रत्ना की बात Quotes

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रत्ना की बात रत्ना की बात by रांगेय राघव
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रत्ना की बात Quotes Showing 1-30 of 40
“केसव कहि न जाई का कहिये? देखत तब रचना विचित्र अति समुझि मनहिं मन रहिये॥ सून्य भीति पर चित्र रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे। धोये मिटै न, मरै भीति दुख, पाइय यहि तनु हेरे॥ रविकर नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माँही। बदनहीन सो ग्रसै चराचर पान करन जे जाहीं॥ कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कर मानै । तुलसिदास परिहरैं तीन भ्रम सो आपन पहिचानै॥”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“मुझे तुमने बचा लिया बाबा! तुमने मुझे भगवान बता दिए। मैं पागल हो गई थी ।’’ तुलसी ने कहा, ‘‘और अब मैं पागल हो गया हूँ गौरा !’’ ‘‘क्यों बाबा?’’ ‘‘देखती है? भगवान बोल नहीं रहे हैं ।’’ ‘‘बोल तो रहे हैं वे ।’’ ‘‘तुझे कुछ सुनाई दे रहा है?’’ ‘‘हाँ बाबा !’’ ‘‘क्या कहते हैं बोल?’’ ‘‘वे कहते हैं तुलसीदास विनय सीख! विश्वास कर ।’’ तुलसी ने मन ही मन गौरा को प्रणाम किया,”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“विधवा चिल्लाई, ‘‘बाबा ! लोग कहते हैं तुम भगवान से बात करते हो। मेरे पति को जिला दो बाबा! वह भूख से मर गया है।’’ तुलसी का हृदय फटने लगा। काशी में ब्राह्मण अपनी युवती स्त्री को विधवा बनाकर भूख से मर गया है। क्या धर्म निःशेष हो गया है!! क्या सुन रहे हैं वे !! पूरा मानस लिखा! जन-जन में प्रबोध हुआ परन्तु कलि का प्रहार निरन्तर बढ़ रहा है !!”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“एक तो कराल कलि काल सूल मूल तामें, कोढ़ में की खाजु सी सनीचरी है मीन की। वेद धर्म दूरि गये, भूमि चोर भूप भये, साधु सीद्यमान जानि रीति पाप-पीन की। दूबरे को दूसरो न द्वार, राम दया-धाम! रावरी ही गति बल-विभव-विहीन की। लागैगी पैं लाज वा बिराजमान बिरूदहि,”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“अन्त में महाकवि काशी आ गए। मीन की सनीचरी आई थी। हाहाकार मच रहा था। महामारी से लोग मर रहे थे।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“जहाँ गोरखनाथ ने भक्ति भगाकर वर्णाश्रम धर्म का खण्डन करके जोगी मार्ग चलाया था, वहाँ अब जोगी रूढ़ियों में फँस गए थे। पहले ही तुलसी ने पुकार उठाई थी–यह मार्ग वेद-विरोधी है। इसको त्याग दो। परन्तु”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“सरयू गम्भीर गति से बही चली जा रही थी। उसके कल-कल निनाद में एक अजस्र मनोहारी संगीत था, जो मन के गह्वरों को भरता चला जा रहा था, परन्तु यह दाह कैसा था जो सिकता की भांति अपने फैलाव से डराने लगा था।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“राखि हैं राम कृपालु तहौ, हनुमान से सेवक हैं जेहि केरे। नाक, रसातल, भूतल में, रघुनायक एक सहायक मेरे।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“परन्तु ब्रह्म तो सबसे परे अव्यक्त है न? है, परन्तु यह लोक उसी का है। इस लोक के लिए वह बार-बार अवतार लेकर आया है। और उसने रक्षा की है।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“कृष्ण की मनोहारिणी छवि बनी थी। तुलसी ने देखा। मन ने कहा : तुलसी! यह विष्णु ही है न? हाँ यह उन्हीं का अवतार है। महाकवि सूर ने इन्हीं की लीला गाई है? हाँ। इन्हीं की तो। सूर के गीतों से वेद-विरोधी व्याकुल हो गए हैं न? हाँ निश्चय। परन्तु उससे नया जीवन अभी नहीं जागा। क्या यही अन्त है? नहीं। यह तो लीलारंजन है। तुझे क्या चाहिए? मुझे धर्म की रक्षा के लिए धनुष-बाण उठाने वाला चाहिए।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“संसार शून्य की भांति फैल गया। कोई सहारा नहीं रहा।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“व्यक्ति की सत्ता का आधार प्रभु के अतिरिक्त और कहाँ है!”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“मैं उस रक्त-माँस की ढेरी में अनन्त सुखों को खोजता हुआ मृगमरीचिका में हाँफता हुआ भागता रहा। एक दिन भी यह नहीं समझ सका कि इस लघुता के पार एक विशाल आकाश है जिसमें आनन्द का देदीप्यमान सूर्य अपना भव्य आलोक त्रिभुवन में विकीर्ण किया करता है! किसलिए”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“कुलांगार! अधम! तू पतित है। तू जघन्य है। तूने नारी को ही अपना अन्तिम ध्येय मान लिया! तूने उससे, अचिरवती से इतना विलासी प्रेम किया! तू लाश पर चढ़कर चला आया और तुझे अपनी नीच वासना में यह ज्ञान भी नहीं रहा।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“पति हूँ ।’’ रत्ना ने मुँह चिढ़ाया। ‘‘कभी शीशे में शक्ल देखी है? पति लुगाई के पीछे ऐसे डोलता है? तुमने तो मेरी नाक काट दी। अरे मरद हो। मरद बनकर तुम्हें रहना नहीं आता!”