उपसंहार Quotes
उपसंहार
by
Kashinath Singh226 ratings, 4.25 average rating, 20 reviews
उपसंहार Quotes
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“हंसी-मजाक नहीं जानते। खुशी-उल्लास नहीं जानते। मुसकराना-हँसना नहीं जानते। वे कमंडल में शाप और मृत्यु लिये घूमते रहते हैं। ऋषि हैं, सिर्फ रोष करना जानते हैं।”
― Upsanhar
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“जाने के दिन उन्होंने खीर खाने की इच्छा जाहिर की। कृष्ण ने तत्काल खीर की थाल मँगवाई। उन्होंने थोड़ी–सी खीर खाने के बाद कृष्ण की ओर देखा, कहा–‘अपने कपड़े उतारो।’ बूढ़े कृष्ण थोड़ा सकुचाए, फिर कपड़े उतार दिये। ‘वह लँगोट भी।’ डाँटकर दुर्वासा ने कहा। ‘हाँ, ठीक! अब अपनी देह पर यह खीर पोतो। ध्यान रखना, कोई अंग छूटे नहीं।’ जब तक कृष्ण खड़े–खड़े खीर पोतते रहे, दुर्वासा सिर झुकाए बैठे रहे। जब सिर से लेकर अँगूठों तक खीर पुत चुकी, तब उन्होंने खाँसकर ऋषि को संकेत किया। दुर्वासा ने कहा–‘रुक्मिणी को बुलाओ।’ रुक्मिणी आई और नंग–धड़ंग सफेद कृष्ण को देखकर भय से सिहर उठी। ‘सब कपड़े उतारो!’ रुक्मिणी ने आभूषणों के साथ ही साड़ी, ब्लाउज, अँगिया, साया सब उतार दिया। दुर्वासा ने अपने हाथों से उसके पूरे शरीर पर खीर पोतकर कहा-’छकड़ा मँगाओ!’ शकट मँगवाया गया। दुर्वासा सामने से नौकरों-चाकरों को हटाते हुए छकड़े के पास पहुँचे, बैल की जगह रुक्मिणी के कन्धे पर जुआ रखा, चाबुक के साथ छकड़े पर बैठे और रुक्मिणी के कन्धे पर चाबुक मारते हुए चीखकर कहा-’दक्षिणद्वार पुष्पदन्त की ओर चलो!’ दक्षिणापथ के दोनों ओर द्वारकावासियों की अपार भीड़। बूढ़े, बच्चे, जवान, औरतें भी। आँखें फटीं। साँसे टँगी। छकड़े के पीछे दौड़ते-ठिठकते बूढ़े, को पहचान में न आने वाले सफेद द्वारकाधीश। बैल की जगह उसमें जुती अधेड़, खीर में नहाई, चाबुक की मार खाती, नंगी पटरानी रुक्मिणी। छकड़े को हाँकता यज्ञोपवीत पहने मरियल, हड्डियों का ढाँचा-दुर्वासा। रुक्मिणी से छकड़ा खिंच नहीं रहा था। सत्यभामा यादव थी, जाम्बवती आदिवासी थी। वे कर्मठ और मेहनती थीं। वे होतीं तो खींच ले जातीं, लेकिन रुक्मिणी क्षत्राणी थी। राजा की बेटी थी। न मायके में अपने हाथ से गिलास या कटोरा उठाया था, न द्वारका में। दोनों जगहें ऐसे कार्यों के लिए नौकर-चाकर थे। वह बीच-बीच में रोती हुई ठिठक जाती और फिर कन्धे या पीठ पर ‘सटाक्’। कृष्ण अपराधी की तरह कभी दौड़ते थे, कभी हाँफते थे, कभी चलने लगते थे। रास्ते भर उनका न कभी सिर उठा, न आँखें। द्वारका अपने ‘ईश्वर’ की ऐसी-तैसी होते देखती रही-अवाक् और असहाय। गाड़ीवान दुर्वासा ने पुष्पदन्त द्वार के पहले ही जंगल की ओर गाड़ी मोड़ दी। थोड़ी दूर जाकर दुर्वासा छकड़े से उतरे, रुक्मिणी के कन्धों से जुआ हटाया और कृष्ण के आने का इन्तजार किया। ‘कृष्ण! लौटोगे तो महल को वैसा ही पाओगे, जैसा मेरे आने से पहले था।’ दुर्वासा बोले- ‘तुमने खड़े-खड़े सारे बदन में खीर लगाई, तलवा वैसे ही रह गया था। तुम्हारी मृत्यु उसी तलवे में है। एक सामान्य आदमी जैसी मृत्यु। और रुक्मिणी। तुम्हारी देह से सुगन्ध आती रहेगी और सौन्दर्य”
― Upsanhar
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“दुर्वासा के बारे में सुना जरूर था, देखा नहीं था। वे अन्य ऋषियों से भिन्न महाक्रोधी थे। उनका कहीं भी जाना अमंगल सूचक माना जाता था। सभी देवी–देवता उनसे थर–थर काँपते थे। वे किस बात पर प्रसन्न होंगे और किस बात पर नाराज, कहना मुश्किल था। वे वरदान कम, शाप ही अधिक देते थे। कोई नहीं चाहता था कि वे उसके यहाँ दिखाई पड़े। वे जहाँ–जहाँ गए, कुछ न कुछ अनिष्ट ही करके आए।”
