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रांगेय राघव

“जैसे वज्रवेग से उठने वाली लहर, दृढ़तम चट्टान को देखकर उठती है और भरपूर उद्दामशक्ति से उससे टकराकर, फेन-फेन होकर बिखर जाने का आनन्द अपने बिन्दु-बिन्दु में भरकर, अपनी पराजय में अपनी विजय का अनुभव करना चाहती है, वैसे रत्ना तुलसी को देख पुलक उठी थी। परन्तु वह लहर बढ़ी तो देखा वहाँ चट्टान न थी, केवल रेत थी। उससे तो टकराने का प्रश्न ही नहीं था। वहाँ लहर गई, रेत अपने-आप भीगने को तैयार थी, भीग गई, और भीगी ऐसी कि उसने न फिर से सूखने की कामना की, न लहर का लौट जाना ही स्वीकार किया। रत्ना से तुलसी ऐसे ही भीग गया था। लहर का असंतोष भड़कने लगा। वह खेलना चाहती थी, और एक ऊँचे स्तर पर, हहराकर। यहाँ एक हारा हुआ व्यक्ति था। उसमें तड़क ही नहीं थी। और”

रांगेय राघव, रत्ना की बात
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रत्ना की बात रत्ना की बात by रांगेय राघव
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