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“दरिद्र का स्नेह भी उपहास बन जाता है। संसार कितना विचित्र है”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“किसी और औरत का भी आदमी वहाँ आया था?’’ ‘‘वे अपनी औरतों की परवाह नहीं करते रत्ना !’’ ‘‘तुम करते हो अकेले? प्रेम तो तुम्हें ही आता है, कभी लाज भी आती है?”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“चम्पा हँसी। कहा : मरद तो तेरा ही है न री! हमारे तो सब जाने क्या हैं? दो दिन आप रोटी बनाकर नहीं खा सकता है! ‘‘अरी लाज कर।’’ एक अधेड़ स्त्री ने कहा–‘‘कैसा कलजुग आया है! लुगाई को शरम नहीं आती कहते। माँ-बाप से तो नाता ही नहीं रहा। ब्याहता और रखैल को तो फरक ही नहीं रहा ।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“जैसे वज्रवेग से उठने वाली लहर, दृढ़तम चट्टान को देखकर उठती है और भरपूर उद्दामशक्ति से उससे टकराकर, फेन-फेन होकर बिखर जाने का आनन्द अपने बिन्दु-बिन्दु में भरकर, अपनी पराजय में अपनी विजय का अनुभव करना चाहती है, वैसे रत्ना तुलसी को देख पुलक उठी थी। परन्तु वह लहर बढ़ी तो देखा वहाँ चट्टान न थी, केवल रेत थी। उससे तो टकराने का प्रश्न ही नहीं था। वहाँ लहर गई, रेत अपने-आप भीगने को तैयार थी, भीग गई, और भीगी ऐसी कि उसने न फिर से सूखने की कामना की, न लहर का लौट जाना ही स्वीकार किया। रत्ना से तुलसी ऐसे ही भीग गया था। लहर का असंतोष भड़कने लगा। वह खेलना चाहती थी, और एक ऊँचे स्तर पर, हहराकर। यहाँ एक हारा हुआ व्यक्ति था। उसमें तड़क ही नहीं थी। और”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“मेरा प्रेम तेरी तृप्ति माँगता है।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“जब हृदय हृदय से बोलता है, तब वाणी मूक हो जाती है, और एक स्पंदन ही अव्यक्त गरिमाओं का वहन करने लगता है।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“यह जीवन एक बड़ा विशाल वन है। इसमें असंख्य प्रकार के द्रुम हैं। वे एक-दूसरे के पास रहकर भी, एक-दूसरे की ओर हवा के झोंके खाकर भी, अपने अंतस् में एक-दूसरे से अपरिचित-से ही रहते हैं। परन्तु जब किसी वृक्ष पर बेल चढ़ने लगती है तब समीर भी झकोरे ले-लेकर चलता है”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“यह संसार तो एक विराट समुद्र है। असंख्य ही तो इसमें तरंगें हैं, और इतनी कि उनके स्तरों के नीचे स्तर हैं, और वे अतलांत तक ऐसे ही अपने ही अनुशीलन में डूबती-उतराती चली जाती हैं। परन्तु जब दो लहरें चलती हैं तब वे उठती हैं, गिरती हैं, बल खाती हैं और फिर अलग होती वे एक हो जाती हैं”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“संध्या में प्रकृति थक जाती थी, चारों ओर शीतलता छा जाती थी। तब मन किसी शीतलता के नए ही सर्ग को चाहता था। पुरवैया, घने वनों में मर्मर करती, छायाओं से झूमर खेलती अपने उनींदे नयनों को मलने लगती,”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“हूकभरी कूकों से मोर हरे-भरे नीलम छायावाले पहाड़ों और गड़रिए की बाँसुरी से गूंजते खेतों और मैदानों, जंगलों और राहों में एक उल्लास की मादकता भर-भर देते थे,”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“तन्मया, विमोहिनी, अपराजिता, माधुर्यश्री, सौम्यमंगला, चिरंतन रूप से मनोहारिणी नारी, आलोकिनी, मूर्तिमती रूपशिखा!!”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“आकाश में असंख्य नक्षत्र झिलमिला रहे थे। निशा सुन्दरी झिल्लियों के मिस धीरे-धीरे अपनी नूपुर ध्वनि गुंजित कर रही थी। आकाशगंगा पर एक मादक तन्द्रा-सी छाई हुई थी। तुलसी”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“आँखों में विभ्रम कांपा। होंठों पर गर्व की मुसकान ने यौवन और रूप की रक्षा में परदेसी आँखों के सामने बलैया ली। और फिर कपोलों पर रक्तिम लाज ने पृष्ठ बदला, तुलसी को लगा जैसे अनेक सर्ग, अनेक काण्ड उस निमिषमात्र में निकल गए। वह गोरी ब्राह्मण कन्या, उसके माथे पर भास्वर प्रतिभा और फिर उसकी वंदना में कल्याणी गरिमा उठी और तब तुलसीदास के रोम-रोम में एक स्फुरण हुआ जो श्रद्धा के कन्धों पर सिर रखकर मानो अपने-आपको भूल गया।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“देखा तो वही विभोर तन्मयता। वहाँ तो अहंकार को तिरोहित करके मूर्तिमती श्रद्धा बैठी थी। उस आत्म-समर्पण में कितनी पवित्रता थी! खिंची हुई भवें, उनींदे-से नेत्र जो शायद कल्पना से बोझिल हुई पलकों को हटाकर ध्वनि को आत्मसात कर लेना चाहते थे।”
रांगेय राघव, रत्ना की बात
“टूटियौ बौह गरे परै, फूटेहूँ बिलोलन पीर होति हित करिए। वे”
रांगेय राघव, रत्ना की बात

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