― Upsanhar
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“पांचजन्य–जिसकी ध्वनि से धरती काँपने लगती थी, पहाड़ हिल उठते थे, समुद्र किनारा छोड़कर भाग खड़ा होता था, या तो मृत पड़ा था या उसमें इतनी प्राणशक्ति नहीं बची थी कि बज सके। गरुड़ध्वज रथ और सुदर्शन चक्र लौट चुके थे। रह गए थे–गुरु संदीपन का दिया अजितंजय धनुष और बाबा नन्द का दिया पुश्तैनी नन्दक खड्ग लेकिन ये उठाएँ भी तो किसके लिए? दोनों कुल अपने।”
― Upsanhar
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“कहते हैं घोड़े और औरत के कोई छठी इन्द्रिय होती है, जो होनी के बारे में पहले ही बता देती है। हमारा मन कह रहा है कि यह हमारी अन्तिम भेंट है।”
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“वह गोकुल की किशोरियों में सबसे लम्बी, गोरी और छरहरी थी। उसके ओठ गद्देदार थे। जब वह बोलती या मुसकराती थी, तो दोनों तरफ कोनों पर खड़ी पाई जैसी नन्ही–सी लकीर खिंच जाती थी और उसे और अधिक आकर्षक बना देती थी।”
― Upsanhar
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“अतिथिशाला के द्वारपाल ने सूचना दी–‘राजन् बरसाने से एक मालन फूलमाला के साथ आपसे मिलना चाहती है।’ ‘अच्छा, तो मालन मिल लेगी, तुम जाओ अपना काम देखो!’ बगल में टोकरी दबाए राधा उससे कहती हुई आगे खड़ी हो गई। कृष्ण हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए। अपनी पीली रेशमी धोती और नीला दुपट्टा ठीक किया। घुँघराले लम्बे बालों में उँगलियाँ फेरीं। चेहरे पर विस्मय और खुशी की चमक के साथ आगे बढ़े––राधा तुम? मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी!’ ‘मेरा साजन राजन् कब से हो गया कान्हा?’ कहते हुए राधा कालीन पर पाँव धँसाकर चलने लगी। दूसरे सिरे पर खड़ी होकर हँसते हुए बोली–‘तुझे यहाँ नींद कैसे आती है? न कहीं से गोरस की गन्ध आ रही है, न भूसे की, न गोबर की? चैन से सो लेते हो?”
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“तुम्हारे पास तो और भी मुरली है, यही क्यों?’ ‘नहीं जानतीं तुम! ओठों पर आते ही अपने आप राग फूट पड़ते हैं इससे!’ ‘अनुराग कहो, राग नहीं’ मुसकराई वह ‘अब इसे खोना नहीं।”
― Upsanhar
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“त्रिभंगी मुद्रा में यह मुद्रा गोकुल और ब्रज के दिनों की थी और वे भी कृष्ण नहीं, कान्हा थे, कन्हैया थे जब आसपास गोप थे, गोपियाँ थीं, ग्वाले थे, गौवें थीं, करील थे, तमाल थे और यमुना थी और राधा थी। और राधा भी जैसे यमुना की लहरों की हिलोर”
― Upsanhar
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“इस बदबू ने कभी पीछा नहीं छोड़ा, चाहे जहाँ जाऊँ, जहाँ रहूँ। और आश्चर्य यह कि यह उसी समय महसूस होती है, जब कहीं से भी खुशबू का झोंका आता है।”
― Upsanhar
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“आख़िर ईश्वर है क्या? मनुष्य के श्रेष्ठतम का प्रकाश ही तो? और यह प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है। लेकिन फूटता तभी है जब किसी को कातर, बेबस, निरुपाय और प्रताड़ित देखता है। मैं भी था ईश्वर। हाँ, मेरी अवधि किन्हीं कारणों से थोड़ी लम्बी खिंच गई रही होगी।... चलो अब।’ कृष्ण चल पड़े”
― Upsanhar
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“मुकुट की तरह सुधर्मा जगमग कर रहा था। सुधर्मा यानि सभाभवन, जिसके बारे में प्रवाद था कि कृष्ण के निवेदन पर वायुदेव उसे इन्द्रपुरी से द्वारका लाए थे।”
― Upsanhar
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