्राण चंद्रमा की शीतलता का त्याग कर पुनः अपना प्राकृतिक रूप–सूर्य की शोधनकारी अग्नि–प्राप्त कर लेता है। ज्ञानी लोग प्राण की प्रकृति में तब तक अनुसंधान करते हैं। जब तक वह अपनी सौर प्रकृति का त्याग कर चांद्र प्रकृति नहीं धारण कर लेता। जो अपने हृदय में सूर्य और चंद्रमा के उदय और अस्त होने से संबद्ध सत्य को जान लेते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते। जो अपने हृदय में सूर्य का दर्शन करता है वह सत्य को जान लेता”
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Yog Vashishth
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